पर यह भी सच कि इस अनौपचारिक ठेला क्षेत्र से जीडीपी में 45 प्रतिशत का योगदान। ऐसे ही श्रमशक्ति की दूसरी हकीकत खाड़ी के देशों में भारत के लोगों की मजदूरी है। तीसरी हकीकत आईटी कंपनियों के कोड लिखने वाले आईटीकुलियों (एआई से यह काम खत्म होने वाला है। चौथी हकीकत शेयर मार्केट की उछलकूद से तुरत-फुरत कमाई का सट्टा है। मेरा मानना है कि पिछले बारह वर्षों में भारत का नौजवान जितना सट्टा, जुआ खेलता या साइबरक्राइम का मारा है, वह संभवत: वैश्विक रिकॉर्ड होगा। इसमें सर्वाधिक नौजवान मध्यवर्ग डूबा है।
2014–2015 में शेयर बाजार के 2.3 करोड़ डीमैट खाते थे, अब 17–20 करोड़ खाते हैं। नौकरीपेशा मध्यवर्ग ने ‘अच्छे दिनों’ के ख्याल में शेयर बाजार में डीमैट, यूनिक इक्विटी निवेशक, म्यूचुअल फंड फोलियो, एसआईपी खातों के जरिए दबाकर सट्टा खेला। बचत दांव पर लगाई। एक आंकड़े के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी कोई 84 लाख करोड़ रुपये है।
तभी सोचें, 28 फरवरी को खाड़ी में लड़ाई शुरू होने के बाद ये कैसा नुकसान होता देखते होंगे? दस दिनों में शेयर बाजार में 14–15 लाख करोड़ रुपये की मार्केट वैल्यू हवा हुई है। सो कोविड का समय हो या खाड़ी की लड़ाई का ताजा संकट, भारत के मध्यवर्ग ने भारी धोखा खाया है। नोटबंदी ने लघु-मध्यम उद्यमों को चौपट किया। फिर कुछ जीएसटी से कमर टूटी।
तो आसान जीवन कहां? कर्ज लो, टैक्सी-ईरिक्शा लो “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” अपनाओं। और यह एक सत्य कर्ज लेने, किस्तों पर सामान बेचने, सोना गिरवी रखने का वित्तिय गोरखाधंध का नटवरलाल मॉडल भी भारत को चुपचाप खा रहा है। और अब खाड़ी की लड़ाई में भारत की पिसाई।
आगे क्या? प्रधानमंत्री के पास क्या विकल्प? ले-देकर डोनाल्ड ट्रंप। मेरा दो टूक मानना है कि आने वाले दिनों-महीनों में ट्रंप “पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल” को अंगूठा दिखाएंगे। नए टैरिफ-टैक्स लगाएंगे। मुकेश अंबानी अमेरिका में रिफाइनरी लगाने की बातें कर चाहे जितनी ललोचप्पों करें, लेकिन ट्रंप भारत पर ही अपना यह फार्मूला लागू करेंगे कि अमेरिका को तो महंगे तेल से भी फायदा है। भारत का महंगा तेल बेचेंगे तो पकौड़े का बेसन, सोया से लेकर पशुओं का खाना भी बेचेंगे!


