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प्रदूषण स्थायी समस्या है

एक पुरानी कहावत है, ‘खाया पिया कुछ नहीं गिलास फोड़ा बारह आना।’ प्रदूषण के मामले में वही हाल भारत का है। लंदन से लेकर बीजिंग तक दुनिया भर के देशों की राजधानियों और दूसरे शहरों में एक समय प्रदूषण का साया रहा लेकिन वह इसलिए रहा क्योंकि उन देशों और शहरों में औद्योगिक विकास हो रहा था। लंदन में प्रदूषण का संकट पहली औद्योगिक क्रांति के बाई प्रोडक्ट की तरह आया। बाद में इन शहरों ने प्रदूषण दूर भी कर लिया। लेकिन भारत में कोई औद्योगिकीरण नहीं हुआ लेकिन प्रदूषण चौतरफा फैल गया। अगर उद्योग धंधे लगते, औद्योगिक विकास हो रहा होता, चीन की तरह भारत दुनिया की फैक्टरी बन रहा होता, लोगों की आमदनी बढ़ रही होती और उसी अनुपात में बुनियादी सुविधाओं का विकास हो रहा होता तो हवा के प्रदूषण को समझा जा सकता था। माना जाता है कि देश विकास कर रहा है इसलिए प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है। और तब यकीन भी होता कि एक दिन भारत प्रदूषण की समस्या से निजात पा जाएगा।

लेकिन भारत में प्रदूषण की समस्या विकास का बाई प्रोडक्ट नहीं है, बल्कि अव्यवस्था का मुख्य उत्पाद है। भारत में अगर ठीक से सफाई हो जाए तो प्रदूषण की समस्या 20 फीसदी कम हो जाएगी। इसके लिए सड़कों पर सफाई और कचरा उठाने का बंदोबस्त करना होगा। लेकिन वह भी नहीं हो पाता है। स्थानीय प्राधिकरण सफाई नहीं करा पाता है और उलटे अनियमित निर्माण की अनुमति देता है, जिसकी कोई निगरानी नहीं होती है। देश में योजनाबद्ध तरीके से बसे शहरों की गिनती की जाए तो संख्या दो अंकों में नहीं पहुंचेगी। बाकी ऐसे ही गांवों, कस्बों में या सड़कों के किनारे शहर उग आए हैं या शहर फैल कर गांवों और कस्बों तक पहुंच गए हैं, जहां शहर की कोई व्यवस्था नहीं है। चारों तरफ बेतरतीब तरीके से निर्माण हो रहा है। नदियों और तालाबों को भर कर मकान और दुकान बनाए जा रहे हैं। इसी तरह बेहिसाब गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं। शहरों में फैली गंदगी और गाड़ियों का धुआं प्रदूषण का मुख्य कारण है।

पिछले दिनों केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्वीकार किया कि देश के प्रदूषण में बड़ा योगदान गाड़ियों का है। लेकिन वे क्या कर सकते हैं? सरकार इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर सब्सिडी दे रही है लेकिन पेट्रोल व डीजल की गाड़ियां ज्यादा सस्ती हैं तो लोग उसे खरीद रहे हैं। दोनों तरह की गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। गाड़ियों के चलने के लिए सड़क नहीं है और न ट्रैफिक मैनेजमेंट का कोई उपाय है। हर साल सर्दियों में कहा जाता है कि अगर ट्रैफिक रेगुलेट कर दिया जाए और जाम लगना कम हो जाए तो प्रदूषण में कितनी कमी आ सकती है। लेकिन हर साल सर्दियों के साथ जाम भी बढ़ता जाता है और प्रदूषण भी बढ़ता जाता है।

राजधानी दिल्ली या वित्तीय राजधानी मुंबई की बात समझ में भी आती है लेकिन बिहार के बेगूसराय या मुजफ्फरपुर में प्रदूषण का कोई कारण नहीं है। ये शहर हर साल देश के सबसे प्रदूषित शहरों में जगह पाते हैं। सरकार टियर टू और टियर थ्री के शहरों का विकास करने की बात करती है लेकिन विकास के नाम पर सिर्फ ट्रैफिक बढ़ता है और प्रदूषण बढ़ता है। बिहार में बिना उद्योग लगे हर शहर में औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई तीन सौ से ऊपर रहता है। सरकार मान चुकी है कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं है। और लोग भी सर्दियों के बाद भूल जाते हैं।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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