क्या 15 साल की एंटी इन्कम्बैंसी के कारण उनकी स्थिति कमजोर हुई है? ध्यान रहे ल़ड़ना, भिड़ना उनके स्वभाव का हिस्सा है और एक समय राज्य के लोगों ने इसे पसंद भी किया। लेकिन अब इसकी तीव्रता बढ़ती जा रही है। उनके स्वभाव की उग्रता का असर उनकी पूरी पार्टी के ऊपर दिख रहा है।… उनकी देखा देखी पार्टी के दूसरे नेता भी इसी भाषा और शैली का इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे राजनीतिक मूल्यों का क्षरण होता है और पूरे देश की नजर में पश्चिम बंगाल की छवि खराब होती है।
देश के जितने बड़े नेता हुए उन्होंने राजनीति का अपना एक तरीका विकसित किया। कुछ नेताओं के मामले में तरीका उस नेता के राजनीतिक प्रशिक्षण पर निर्भर रहा तो कई जगह राज्य की स्थानीय राजनीति के चरित्र पर निर्भर रहा। पश्चिम बंगाल में दशकों तक सीपीएम के नेतृत्व वाले वामपंथी मोर्चे ने जैसा राजनीतिक वातावरण निर्मित किया उसमें आक्रामक प्रतिरोध यानी सतत टकराव ही सफल होने का एकमात्र रास्ता था। ममता बनर्जी ने वामपंथी मोर्चा से लड़ने के लिए टकराव का रास्ता चुना और दुर्भाग्य से सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने वह रास्ता नहीं छोड़ा। टकराव की उस सतत राजनीति का परिणाम राज्य का ताजा घटनाक्रम है। यहां क्षेपक की तरह यह बताना जरूरी है कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व भी उस रास्ते पर चल रहा है, जो रास्ता ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे से टक्कर के लिए चुना था। भाजपा ने भी तृणमूल कांग्रेस से लड़ने के लिए सतत टकराव का रास्ता चुना है।
बहरहाल. केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की कार्रवाई पर जैसी प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री ने दी उससे कई सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल तो प्रतिक्रिया के तौर तरीके को लेकर है। केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई एक सतत प्रक्रिया है, जो देश के अलग अलग हिस्सों में चलती रहती है। लगभग सभी विपक्षी पार्टियां एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताती हैं और केंद्र सरकार के ऊपर एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप भी लगाती हैं। लेकिन यह कहीं भी देखने को नहीं मिलता है कि एजेंसियों की कार्रवाई का हिंसक विरोध है।
अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे अधिकारियों को डराने, धमकाने का काम भी कहीं नहीं होता है। एजेंसियों के अधिकारियों के हाथ से जब्त किए गए फिजिकल और इलेक्ट्रोनिक सबूत छीन लेना तो एक अति है, जो पिछले दिनों राजधानी कोलकाता में हुई और वह भी राज्य शासन के सर्वोच्च पर बैठे व्यक्ति द्वारा! इससे एक बेहद खराब मिसाल बनती है, जो अंततः सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी गरिमा को प्रभावित करती है।
कोलकाता में गुरुवार, आठ जनवरी को ईडी की कार्रवाई पिछले पांच साल से ज्यादा समय से चल रही जांच का परिणाम थी। कोयले की तस्करी के मामले में ईडी ने 2020 में दर्ज एफआईआर के आधार पर ईसीआईआर दर्ज की थी। जांच में पता चला कि कोयले के अवैध खनन और कारोबार के जरिए करोड़ों करोड़ रुपए की अनियमितता हुई है। ईडी ने कोयले के अवैध खनन और तस्करी के मामले में अनूप माझी उर्फ लाला को आरोपी बनाया है। एजेंसी की जांच से पता चला है कि माझी उर्फ लाला ने शाकम्भरी ग्रुप ऑफ कंपनीज सहित कई अन्य कंपनियों को कोयला बेचा, जिसका उन्होंने आगे कारोबार किया और हवाला के जरिए करोडों रुपए का लेन देन हुआ। इसी जांच के सिलसिले में ईडी प्रतीक जैन तक पहुंची। उसके मुताबिक शाकम्भरी ग्रुप ऑफ कंपनी से जुड़े हवाला ऑपरेटर्स के जरिए आईपैक कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड को करोड़ों रुपए दिए गए। ईडी ने आठ जनवरी को कोलकाता और दिल्ली में 10 ठिकानों पर छापेमारी की तो उसमें एक ठिकाना प्रतीक जैन का घर भी था, जो आईपैक के प्रमुख हैं।
आईपैक इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनाव प्रबंधन का काम संभाल रही है। कह सकते हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव लड़ाने का काम पूरी तरह से इसी कंपनी के हवाले कर दिया है। तभी तृणमूल कांग्रेस की टिकट के दावेदार या बड़े नेता भी प्रतीक जैन के आगे पीछे चक्कर काटते हैं। बहरहाल, ईडी की टीम ने जब प्रतीक जैन के यहां छापा मारा तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वंय वहां पहुंच गईं।
बड़े पुलिस अधिकारियों और बड़े पुलिस बल के साथ वहां पहुंच कर ममता बनर्जी ने ईडी के अधिकारियों द्वारा जब्त किए गए दस्तावेज और इलेक्ट्रोनिक डिवाइसेज छीन लिए। इससे सबसे पहले प्रोपराइटी यानी आचरण का सवाल उठता है। क्या मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर आसीन किसी व्यक्ति को अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे अधिकारियों के साथ इस तरह का बरताव करना उचित है? यह कानूनी और नैतिक दोनों कसौटियों पर गलत है। यह सरकारी कामकाज में बाधा डालने और संज्ञेय अपराध के संभावित सबूतों को नष्ट करने का मामला बनता है।
इसके बाद प्रश्न है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐसा क्यों किया? क्या टकराव के अपने राजनीतिक प्रशिक्षण से बनी आदत के कारण उन्होंने केंद्रीय एजेंसी की जांच में बाधा डाली और केंद्र सरकार के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी के साथ टकराव का नया मोर्चा खोला या कुछ और कारण है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में चुनाव प्रबंधन करने वाली संस्था आईपैक को हवाला के जरिए पैसे देने के सबूत मिले थे और वह सबूत तृणमूल कांग्रेस के साथ साथ ममता बनर्जी की सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले थे? अगर ऐसा है तो यह बहुत बड़ा मामला बन सकता है। तब राज्य की सरकार और सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस के ऊपर कोयले का अवैध खनन करने, उसकी तस्करी कराने और हवाला के जरिए काले धन का लेन देन करने के आरोप लगेंगे।
चुनाव से तीन महीने पहले इस तरह के आरोप और सबूतों के सामने आने का तृणमूल कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है। क्या इसलिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सबूत छीन लिए? लेकिन क्या कुछ सबूत छीन लेने से यह मामला समाप्त हो जाएगा? हो सकता है कि इससे संदेह और गहराए। आम नागरिकों को समझ में आए कि अपराध छिपाने के लिए ऐसा किया गया। ध्यान रहे इससे पहले भी देश की प्रीमियम जांच एजेंसी सीबीआई की जांच में भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा बाधा डालने का घटनाक्रम हुआ था। अंतर इतना है कि इस समय उनकी सरकार के कई मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी और मुख्यमंत्री सीबीआई की कार्रवाई के खिलाफ धरने पर बैठ गई थीं।
केंद्र सरकार के साथ विपक्षी पार्टियों का टकराव एक बात है। उसकी नीतियों का लोकतांत्रिक तरीके विरोध राजनीति का सर्वमान्य सिद्धांत है। लेकिन एजेंसियों की जांच में बाधा डालना, कार्रवाई रोकना, सबूत छीन कर नष्ट करना ये कुछ ऐसे काम हैं, जिनके लिए पश्चिम बंगाल बदनाम हो रहा है। यह पूरे देश में चर्चा का विषय है कि एक राज्य की मुख्यमंत्री ने ईडी से सबूत छीन लिए या जांच को बाधित किया। हो सकता है कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ लोगों को यह बात अच्छी लगे और वे इसका प्रचार इस रूप में करें कि देखो, हमारी नेता कितनी लड़ाकू है। लेकिन तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों में भी बहुत से लोग ऐसे होंगे, जिनको यह बात अच्छी नहीं लगेगी कि उनके राज्य की चुनी हुई मुख्यमंत्री इस तरह का आचरण करे। ममता बनर्जी भी निश्चित रूप से इस बात को समझती होंगी क्योंकि उन्होंने अभी तक जनभावना को ध्यान में रख कर ही राजनीति की है।
तभी यह सवाल भी उठता है कि क्या यह उनकी खीज है या हार की संभावना से उपजी बौखलाहट है? क्या भारतीय जनता पार्टी की चुनावी तैयारियों, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के दौरों ने उनको चिंता में डाला है? क्या 15 साल की एंटी इन्कम्बैंसी के कारण उनकी स्थिति कमजोर हुई है? ध्यान रहे ल़ड़ना, भिड़ना उनके स्वभाव का हिस्सा है और एक समय राज्य के लोगों ने इसे पसंद भी किया। लेकिन अब इसकी तीव्रता बढ़ती जा रही है। उनके स्वभाव की उग्रता का असर उनकी पूरी पार्टी के ऊपर दिख रहा है। वे देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के लिए जिस तरह के अपमानजनक विशेषणों का प्रयोग करती हैं या चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर जिस भाषा में हमला करती हैं या राज्यपाल के संवैधानिक पद को लेकर जैसी टिप्पणी करती हैं उससे राजनीति का स्तर और गिरता है।
उनकी देखा देखी पार्टी के दूसरे नेता भी इसी भाषा और शैली का इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे राजनीतिक मूल्यों का क्षरण होता है और पूरे देश की नजर में पश्चिम बंगाल की छवि खराब होती है। यह भी दुर्भाग्य है कि 1977 के बाद से ही पश्चिम बंगाल में केंद्र की विरोधी पार्टियों की सरकार ही बनती रही है। इस वजह से केंद्र और राज्य का टकराव लगातार बना रहता है, जिसका नुकसान लंबे समय से बंगाल और बंगाली समुदाय को भुगतना पड़ा है।
बहरहाल, ईडी की कार्रवाई के दौरान वहां पहुंच कर सबूत छीन कर ले जाने को यह कह कर सही ठहराया जा रहा है कि एजेंसियों के सहारे तृणमूल कांग्रेस की सारी चुनाव रणनीति की जानकारी हासिल करने के लिए छापा मरवाया गया। यह एक किस्म का पूर्वाग्रह है, जो देश की सरकार और केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को प्रभावित करता है। यह भी हैरानी की बात है कि ममता बनर्जी जैसी नेता चुनाव प्रबंधन का काम करने वाली एजेंसी के सहारे चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं। अगर उनकी बातों पर यकीन किया जाए तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि आईपैक सारे काम कर रहा है। वही तय कर रहा है कि किस विधायक की टिकट कटेगी, किसी मिलेगी, कौन संभावित उम्मीदवार होगा, क्या चुनावी मुद्दे होंगे, क्या नारे होंगे आदि आदि। क्या यह काम राजनीतिक दल का नहीं होता है?
अगर ये सारे काम चुनाव प्रबंधन करने वाली एजेंसी कर रही है तो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस क्या कर रहे हैं? उनके पास इतने पुराने नेता हैं वे क्या कर रहे हैं? क्या पार्टी की बजाय ममता बनर्जी पूरी तरह एक एजेंसी पर निर्भर हो गई हैं? अगर ऐसा है तो वे चुनाव में भाजपा का मुकाबला कैसे करेंगी? उन्होंने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी उससे कहीं न कहीं लग रहा है कि उस एजेंसी के पास सरकार और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े गहरे राज हैं। उसका सामने आना ममता बनर्जी अफोर्ड नहीं कर सकती हैं। इसलिए पैनिक में आकर उन्होंने केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाई में बाधा डाली। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


