ममता ने भरोसा पहले गंवाया!
भारत के कोई सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव इसलिए नहीं हारती कि कोई विकल्प आ खड़ा हुआ है। उसका पतन तब होता है, जब विश्वास खत्म हो जाता है। और लगभग चुपचाप विकल्प शक्ल पा जाता है। यही आज के चुनाव नतीजों का लबोलुआब है। सत्ता बहसबाजी से नहीं, भरोसे के खिसकने से हारती है। राजनीति चालबाज हो सकती है। नेता उससे भी ज्यादा चालाक होते हैं। लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब जनता दोनों को असहज कर देती है। वह न बहस करती है, न अपने इरादे की घोषणा करती है। वह बस अपना विश्वास खींच लेती है। और जैसे...