पहले कुछ तथ्यों की बात कर लें। भारत अपनी जरुरत का 60 फीसदी गैस आयात करता है और 40 फीसदी अपने यहां बनाता है। भारत में जो गैस बनती है उसमें 25 से 28 फीसदी बढ़ोतरी करने के लिए सरकार की ओर से कहा गया है। 25 फीसदी उत्पादन बढ़ने का मतलब है कि भारत 10 फीसदी गैस और बनाने लगेगा। यानी उसके बाद भी 50 फीसदी गैस बाहर से आनी है। दूसरा तथ्य यह है कि भारत में गैस की स्टोरेज क्षमता बहुत कम है। मेंगलुरू और विशाखापत्तनम में दो स्टोरेज फैसिलिटी है, जिसमें ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक लाख 40 हजार टन गैस स्टोर करने की सुविधा है। उसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति दिन की गैस की खपत 80 हजार टन की है। इसका मतलब है कि भारत के पास कायदे से दो दिन की खपत के बराबर भी स्टोरेज नहीं है। तीसरा तथ्य यह है कि भारत में दो सौ से कुछ ज्यादा बोटलिंग प्लांट हैं, जहां गैस के सिलेंडर भरे जाते हैं। वहां भी स्टोरेज की बड़ी सुविधा नहीं है और इन टाइम आपूर्ति यानी तत्काल आपूर्ति की ही व्यवस्था है। इसलिए अगर संकट बढ़ता है, जंग लंबी चलती है और कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति प्रभावित होगी। सोचें, कोरोना महामारी के समय जब गैस की कीमतें बढ़ीं उस समय चीन ने तेल और गैस के भंडारण की नई सुविधाएं विकसित की और सस्ता तेल व गैस खरीद कर जमा करना शुरू किया। वह 36 नई फैसिलिटी डेवलप कर रहा है, जहां गैस का भंडारण होगा। इसमें ज्यादातर फैसिलिटी समुद्र तटों पर नहीं है, बल्कि देश के अंदर है। इसी तरह वह सौ अरब गैलन से ज्यादा तेल स्टोर करने की फैसिलिटी विकसित कर रहा है। खैर उससे हमारा क्या मुकाबला? हम तो विश्वगुरू हैं!
अब यही हमलोगों की असली क्षमता की परीक्षा होनी है। अब दुनिया को यह दिखा देना होगा कि भारत विश्वगुरू है। इसके लिए गैस बनाने के नए रास्तों पर अमल शुरू करने का समय आ गया है। जैसे अमेरिका ने चट्टान से तेल निकाल लिया और अफ्रीकी देश डीप सी एक्सप्लोरेशन कर रहे हैं उसी तरह भारत को नालों से गैस बनाने और गाड़ियों के पहिए में भरी हवा से गैस बनाने के तरीके पर व्यापक रूप से अमल शुरू करना चाहिए। इससे भारत को अपनी सारी समस्या का समाधान मिल जाएगा। भारत में तो नाले ही नाले हैं। चारों तरफ नाले हैं और लगभग सभी नाले खुले हुए भी हैं। उनको शाय़द इसलिए भी नहीं ढका गया होगा कि पता नहीं कब इससे गैस बनाने की जरुरत आन पड़े। तमाम बड़े शहरों के बड़े नाले गंगा और यमुना जैसी नदियों में गिरते हैं और इन पवित्र नदियों की स्वच्छता में अपना योगदान देते हैं। इन तमाम बड़े बड़े नालों से गैस बनाई जा सकती है।
लोग यह सुन कर हंसने लगते हैं कि नाले से कैसे गैस बनेगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा था कि उन्होंने एक व्यक्ति को नाले की गैस से चाय बनाते देखा था। प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा नहीं है कि यह बात किसी चुनावी रैली में कही थी। उन्होंने दिल्ली के विज्ञान भवन में 10 अगस्त 2018 को वर्ल्ड बायोफ्यूल डे के कार्यक्रम में तमाम विशेषज्ञों की मौजूदगी में कही थी और सबने इस पर तालियां बजाई थी। प्रधानमंत्री ने कहा था कि उन्होंने एक व्यक्ति को देखा, जिसकी दुकान नाले के बराबर में थी, उसने नाले से निकलने वाली गैस को इकट्ठा किया और उसे पाइप के जरिए अपनी दुकान में लाकर उसका इस्तेमाल चाय बनाने के लिए किया। जैसे ताली, थाली बजाने से पैदा हुई ऊर्जा से कोरोना खत्म होने या लॉकडाउन से कोरोना का सर्किल टूटने जैसे तर्क गढ़ कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों को जस्टिफाई किया गया वैसे ही नाले की गैस से चाय बनाने की बात को भी बहुत से जानकारों ने जस्टिफाई किया कि नालों की मिथेन गैस का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि पता नहीं क्यों किसी ने इस पर प्रयोग करके गैस बनाना शुरू नहीं किया? अब समय आ गया है कि नालों से गैस बनाई जाए और उसका इस्तेमाल करके दुनिया को दिखाया जाए कि भारत विश्वगुरू है।
प्रधानमंत्री मोदी ने उसी वर्ल्ड बायोफ्यूल डे के कार्यक्रम में ही यह किस्सा भी सुनाया था कि एक बार वे गुजरात में अपने काफिले के साथ जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि उनके काफिले के आगे एक व्यक्ति स्कूटर पर ट्रैक्टर का भरा हुआ ट्यूब लेकर जा रहा था। उन्होंने उसे रूकवा कर पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अपने घर पर गोबर और कचरे से बनने वाला बायोगैस प्लांट लगा रखा है। वहां वह गैस बनाता है और उसे ट्रैक्टर के ट्यूब में भर कर अपने खेत पर ले जाता है, जहां उससे अपना पंप चला कर सिंचाई का काम करता है। अब पता नहीं इस तरह के प्लांट लगाने और इस तरह से ट्यूब में भर कर उसे लोगों के घरों तक या रीफीलिंग सेंटर्स या बोटलिंग प्लांट तक ले जाने का उपक्रम देश में क्यों नहीं किया गया? लेकिन अब उसका भी समय आ गया है। बाकी इस तरह से गैस बनाने और लोगों तक पहुंचाने के और भी मौलिक उपाय जरूर भारत के पास होंगे। उनका इस्तेमाल करके गैस की समस्या को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।


