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नैरेटिव वॉर में कमजोर पड़ती भाजपा

भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत नैरेटिव स्थापित करने की रही है। वह किसी विषय पर या किसी नेता के ऊपर जो चाहती थी वह नैरेटिव स्थापित कर देती थी। सारी पार्टियां, सारा मीडिया और सोशल मीडिया उस पर चर्चा करता था। बौद्धिक मंचों पर भी उसके पक्ष या विपक्ष में चर्चा होती थी। लेकिन भाजपा की यह ताकत धीरे धीरे कम होती दिख रही है। पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इसकी एक मिसाल है। भाजपा ने इतनी मेहनत की है, जितनी उसने किसी और राज्य में नहीं किया होगा। लेकिन उसके तय किए एजेंडे पर कहीं चर्चा नहीं हुई। चुनाव उसके बनाए एजेंडे पर नहीं हो रहा है, बल्कि 15 साल से राज कर रहीं ममता बनर्जी के बनाए एजेंडे पर चुनाव हो रहा है। भाजपा ने सनातन के खतरे में होने और घुसपैठ का मुद्दा बनाया। साथ में ममता बनर्जी के परिवार और उनकी पार्टी के भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाया। लेकिन बंगाल के लोगों में इसकी चर्चा नहीं हुई।

उलटे ममता बनर्जी ने यह मुद्दा बनाया कि भाजपा की सरकार आई तो वह लोगों का मछली खाना बंद करा देगी तो पूरी भाजपा उसका जवाब देने में लग गई। सिर्फ यह जवाब नहीं दिया गया कि भाजपा मछली खाना बंद नहीं कराएगी, बल्कि भाजपा के नेता मछली और मांस खाकर दिखाने लगे। भाजपा के सांसद अनुराग ठाकुर ने पश्चिम बंगाल में मछली और मांस खाते हुए वीडियो पोस्ट किया और वह भी मंगलवार के दिन। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वे ममता बनर्जी से ज्यादा मांस, मछली खा सकते हैं। भाजपा के प्रत्याशी हाथ में मछली लेकर प्रचार करने लगे। ममता बनर्जी ने नैरेटिव बनाया कि भाजपा की सरकार बनी तो बांग्ला भाषा खतरे में आएगी। तो प्रधानमंत्री हर सभा में एक एक लाइन बांग्ला बोलने लगे और स्मृति ईरानी को बांग्ला में बोल कर प्रचार करने के लिए पश्चिम बंगाल भेजा गया। ममता बनर्जी की पार्टी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में राम राज नहीं दुर्गा राज है तो भाजपा के नेताओं ने जय श्रीराम बोलना ही बंद कर दिया। अब वे जय श्री कृष्ण या जय मां काली बोल रहे हैं।

यह सिर्फ एक राज्य के चुनाव की बात नहीं है। सोशल मीडिया स्पेस में भाजपा ने नैरेटिव कंट्रोल करने की ताकत गंवा दी है। यह बदलाव यूजीसी की नियामावली जारी होने के बाद हुआ है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा ने उच्च शिक्षण संस्थानों में सवर्ण छात्रों को अपराधी बनाने वाली नियमावली जान बूझकर जारी कराई थी क्योंकि उसको कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के बनाए नैरेटिव का जवाब देना था। सोचें, जिस तरह बंगाल में भाजपा पूरे चुनाव ममता के बनाए नैरेटिव का जवाब देती रही उसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर वह कांग्रेस और राहुल गांधी के बनाए नैरेटिव पर जवाब दे रही है।

इसका जवाब देने के लिए ही यूजीसी का दिशानिर्देश जारी किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि सोशल मीडिया में राइटविंग के ज्यादातर इन्फ्लूएंसर भाजपा के खिलाफ हो गए। ध्यान रहे सोशल मीडिया में ज्यादातर राइटविंग इन्फ्लूएंसर सामान्य जातियों के थे। उन्होंने एक लाइन पकड़ ली। उसके बाद भाजपा विरोधियों से ज्यादा उन्होंने भाजपा को और उसके नेताओं को ट्रोल करना शुरू कर दिया। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनके निशाने पर हैं।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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