ट्रंप काल में अमेरिका को अपनी साम्राज्यवादी मंशाओं को पूरा करने के लिए नग्न होना पड़ रहा है। दुनिया फिलहाल हैरत के साथ यह नंगा नाच देख रही है, मगर वह इन नग्नता के पीछे की कमजोरी भी देख रही है। इसीलिए ये संभावना बनी हुई है कि वेनेजुएला में ट्रंप प्रशासन ने जो दुस्साहस दिखाया, उससे अपने आखिरी परिणाम में अमेरिकी शक्ति एवं रुतबे की एक और कब्रगाह तैयार हुई हो!
वेनेजुएला में ट्रंप प्रशासन की अवैध कार्रवाई से अमेरिकी साम्राज्य को पुनर्जीवन मिलेगा, या वहां इस साम्राज्य की सीमाएं और स्पष्ट हो जाएंगी- इस बारे में निश्चित रूप कुछ कहने के पहले अभी हमें इंतजार करना होगा। ट्रंप प्रशासन के आदेश पर अमेरिका के सैन्य दस्तों ने जिस नाटकीय एवं रहस्यमय अंदाज में वेनेजुएला के निर्वाचित और लोकप्रिय राष्ट्रपति निकलस मदुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अपहरण किया, फिलहाल दुनिया का ध्यान उस घटनाक्रम पर ही केंद्रित है। अगवा करने की कार्रवाई की जैसी पृष्ठभूमि बनाई गई और जिस बेरहमी, लेकिन कुशलता से इसे अंजाम दिया गया, उस पर लोगों का चकित होना लाजिमी है। इस कारण फिलहाल यह सवाल हाशिये पर है कि एक बेलगाम शासक समूह के रूप में व्यवहार करते हुए ट्रंप प्रशासन ने इससे हासिल क्या किया है? जबकि इस कार्रवाई सफलता या विफलता को मापने का दीर्घकालिक पैमाना वही सवाल होगा।
मदुरो को अगवा कर अमेरिका लाना और उन्हें मनमाना दंड दे देना टिकाऊ अर्थ में कोई कामयाबी नहीं है। इससे सिर्फ इतना जाहिर होता है कि अमेरिका के पास कारगर खुफिया तंत्र है, जिसके पास किसी देश के अंदर घुस कर वहां के सर्वोच्च नेता के अपहरण की व्यूह रचना करने तक की क्षमता है। फिर उस षडयंत्र को अंजाम तक पहुंचाने की अमेरिकी सेना की शक्ति भी बरकरार है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये क्षमताएं और ये शक्तियां अमेरिका के विश्व व्यापी वर्चस्व को कायम रखने लायक बची हुई हैं?
इस सिलसिले में उल्लेखनीय है कि बतौर राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप को अपनी वैश्विक उपस्थिति को सीमित करते हुए पश्चिमी गोलार्द्ध पर अमेरिका का ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। (https://www।nayaindia।com/opinion/columnist/the-new-security-strategy-and-trump/508776।html)। दरअसल, लैटिन अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र में ट्रंप प्रशासन की आक्रामकता उसी बदलाव का परिणाम है, जिसका विस्तृत उल्लेख उसने अपनी नई सुरक्षा रणनीति किया है। इस रणनीति का पहला निशाना वेनेजुएला बना है, तो उसकी वजहें हैं। उस क्षेत्र में क्यूबा और निकरागुआ के अलावा वेनेजुएला ही ऐसा देश है, जिसके पास संप्रभुता की रक्षा करते हुए जनोन्मुखी विकास करने की समृद्ध समाजवादी विरासत है। वे नीतियां वहां की जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इसलिए उन देशों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा है और ये चुनौती आज भी कायम है।
वेनेजुएला सिमोन बॉलिवर और उगो चावेज की कर्मभूमि है। उन दोनों शख्सियतों की विरासत का ही यह प्रभाव है कि राष्ट्रपति मदुरो के अपहरण के बावजूद अमेरिका लगे हाथ वहां तख्ता पलट को अंजाम नहीं दे पाया। मदुरो के अपहरण से सत्ताधारी यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ वेनेज़ुएला (PSUV) के नेता सकते में जरूर नजर आए, लेकिन जल्द ही खुद को संभालते हुए उन्होंने चाविस्मो (उगो चावेज की विरासत) के मुताबिक शासन चलाते रहने का संकल्प जताया। मदुरो को तीन जनवरी को अगवा किया गया। उसके अगले ही दिन यह स्पष्ट होने लगा कि तख्ता पलट की ट्रंप की मंशा पूरी नहीं हो सकी है।
पांच जनवरी को समाजशास्त्री और पत्रकार लौतेरो रिवारा ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह अपडेट दुनिया को दियाः “ट्रंप का वेनेज़ुएला में न तो राजनीतिक, न सैन्य, और न ही क्षेत्रीय नियंत्रण है। अभी तक बड़े पैमाने पर कोई सैन्य आक्रमण नहीं हुआ है, बल्कि एक ‘काइनेटिक (जबरिया) कार्रवाई’ हुई है, जिसका उद्देश्य एक कार्यरत राष्ट्रपति का अपहरण करना और उस घटना का इस्तेमाल दबाव बनाने तथा संभावित सौदेबाज़ी के औज़ार के रूप में करना था। हाल के महीनों में ग्रेट कैरेबियन में तैनात किए गए अमेरिकी सैन्य संसाधन वेनेजुएला पर कब्जा करने के लिहाज से पर्याप्त नहीं हैं- ना तो वेनेजुएला की कठिन और विस्तृत भौगोलिक संरचना पर, और ना ही राजधानी काराकस तथा उसकी विशाल एवं संगठित घनी आबादी वाली बस्तियों पर। इस बात को समझने के लिए इस पर ध्यान देना चाहिए कि 1989 में छोटे से पनामा पर आक्रमण के लिए 30,000 से अधिक सैनिकों की तैनाती अमेरिका को करनी पड़ी थी। संक्षेप में, वेनेजुएला के सैन्य ढांचों पर बमबारी और हमले उस ऑपरेशन की आड़ थे, जिसे साम्राज्यवादी शब्दावली में “एक्सट्रैक्शन” (लूट-खसोट) कहा जाता है।।।।।।
मेरा मानना है -और यह सिर्फ एक परिकल्पना है- कि मुख्य उद्देश्य देश पर धावा बोलना नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व को हटाना और बोलिवेरियन राष्ट्रीय सशस्त्र बलों में गंभीर दरार पैदा करना था। यह वह चीज़ है, जिसे अमेरिका और स्थानीय विपक्ष बीते 20 वर्षों से करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असफल रहे हैं। वेनेजुएला पर साम्राज्यवादी आक्रमण की कमजोरी यह है कि वहां कोई आंतरिक दलाल ताक़त नहीं है, जिसके पास हथियार और जन-समर्थन हो, जो ‘तानाशाही’ के खिलाफ एक ‘वैध’ राष्ट्रीय विद्रोह का दावा कर सके तथा इस तरह आक्रमण को एक झूठा लोकतांत्रिक लबादा ओढ़ा सके। वेनेज़ुएला सीरिया नहीं है- ना इस मामले में और ना ही कई अन्य मामलों में।”
इस बात का अहसास ट्रंप को भी था। तभी मदुरो को “पकड़ने” का एलान करते समय ही उन्होंने और हमलों की धमकी दी। तो एक बार फिर लौतेरो रिवारा के शब्दों में कहें, तो हुआ यह कि ‘इस अजीब भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात पर अमेरिका ने राजा को मात दी (यानी मादुरो को पकड़ लिया), लेकिन इससे उसने खेल नहीं जीता।’ मदुरो के अपहरण के बाद भी काराकस और बाकी देश पर चाविस्मो के प्रति वफादार ताक़तों का नियंत्रण कायम रहा।
बल्कि, उसके बाद हुआ यह कि मदुरो और उनकी पार्टी PSUV के विरोधी रहे जन समुदाय का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा देश की संप्रभुता के उल्लंघन से आहत हुआ। उसने सड़कों पर उतर कर खुलेआम अपना आक्रोश व्यक्त किया। इस रूप में कहा जा सकता है कि वेनेजुएला को अपने अवैध हमले का निशाना बनाने का ट्रंप का दांव उलटा पड़ा है। इससे देश के अंदर जैसी एकजुटता पैदा हुई है, वैसा हाल के वर्षों में कभी नहीं देखी गई। इससे ट्रंप खेमे में बेचैनी साफ नजर आई है।
आने वाले दिनों में ट्रंप अगर डेल्सी रोड्रिगेज की सरकार या चाविस्ता समूहों को फिर से अपने हमलों का निशाना बनाते हैं, तो उसके लिए लंबे युद्ध में उतरने की तैयारी उन्हें करनी होगी। अमेरिका के मशहूर राजनीति-शास्त्री जॉन मियरशाइमर इसे अति महत्त्वपूर्ण माना है कि मदुरो के अपहरण के बाद वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने अविलंब फैसला लिया और उप-राष्ट्रपति रोड्रिगेज को संवैधानिक रूप से पूर्ण राष्ट्रपति की शक्तियां दे दीं। यानी रोड्रिगेज सिर्फ ‘अंतरिम नेता’ नहीं रहीं।
बल्कि इस घटनाक्रम ने उन्हें विदेशी हमले के खिलाफ वेनेजुएला के राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया है। मियरशाइमर ने ध्यान दिलाया है कि वेनेजुएला का मिलिशिया नेटवर्क (सशस्त्र समूह), सामुदायिक परिषदें, मजदूर यूनियनें आदि सब सक्रिय हो गए और यह दिखाया है कि वे युद्ध के लिए तैयार हैं। यानी अमेरिका ने अगर सोचा था कि मदुरो को हटाकर वह आसानी से वेनेजुएला को अपने नियंत्रण में ले लेगा, तो फिलहाल वह गलत साबित हुआ है। उसके हमले ने वेनेजुएला में अंदरूनी एकता पैदा कर दी है। इससे अंतरिम सरकार को वैधता (legitimacy) मिली है। मियरशाइमर के मुताबिक ऐसी वैधता सैन्य शक्ति से ज्यादा ताकतवर होती है। ((3) How Delcy Rodriguez Became Resistance Icon in 30 Hours | John Mearsheimer – YouTube)
वेनेजुएला में उगो चावेज ने कम्यून आधारित शासन प्रणाली की शुरुआत की थी। इसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों कम्यून हैं, जिन्हें काफी हद तक खुदमुख्तारी हासिल है। ये इकाइयां राजनीतिक प्रशिक्षण का भी एक स्थल हैं। जैसे-जैसे अमेरिकी हमलों का खतरा बढ़ा, कम्यून्स और अपनी पार्टी से जुड़े लाखों लोगों के बीच मदुरो सरकार ने हथियार वितरित किए। डेल्सी रोड्रिगेज सरकार ने उन सबको देश की रक्षा के लिए सक्रिय होने का निर्देश दिया है। इस रूप में वेनेजुएला ने अमेरिका के खिलाफ लंबे ‘जन युद्ध’ की तैयारी की है।
तीन जनवरी के हमले के बाद वेनेजुएला के पूर्व राजनयिक और अब भू-राजनीतिक विश्लेषक कार्लोस रॉन ने एक इंटरव्यू में कहा- ‘मेरी राय में प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक भागीदारी के कारण कम्यून वेनेजुएला में हुई क्रांति की सबसे बड़ी एवं सर्वाधिक टिकाऊ सफलता साबित हुए हैँ। मेरी राय में यह महानतम उपलब्धि है।’ (Inside Venezuela’s Response to Donald Trump’s Attack)। अपने इसी अंदरूनी ढांचे के कारण वेनेजुएला दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति के हमलों के बाद तीन दिन के अंदर फिर से उठ खड़ा हुआ, जबकि उन हमलों में उसके नेता को अपहृत कर लिया गया था।
वेनेजुएला की नई सरकार ने मदुरो को वापस लाने का प्रयास करने के लिए एक आयोग बनाया है। साथ ही अमेरिकी हमलों के दौरान भितरघात करने वालों की पहचान के लिए विस्तृत जांच शुरू की गई है। मगर साथ ही एक कुशल राजनेता की तरह रोड्रिगेज ने अपने देश को नए अमेरिकी हमलों से बचाने की कोशिश की है, ताकि चाविस्मो की भावना के अनुरूप बोलिवेरियन गणराज्य को सुरक्षित रखा जा सके। रोड्रिगेज ने ट्रंप को संबोधित अपने वक्तव्य में लहजा मेलमिलाप का रखा, लेकिन अपने राष्ट्र के मूलभूत सिद्धांतों को दोहराने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की। उनके बयान की ये पंक्तियां गौरतलब हैः
“हमारी प्राथमिकता अमेरिका एवं इस क्षेत्र के अन्य देशों के साथ ऐसे संतुलित एवं सम्मानजनक अंतरराष्ट्रीय संबंध की तरफ बढ़ना है, जो संप्रभुता की समानता एवं अहस्तक्षेप पर आधारित हो। यही सिद्धांत बाकी दुनिया के साथ हमारी कूटनीति के भी मार्गदर्शक हैं। हम अमेरिका को सहयोग के एक ऐसे एजेंडे पर मेलजोल के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत साझा विकास की ओर उन्मुख हो, और जिससे साझा सामुदायिक सह-अस्तिव की भावना मजबूत हो।।।।
राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, हमारी जनता और हमारे क्षेत्र को शांति एवं संवाद का अधिकार है। यही राष्ट्रपति निकोलस मदुरो का संदेश रहा है और यही अब भी वेनेजुएला का संदेश है। वेनेजुएला के इसी रूप में मेरा यकीन रहा है, जिसके लिए मैंने अपनी जिंदगी समर्पित की है।”
इस बयान को कुछ हलकों में रोड्रिगेज के समर्पण के रूप में पेश किया गया। ऐसा करते हुए इस तथ्य की उपेक्षा कर दी गई कि राष्ट्रपति मदुरो ने गुजरे वर्षों के दौरान ऐसे कई संदेश अमेरिका को भेजे थे, जिसे अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता एवं अक्खड़पन के कारण अमेरिका ने ठुकरा दिया। अब उसी संदेश को रोड्रिगेज ने दोहराया, तो उसके बाद ट्रंप ने एलान किया कि वेनेजुएला के “अंतरिम अधिकारी” अमेरिका को तीन से पांच करोड़ बैरल तक उच्च गुणवत्ता का प्रतिबंधित कच्चा तेल देंगे, जिन्हें “बाजार दर” पर बेचा जाएगा और प्राप्त पैसे का इस्तेमाल “वेनेजुएला और अमेरिका की जनता के लाभ” के लिए किया जाएगा।
गौरतलब है कि जिस तेल की बात हुई है, वह प्रतिबंधित है, उसकी बिक्री बाजार दर पर होगी, और उसका लाभ वेनेजुएला की जनता को मिलेगा। ये वो तेल है, जिसे वर्षों से वेनेजुएला नहीं बेच पा रहा था। वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था तेल की बिक्री पर काफी हद तक निर्भर है। नई परिस्थितियों में खुद ट्रंप उस तेल को लेकर उसकी बिक्री कर उसका लाभ वेनेजुएला की जनता को देने की बात कर रहे हैं। बेशक बड़बोलेन की अपनी आदत के कारण ट्रंप ने इसे अपनी जीत के रूप पेश किया है, जबकि हकीकत यह है कि यह चाविस्मो का खात्मा करने में अमेरिका की नाकामी को जाहिर करता है।
सवाल यह है कि अगर यह नाकामी टिकाऊ हुई, तो फिर उससे अमेरिकी साम्राज्य के रुतबे को लेकर क्या संदेश जाएगा? क्या यह धारणा तब मजबूत नहीं होगी कि अपने कथित प्रभाव क्षेत्र में भी अमेरिका सैन्य कार्रवाई के बावजूद उस कार्रवाई के मकसद को आंशिक रूप से ही हासिल सका? जिस क्षेत्र पर ध्यान देने के लिए फिलहाल उसने अपने कदम चीन और रूस के मोर्चों से वापस खींचे हैं, वहां भी अगर उसकी ताकत की ऐसी सीमा सामने आई, तो फिर उसका वर्चस्व क्षीण होने एवं साम्राज्य के ढहने की धारणा क्या और मजबूत नहीं होगी?
इन प्रश्नों को लेकर अभी तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इन प्रश्नों का कायम रहना ही अपने-आप में महत्त्वपूर्ण है। इन प्रश्नों की पृष्ठभूमि में वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया आदि के अनुभव हैं, जहां विनाश की घोर त्रासद कथा लिखने के बावजूद अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्य को प्राप्त नहीं सका। लेकिन तब अमेरिका का सॉफ्ट पॉवर इतना सशक्त था कि उसकी नाकामियां विश्व कथानक का हिस्सा नहीं बन पाती थीं। अब वह शक्ति काफी क्षीण हो चुकी है। फिर तब अमेरिका इतना शक्तिशाली था कि लोकतंत्र एवं विश्व व्यवस्था के रक्षक की छवि बरकरार रखते हुए भी उसके विपरीत आचरण करते रहने में वह सफल रहता था। गुजरे वर्षों में वो आवरण धीरे-धीरे उतरता चला गया है। ट्रंप काल में तो अमेरिका को अपनी साम्राज्यवादी मंशाओं को पूरा करने के लिए नग्न होना पड़ रहा है। दुनिया फिलहाल हैरत के साथ यह नंगा नाच देख रही है, मगर वह इन नग्नता के पीछे की कमजोरी भी देख रही है। इसीलिए ये संभावना बनी हुई है कि वेनेजुएला में ट्रंप प्रशासन ने जो दुस्साहस दिखाया, उससे अपने आखिरी परिणाम में अमेरिकी शक्ति एवं रुतबे की एक और कब्रगाह तैयार हुई हो!


