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हिंदू चिंता है या हिंदुओं को मरवाना?

मोदी सरकार इन दिनों हेडलाइन मैनेजमेंट में बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर सुर्खियां बनवा रही है। क्यों? ताकि बंगाल में आने वाले विधानसभा चुनाव में हिंदू ममता को हराएं और मोदी-भाजपा को जिताएं। बंगाल और असम दोनों में हिंदू बनाम मुस्लिम भावना चुनाव जीतने का मोदी मंत्र है। सो, बांग्लादेश में हिंदू जितने मरे, वहां के चुनाव में कट्टरपंथियों का जितना भी जलवा बने उससे उतने ही बंगाल में भाजपा के हिंदू वोट बढ़ेंगे। फिर भले बांग्लादेश में हिंदुओं की विपदा बढ़ती जाए। डेढ़ करोड़ हिंदुओं (हां, बांग्लादेश की आबादी में है आठ प्रतिशत हिंदू) के मरने, भागने, मिटने की नियति को और गति को मान लिया गया है। आखिर बांग्लादेश का मुसलमान तो अब हिंदू को प्रधानमंत्री मोदी, संघ परिवार का चेहरा समझता है। वह प्रधानमंत्री हसीना की जान का दुश्मन है तो उसे प्रश्रय देने वाली मोदी सरकार का भी दुश्मन है।

इसलिए मोदी सरकार के हेडलाइन मैनेजमेंट से हिंदुओं की मौत का नगाड़ा, भारत सरकार का चिंता जतलाना कट्टरपंथी मुसलमानों की भीड़ का उन्माद बढ़वाना है। तथ्य है ढाका से शेख हसीना भाग कर दिल्ली आईं तो उसके बाद के 16 दिनों में हिंदुओं पर बेइंतहा कहर टूटा। लगभग 2,010 अलग‑अलग हमले रिपोर्ट हुए। घर, दुकान, मंदिरों को तोड़ा,‑फूंका गया। नौ लोगों की हत्या हुई। मोदी सरकार ने तब रत्ती भर नहीं सोचा कि हसीना को शरण देने से बांग्लादेश के हिंदुओं पर कैसा कहर बरपेगा। ध्यान रहे 2,010 तो दर्ज कराए मामले है जबकि मानवाधिकार समूहों के अनुसार हसीना के बाद हिंदुओं का जीना लगातार गंभीर, भेदभावपूर्ण और आए दिन हमलों, वारदातों का है।

सवाल है अगस्त 2024 से नवंबर 2025 के बीच मोदी सरकार ने क्या किया? कुछ नहीं। उसके बस में कुछ था ही नहीं। अब एक-डेढ़ सप्ताह से बांग्लादेश में हिंदुओं की पिटाई या हत्या की खबरें अपने मीडिया के नैरेटिव का केंद्र बिंदु हैं! सोचें, अगस्त 2024 से बांग्लादेश के डेढ़ करोड़ हिंदू घरों में लगभग सिमटे से या चौबीसों घंटे भयाकुलता में जी रहे हैं। मगर मोदी सरकार ने पहले खबरें आई-गई होने दीं और अब हत्याओं की सुर्खियां हैं, विदेश मंत्रालय चिंता जाहिर कर रहा।

यह सिलसिला बंगाल के विधानसभा चुनाव तक चलेगा। इससे आगे क्या होगा? बंगाल में भाजपा के हिंदू वोट पके या न पके मगर तय मानें बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले चुनावों में वहां के कट्टरपंथी मुसलमानों, चरमपंथी संगठनों की वोट राजनीति का हिंदू विरोधी उन्माद बढ़ेगा। तभी बांग्लादेश के चुनाव में मुस्लिम चरमपंथी संगठनों की हिंदू विरोधी राजनीति ढाका की सत्ता पर काबिज होगी। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान से नाता पक्का बना दिया है। दोनों देशों के बीच हवाई सेवा शुरू हो गई है। मतलब ढाका की अगली निर्वाचित सरकार पाकिस्तान-चीन के सैनिक-सामरिक छाते में होगी। यह छाता आने वाले वर्षों में असम व पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती मुस्लिम बहुल इलाकों में वह करेगा, जिसकी कल्पना दहलाने वाली है। बांग्लादेश के कट्टरपंथी भभकी देने लगे हैं कि हम भारत की चिकन नेक याकि उत्तरपूर्व को शेष भारत से जोड़ने वाले सिलिगुड़ी गलियारे को असुरक्षित बना देंगे।

पर हम हिंदू वर्तमान में जीते हैं। मोदी-संघ परिवार आज भूखा है बंगाल-असम जीतने के लिए। सोचें, यदि बंगाल में भाजपा की सरकार बन जाए तथा ढाका में हिंदुओं को भगाने-मारने वाली सरकार बने और इससे दोनों देशों की सीमा पर हिंदुओं का जीना दूभर हुआ तो संघ परिवार क्या लाठियां ले कर हिंदुओं को बचाने जाएगा या मोदी सरकार ढाका (बांग्लादेश) पर कब्जा करेगी? तब मोदी-डोवाल-शाह याकि भारत राष्ट्र-राज्य क्या बांग्लादेश उसके बगल के सीमावर्ती असम, बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों की कोई बीस करोड़ मुस्लिम आबादी हैंडल कर सकेगी? सबसे बड़ी बात हिंदुओं को कुल क्या हासिल होगा? पर इस तरह के सवाल भविष्य के है जबकि प्रधानमंत्री मोदी को तो केवल इस साल के बंगाल, असम के चुनाव जीतने हैं। बांग्लादेश के हिंदुओं के लिए दिखावे के आंसू बहा कर बंगाल के हिंदू वोटों को गोलबंद करना है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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