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2026 में ढोल ही ढोल!

साल 2026 की उम्मीदों में दुनिया के दूसरे देशों में जैसा सोचा जा रहा है वैसे हमें न सोचना चाहिए, न लिखना चाहिए। आखिर हमारी अलग ही हस्ती है। सो, व्यर्थ है यह सवाल कि छब्बीस में भारत की सेहत, सांस क्या बेहतर होगी? इतना जरूर है कि मौजूदा मोदी राज जिन चार पायों पर टिका है वे और मजबूत होंगे। मतलब मोदी राज में- भीड़, ढोल, रेवड़ी तथा आंकड़ों में विकासमान उछाला गारंटीशुदा है। 2026 के अंत में भीड़ का आकार बढ़ा हुआ होगा। भीड़ को रेवड़ियों से नचाने के नए कार्यक्रम बने हुए होंगे। आंकड़े और हवा-हवाई बने मिलेंगे। कहावत जो है थोथा चना बाजे घना। मतलब दिसंबर 2026 में जापान, जर्मनी, चीन, अमेरिका सबको पछाडता भारत विश्वगुरूता के बाद अपने को ब्रह्माण्ड का नेता घोषित करे तो आश्चर्य नहीं  होगा। अब यदि 2026 में इतना भौकाल हुआ तो स्वाभाविक जो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के चुनाव जीतने के रिकॉर्ड में कमी नहीं होगी। चुनाव जीतेंगे और देशा गाएगा- बहारों फूल बरसाओ, भारत विकसित हुआ है!

दूसरे देश 2026 के सिनेरियो, उम्मीदों में एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, उड़ती हुई कारों से लेकर भू राजनीति अर्थात अमेरिका, चीन, वैश्विक व्यवस्था, जलवायु संकट, व्यापार-पूंजी, विज्ञान-तकनीक के बदलते आयामें में दिमाग खपाए हुए है वही भारत का नया साल घुसपैठियों, बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या से प्रारंभ है। तभी मेरा मानना है 2026 का पूरा साल घुसपैठियों के ढ़ोल के शोर में गुजरेगा। बंगाल में विधानसभा चुनाव है और घुसपैठियों, हिंदुओं की हत्या का रोना धोना हिंदू-मुस्लिम राजनीति का रामबाण नुस्खा है तो उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव की भूमिका के लिए भी ढोल का यही सुर वर्ष 2026 की भारत पहचान बनेगा।

2026 में मोदी सरकार के बारह साल पूरे होंगे। गौर करें 2024 में लोकसभा के अल्पमत वाले नतीजों, मोदी सरकार के चंद्रबाबू के टेके के बाद से ढोल की गूंज कितनी और कैसे बढी है? भीड़ को वास्तविकताओं से ओझल रखने की राजनीति में पैसा बांटना, रेवड़ियों, आंकड़ों ने नई ऊंचाईयां पाई हैं। ऑपरेशन सिंदूर निर्णायक मोड़ था। दुनिया ने जब पाकिस्तान का ढोल सुना तो उस नैरेटिव की छाया से अपनी भीड़ को बचाए रखने के लिए मोदी सरकार ने तरह-तरह से अपनी पीठ थपथपाई और बिहार भी जीत लिया!

यों मोदी सरकार अब वक्त गुजरते जाने, घटते जीवन की चिंता में बेचैन है। बारह साल होने को है भला आगे और कितने साल? तभी अमिट सत्ता की मैसेजिंग में महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार के चुनावों में न केवल सरकारी खजाना, पैसा लुटाया बल्कि चुनाव प्रक्रिया को भी संदिग्ध बना डाला। प्रदेशों के चुनाव से ही सरकार ऑक्सीजन पाए हुए है। और तय मानें 2026 में भी राज्यों के चुनावों में ताकत झोंकी जाएगी। बंगाल, असम. केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी के पांच राज्यों में असम, बंगाल में भाजपा घुसपैठियों, हिंदू बनाम मुस्लिम फॉर्मूले पर ही चुनाव लड़ेगी। यों भी बांग्लादेश में हिंदू विरोधी माहौल से असम-बंगाल दोनों जगह धुव्रीकरण बनना है।

तभी 2026 खतरनाक भी हो सकता है। पहले बांग्लादेश में चुनाव है। चुनाव में उनकी जीत होगी जो भारत विरोध की मशाल जलाए कट्टरपंथी है। सो, मुमकिन है कि घुसपैठियों के शोर के अनुपात में ढाका-इस्लामाबाद का गठजोड़ पके। सामरिक गठजोड़ बने। आतंकी घटनाएं हों। इसलिए अमेरिकी थिंकटैंक के इस आकलन में दम है कि 2026 में भारत-पाकिस्तान में फिर ठन सकती है। जनरल मुनीर की मनोदशा में अपने आपको प्रामाणिक तुरर्म खां साबित करने की ललक है। उन्हें भारत का अंदरूनी शोर चीन, रूस, अमेरिका, बांग्लादेश सबसे नए गठजोड़ से 2026 में अवसर मुहैया हो सकता है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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