प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 साल पहले ओडिशा के पारादीप में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन की रिफाइनरी के उद्घाटन के समय कहा था कि भारत 2022 तक तेल आयात को 10 फीसदी कम करेगा। ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा। लेकिन 10 साल के बाद भारत का तेल आयात कम से कम पांच फीसदी बढ़ गया है और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के जरिए जो आत्मनिर्भरता की बात हो रही थी उसमें भी भारत चीन के ऊपर निर्भर हो गया है। चाहे इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी हो या सोलर प्लेट्स हों इन सबके लिए चीन पर निर्भरता है। सोलर प्लेट्स भारत बनाने भी लगे तब भी उसके लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति चीन से ही होती है। चांदी भी उसी में से एक उत्पाद है। सो, आत्मनिर्भर भारत का पूरा गेम चीन के हाथ में है। यानी अगर भारत ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत विकसित करना चाहेगा तो उसका लाभ भी चीन को मिलेगा।
जैसे आत्मनिर्भर होने के लिए चीन पर निर्भरता अनिवार्य है वैसे ही अभी गैस का जो संकट बढ़ा है उससे निपटने के लिए भी चीन की ही जरुरत है। भारत में गैस की किल्लत हुई है तो लोग बिजली से चलने वाले इंडक्शन चुल्हा खरीद रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले भारत में एक महीने में एक लाख 80 हजार इंडक्शन कुक टॉप बिकता था और अब एक दिन में एक लाख बिक रहा है। इसकी बिक्री बढ़ने का मतलब है चीन की चांदी होना। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत का 85 से 90 फीसदी इंडक्शन चुल्हा चीन से आयात होता है। इसके बाद पांच फीसदी आयात वियतनाम से होता है। असल में चीन भारी मात्रा में इस तरह के इलेक्ट्रिक उपकरण बनाता है। उसके यहां इसके पार्ट्स सस्ते मिलते हैं और गांव गांव में कंपनियां खुली हुई हैं।
भारत में भी कुछ कंपनियां इंडक्शन चुल्हे सहित कई इलेक्ट्रिक उपकरण बनाती हैं। इनमें बजाज इलेक्ट्रिक, टीटीके प्रेस्टिज, हैवेल आदि। लेकिन ये कंपनियां भी सीधे इंडक्शन चुल्हे का आयात चीन से कर लेती हैं या चीन से कल पुर्जे मंगा कर भारत में उनको असेम्बल करती हैं। यानी वे अपना उत्पाद नहीं बनाती हैं। चीन से आयात करके उस पर अपना लेबल लगा कर बेचती हैं। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा इंडक्शन कुक टॉप आयात करने वाला देश है। गैस संकट के समय जब लोग इसकी तरफ शिफ्ट हो रहे हैं तो उसका भी फायदा चीन को हो रहा है।
अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने के लिए नाले से गैस बनाने का प्रोजेक्ट चालू हो या बायोगैस प्लांट्स लगाए जाएं तो उसके लिए भी जो जरूरी मशीनरी और उपकऱण हैं उनका आयात ही करना होगा। बायोगैस प्लांट के लिए जरूरी उपकऱणों में से 60 फीसदी आयात जर्मनी से होता है। उसके बाद करीब 25 फीसदी आयात इजराइल से और 15 फीसदी के करीब चीन से आयात होता है। सो, हर हाल में आत्मनिर्भर भारत को दूसरे देशों पर ही निर्भर रहना होगा।


