राहुल का लोकसभा में बोलना, मोदी को चैलेंज करना, विभिन्न समुदायों से मिलना, सबकी आवाज उठाना और कांग्रेस के मूल सिद्धांतों गरीब समर्थक, धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशीलता पर अडिग रहना सब ठीक है। मगर उनसे मिलना आज भी पार्टी में सहज सुलभ नहीं माना जाता है। और उनकी सोच से हटकर उन्हे किसी अलग बात के लिए तैयार करना सर्वथा मुश्किल। संगठन के लिए यह चीजें अच्छी नहीं मानी जातीं।
कांग्रेस ने जिस 2025 को संगठन का साल घोषित किया था वह खतम हो गया है। और यह सवाल मौजूद है कि पार्टी ने संगठन के साल का उपयोग कितना किया? क्या हुआ, यह देखा जाना बाकी है। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस पर सवाल उठाया है मगर उस पर पार्टी में चर्चा नहीं हुई। यह सही है कि उनका उदाहरण गलत था। मगर सवाल नहीं। आरएसएस बीजेपी कांग्रेस का आदर्श नहीं हो सकती।
उसके अनुशासन के बारे में आजादी के ठीक बाद कांग्रेस के नेता चौधरी ब्रह्मप्रकाश ने लिखा था कि “ मैं यह तो मानता हूं कि आर एस एस के लोग अनुशासित हैं। उन्हे विनम्रता दिखाने की ट्रेनिंग मिली है मगर उन्हें चरित्र हनन के लिए कानाफूसी का अभियान चलाने की भी पूरी ट्रेनिंग मिली है। विनम्रतापूर्वक नमस्ते करने वाले हाथों को असहमत व्यक्तियों की पीठ में छूरा घोंपने की भी पूरी ट्रेनिंग मिली है।“
चौधरी ब्रह्मप्राश ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। वे दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री थे। और शेर ए दिल्ली के नाम से मशहूर थे। उन्होंने आरएसएस के बारे में यह दिल्ली के उस समय के जनसंघ के नेता केदारनाथ साहनी के एक पत्र के जवाब में लिखा था जिसमें साहनी जी उन्हें आरएसएस के एक समारोह में आने का निमंत्रण दे रहे थे। जैसा आज संघ के नेता कहते हैं कि आप संघ को नहीं जानते और उसे इसके माध्यम से नहीं उसके माध्यम से नहीं जान सकते वैसा ही शुरू से कहते रहे हैं।
चौधरी ब्रह्मप्रकाश ने यह भी लिखा कि आपने मुझे निमंत्रण दिया है कि ताकि संघ के बारे में मेरी जानकारी बढ़े और गलतफहमी दूर हो। क्या आपका ख्याल है कि अनुशासित परेड, शारीरिक व्यायाम देखकर और घिसे पिटे उपदेश सुनकर कोई यकीन कर लेगा कि आरएसएस एक निरीह संगठन है? यह बच्चों और उन लोगों के लिए आकर्षक हो सकते हैं जो संघ को नहीं जानते। मेरे जैसे लोग जो संघ को जानते हैं इस पाखंडपूर्ण विनम्रता और अनुशासन से धोखा नहीं खा सकते।
दिग्विजय सिंह मोदी को आडवानी के चरणों में बैठा देख कर धोखा खा गए। कांग्रेस के और बहुत सारे लोग खा जाते हैं। मगर यह सही है कि राहुल नहीं खाते। नेहरू के बाद कांग्रेस में संघ के खिलाफ सबसे मजबूत लड़ाई राहुल गांधी लड़ रहे हैं। देश भर में अलग अलग अदालतों में कई मुकदमे उन पर लगा दिए गए हैं। लेकिन संघ से और मोदी से लड़ना एक बात है और पार्टी को मजबूत करना अलग।
राहुल को राजनीति में आए 21 साल से ज्यादा हो रहे हैं। प्रियंका गांधी उनसे छोटी है मगर राजनीति करते हुए उन्हें राहुल से ज्यादा समय हो गया। अमेठी और रायबरेली वे ही देखती थीं। और 2004 में राहुल को चुनाव लड़वाने के लिए वे ही लेकर गईं थी। उनके एक भाषण ने अरुण नेहरु को चुनाव हरवा दिया था। 1999 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से कांग्रेस के प्रत्याशी
कैप्टन सतीश शर्मा थे। अरुण नेहरू भाजपा से लड़ रहे थे। उस समय प्रियंका ने एक जज्बाती भाषण दिया था कि क्या मेरे पिता की पीठ में छूरा मारने वाले को जिताओगे? और मजबूत माने जाने वाले अरुण नेहरू चुनाव हार गए थे।
लेकिन सक्रिय राजनीति में प्रियंका को आने में बहुत देर लगी। और लोकसभा तो अभी एक साल पहले मिली। प्रियंका राहुल को अपना नेता मानती हैं। कई साल पहले रामलीला मैदान की एक सभा में जब कांग्रेस में राहुल के नेतृत्व में सवाल उठ रहे थे तो प्रियंका ने अपने भाषण की शुरुआत यह कहकर की थी मेरे नेता राहुल गांधी लेकिन 2025 भी निकल गया। संगठन का साल। मगर प्रियंका फिर भी बिना विभाग की महामंत्री बनी रहीं। कृपया असम की स्क्रिनिंग कमेटी का उदाहरण मत दीजिए। इस पर बहुत लोगों ने प्रियंका को बधाई दे दी। कई कहानियां लिख दीं। मगर जानने वाले जानते हैं कि स्क्रिनिंग कमेटी कुछ नहीं होती है।
एक छोटे से समय के लिए तदर्थ व्यवस्था। आज की भाषा में ऐंवे ही! टिकटों के मामले में जिला कांग्रेस कमेटी इससे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। जो प्राथमिक रूप से प्रत्याशियों का पैनल बनाकर भेजती है। फिर राज्य की स्क्रिनिंग कमेटी इनकी छानबीन करके केन्द्रीय चुनाव समिति (सीईसी) को भेजती है। जो नामों की घोषणा करती है। प्रत्याशियों के चयन में सबसे बड़ा रोल वैसे तो हाईकमान का होता है मगर औपचारिकता की दृष्टि से सीईसी का।
स्क्रिनिंग कमेटी में कभी नंबर वन के नेता नहीं होते हैं। उसके बाद के नेताओं को यहां एडजस्ट किया जाता है। जैसे अभी प्रिंयका के साथ केरल में मधुसूदन मिस्त्री, तमिलनाडु में टीएससिंह देव, बंगाल में बीके हरिप्रसाद को स्क्रिनिंग कमेटी का चैयरमेन बनाया गया है। इससे पहले बिहार और हरियाणा चुनाव में अजय माकन को बनाया गया था। उससे पहले मध्यप्रदेश में जितेन्द्र सिंह अलवर को राजस्थान में गौरव गगोई को बनाया था।
कांग्रेस में हाईकमान तो अपनी जगह हाईकमान होता ही है। इन्दिरा गांधी के समय हाईकमान शब्द इतना प्रचलित हो गया था कि आम बोलचाल में दोस्त लोग किसी सीनियर दोस्त को हाईकमान कहने लगे थे। इसी तरह आफिस में सख्त बास को। उसके साथ पार्टी अध्यक्ष इंपार्टेंट होता है। वैसे तो आमतौर पर कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार का ही अध्यक्ष होता रहा है। इसलिए हाईकमान और वह एक ही होता है। लेकिन अगर आज जैसी स्थिति होती है तो यह सवाल थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि पावर कहां है।
वैसे तो अब पार्टी में सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ही हैं। पार्टी उन्हें जननायक कहती है। 2019 में अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद लगातार संघर्ष करके उन्होंने खुद को साबित भी कर दिया है। खासतौर से दो देशव्यापी यात्राएं करके। फिर नेता प्रतिपक्ष के रूप में। मगर वे संगठन
में कितना इंटरेस्ट लेते हैं यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। कांग्रेस इससे बचती है।
मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष ठीक हैं। एक दलित फेस हैं। मगर पार्टी में फैसले लेता कौन है? कांग्रेस पहले हाईकमान इन्दिरा जी तक खुद फैसले लेती थीं। सबको जानती थी। मिलती थीं। लेकिन उसके बाद निरंतर यह कम होता चला गया। सोनिया जी भी जानने सबको लगीं थीं। लेकिन फैसले लेने के मामले में कुछ लोगों पर निर्भर थीं। राहुल को ऐसे लोगों से शिकायत भी रही। और उन लोगों को राहुल से भी। मगर वह वक्त बीत गया। अब सब कुछ राहुल के पास है। मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे इसका उपयोग कर रहे हैं? या पार्टी में अनिर्णय की स्थिति ज्यादा पैदा हो गई है?
राहुल का लोकसभा में बोलना, मोदी को चैलेंज करना, विभिन्न समुदायों से मिलना, सबकी आवाज उठाना और कांग्रेस के मूल सिद्धांतों गरीब समर्थक, धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशीलता पर अडिग रहना सब ठीक है। मगर उनसे मिलना आज भी पार्टी में सहज सुलभ नहीं माना जाता है। और उनकी सोच से हटकर उन्हे किसी अलग बात के लिए तैयार करना सर्वथा मुश्किल। संगठन के लिए यह चीजें अच्छी नहीं मानी जातीं।
2026 शुरू हो गया। कांग्रेस के लिए चैलेंज बहुत हैं। एक मजबूत पिलर (ताकत) से लड़ने में जवाबदेही कम हो जाती है। सब समझते है कि बड़ी ताकत से लड़ाई है। उससे लड़ना ही बहुत बड़ी बात है। मगर जब वह ताकत कमजोर होने लगती है तो फिर लोग आपकी लड़ाई कहां कमजोर है यह देखने लगते हैं। कांग्रेस का वही समय आ गया है। ट्रंप द्वारा लगातार अपमान करने और उसका जवाब न दे पाने से मोदी की कमजोरी सामने आ गई है। हिन्दू मुसलमान करके लोगों को बहकाना अब काम नहीं कर रहा है।
ऐसे में कांग्रेस की लड़ाई से लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की भी। संगठन इसीलिए जरूरी लगने लगा है। निर्णायक लड़ाई के लिए जैसे फौज आर्डर में होना जरूरी होती है। वैसे ही राजनीति में संगठन भी। प्रियंका का सवाल कोई सीधे नहीं पूछ रहा मगर पार्टी में च्रर्चा है कि तीन साल से उनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है। बस महासचिव बना रखा है। उनका जो नेतृत्व करिश्माई बताया जाता था उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा?


