एक बड़े स्वप्नदृष्टा के रूप में विवेकानंद ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसमें धर्म अथवा जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे। उनका आत्मा और परमात्मा में अनन्य विश्वास था। उनके अनुसार भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर सभी नदियों के समुद्र में मिल जाने की भांति ही भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में आकर परमात्मा में ही मिल जाते हैं।
12 जनवरी -स्वामी विवेकानंद जयंती
मात्र 39 वर्ष 5 माह और 22 दिन के अपने अल्प जीवनकाल में संपूर्ण विश्व को भारत की सनातन संस्कृति, अध्यात्म और दर्शन से परिचित कराते हुए देश का सम्मान बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी 1863 – 4 जुलाई 1902) न केवल एक महान संत, वेदांत के विख्यात व प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्मरण, नमन और वंदन किए जाते हैं, बल्कि वे एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी के रूप में भी याद किए जाते हैं।
अमेरिका स्थित शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में 11 व 27 सितम्बर 1893 को भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके द्वारा दिए गए प्रसिद्ध संबोधन के बाद उन्होंने संपूर्ण विश्व में प्रसिद्धि की उस ऊँची शिखर-रेखा को छू लिया, जिसे पाना प्रायः असंभव ही माना जाता है। कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में पिता प्रसिद्ध वकील विश्वनाथ दत्त व माता धर्मपरायणी भुवनेश्वरी देवी के घर 12 जनवरी 1863 को पुत्र नरेंद्र दत्त के रूप में जन्मे और बाल्यकाल से ही अध्यात्म की ओर झुकाव रखने वाले स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस के प्रिय व सुयोग्य शिष्य थे।
वे अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपने गुरु से ही यह सीखा था कि सभी जीवों में स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व है। इसलिए मानव जाति का धर्म वह है, जो मनुष्य दूसरे जरूरतमंदों की मदद करता है। जब हम दूसरों की मदद करते हैं, तो हम परमात्मा की ही सेवा करते हैं। अर्थात सेवा के माध्यम से परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। अज्ञानी लोग जिसे मनुष्य कहते हैं, मैं उस नारायण का सेवक हूँ—अर्थात नर सेवा-नारायण सेवा का मंत्र देने वाले स्वामी विवेकानंद के द्वारा 1 मई 1897 को स्थापित रामकृष्ण मिशन अपने 130 से अधिक केंद्रों के साथ आज भी संपूर्ण विश्व में उनके विचारों को प्रसारित करते हुए सेवा का अपना कार्य कर रहा है।
मात्र 25 वर्ष की आयु में भगवा वस्त्र धारण कर संन्यासत्व ग्रहण करने वाले स्वामी विवेकानंद ने अपने अल्पकालिक जीवन को मानवता के लिए नर सेवा-नारायण सेवा के पालक रूप में प्रत्यक्षतः जिया। यही कारण है कि उनके संसार से जाने के लगभग 124 वर्ष बाद भी न सिर्फ भारत बल्कि संपूर्ण विश्व उन्हें एक प्रेरणा के रूप में याद कर रहा है। उनके शिष्यों व अनुयायियों के अनुसार स्वामी विवेकानंद वह विश्वव्यापी विचार हैं, जिसे न सिर्फ भारत के युवाओं ने बल्कि विश्व के युवाओं ने भी स्वीकार किया है, और उनके विचारों को सनातन रूप में आत्मसात किया है।
युवाओं को विचारोत्तेजक बनाने, उत्प्रेरित करने वाले ऐसे विचारों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन 1984 ईस्वी को अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया था। भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए सार्वभौमिक विमर्शों से संवाद प्रस्थापना की प्रमुख विशेषता रखने वाले सनातनीय विचारों के कारण स्वामी विवेकानंद को विश्व के द्वारा मान्यता प्राप्त होते देख भारत सरकार को भी इसके महत्व का ध्यान रखते हुए सन 1984 से 12 जनवरी अर्थात स्वामी विवेकानंद जयंती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देश भर में मनाए जाने की घोषणा करनी पड़ी। तब से स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस पर प्रतिवर्ष 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है और इस अवसर पर राष्ट्रीय युवा उत्सव का आयोजन किया जाता है।
यह उत्सव भारत की युवा ऊर्जा, रचनात्मकता और राष्ट्र निर्माण की भावना का सशक्त प्रतीक है। 12 जनवरी 2026 को स्वामी विवेकानंद की 163वीं जयंती है। भारत की युवा शक्ति के लिए रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता और विकसित भारत के संकल्प में सहभागी बनने का यह सुनहरा अवसर है। युवा शक्ति राष्ट्र की पहचान है और युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। इसलिए युवाओं को स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध संदेश—उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए—से प्रेरणा लेने के लिए आह्वान करने का अवसर है।
इससे ही स्वामी विवेकानंद के द्वारा किए गए उस महाभविष्यवाणी के सत्य सिद्ध होने की उम्मीद जग सकेगी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत एक बार फिर समृद्धि तथा शक्ति की महान ऊँचाइयों पर उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जाएगा, भारत पुनः विश्व गुरु बनेगा, जो पूरे संसार का पथप्रदर्शन करने में समर्थ होगा। उन्होंने घोषणा की थी कि भारत का विश्व गुरु बनना केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व के हित में होगा। अपनी आध्यात्मिक शक्ति, गौरवपूर्ण संस्कृति, संस्कारों से ओतप्रोत अद्भुत सामर्थ्य, वैश्विक शांति और सौहार्द के लिए वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय दर्शन और मानव कल्याण की प्रेरणा देने वाले सनातन धर्म के कारण ही भारत विश्वगुरु की प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा। इसलिए इस अवसर पर चहुँओर इस बात की गूंज सुनाई देनी चाहिए कि सनातन मार्ग पर चलने में ही संपूर्ण विश्व का कल्याण निहित है।
उल्लेखनीय है कि विद्यालयीन शिक्षा के रूप में सन 1871 में आठ वर्ष की उम्र में नरेंद्रदत्त नाम से कलकत्ता के ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में शिक्षारंभ, 1879 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन, तत्पश्चात 1880 में जनरल असेम्बली इंस्टिट्यूशन (वर्तमान के स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से 1881 में ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी करने वाले विवेकानंद आरंभ से ही दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित अन्य विषयों के प्रति अत्यंत उत्साहित रहते, रुचि रखते व उत्कंठा प्रदर्शित करते हुए विद्यार्थी थे।
विवेकानंद में गहरी धार्मिक भावना और सत्य जानने के लिए अध्ययन की उत्कट इच्छा बाल्यकाल से ही देखने को मिलती थी। इनकी वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अन्यान्य प्राचीन भारतीय शास्त्रों में भी गहन रुचि थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रवीणता प्राप्त, नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम व खेलों में भाग लेने वाले नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेम्बली इंस्टिट्यूशन (वर्तमान के स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में गहनता से किया था।
स्कॉटिश चर्च कॉलेज से 1884 में कला स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बांगला भाषा में सृजित साहित्य के साथ ही डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जॉर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर शोपेनहावर, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल, चार्ल्स डार्विन आदि पश्चिमी विद्वानों के कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन किया। हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से अत्यंत प्रभावित विवेकानंद ने 1860 में स्पेंसर की किताब एजुकेशन का बांगला में अनुवाद किया।
उन्होंने हिन्दी में संगीत कल्पतरु, कर्म योग, राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग सहित अंग्रेजी भाषा में कई पुस्तकों की रचना की। उनके भाषण वाक्पटुता और सनातन सत्य-विचारों से युक्त शाश्वत प्रतिभा से प्रभावित होकर लोग इन्हें श्रुतिधर अर्थात विलक्षण स्मृति वाला व्यक्ति कहा करते थे। ऐसे विलक्षण प्रतिभावान नरेंद्र सार्वजनिक कार्य हेतु 1880 में केशवचंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व वाली ब्रह्मसमाज की नवविधान में शामिल हुए। 1881-1884 के दौरान धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करने वाली संस्था सेन्स बैंड ऑफ़ होप के सक्रिय सदस्य भी रहे। भारतीय व पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ समन्वित उनके प्रारंभिक विश्वासों को एक निराकार ईश्वर में विश्वास रखने और मूर्ति-पूजा का प्रतिवाद करने वाली संस्था ब्रह्मसमाज ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं, धर्मशास्त्र, वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्ययन पर प्रोत्साहित किया। उनके अनुसार जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे।
वेदांत के सिद्धांतों को भी उन्होंने इसी रूप में रखा। पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के विरुद्ध सख्त रुख अपनाने वाले विवेकानंद ने धर्म को मनुष्य की सेवा के केंद्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। यही कारण है कि अपने जीवनकाल में सर्वत्र वे धर्म को रूढ़ियों से मुक्त कर समाज सेवा से जोड़ने की वकालत करते दिखाई देते हैं। बाल्यावस्था और युवावस्था में ही उनके मन में भारतीय संस्कृति और समाज की बेहतरी के लिए एक जुनून और प्रतिबद्धता पैदा हो गई थी। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के शुरुआती दिनों में ही समाज में व्याप्त अंधविश्वास, भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया था। उनका यह मानना था कि भारतीय समाज को पुनः जागृत करने और उसे अपनी प्राचीन महानता की ओर वापस लौटने की जरूरत थी।
16 अगस्त 1886 को गुरु रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद विवेकानंद ने ब्रिटिश भारत में तत्कालीन स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा की। तत्पश्चात विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। विवेकानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में भारतीय सनातन दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया।
ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी, ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों के लिए संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध विवेकानंद ने जीवन के अंतिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रातः दो-तीन घंटे ध्यान में व्यतीत करने के बाद ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरंध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चंदन लकड़ी की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गई। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अंतिम संस्कार हुआ था।
एक बड़े स्वप्नदृष्टा के रूप में विवेकानंद ने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जिसमें धर्म अथवा जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद न रहे। उनका आत्मा और परमात्मा में अनन्य विश्वास था। उनके अनुसार भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर सभी नदियों के समुद्र में मिल जाने की भांति ही भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में आकर परमात्मा में ही मिल जाते हैं।
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि अपने जीवन के मात्र उनतालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद के द्वारा किए गए कार्य आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। यही कारण है कि भारत में स्वामी विवेकानंद को एक देशभक्त युवा संन्यासी के रूप में माना, जाना और पूजा जाता है तथा उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाकर उत्साहित, ऊर्जस्वित और गौरवान्वित महसूस किया जाता है।


