नाम बदलने पर शुरू हुई राजनीति : ये भी सच है कि 600 से ज्यादा योजनाएं अभी भी नेहरू-गांधी परिवार के नाम…

आश्चर्य हो सकता है कि अभी भी भारत में नेहरू गांधी परिवार के नाम पर सैकड़ों योजनाएं चलाई जा रही है. जानकारी के अनुसार अभी भी भारत में 600 सरकारी योजनाएं हैं जो जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर है.

ब्लू स्टार: भिंडरावाले की किंवदंती

राजनीति ने ही भिंडरावाले को कौम की आवाज, हितैषी, लड़ाका और संत बनाया। न ज्ञानी जैल सिंह ने सोचा, न लोंगोवाल ने कि चंडीगढ़ विवाद, यमुना कैनाल, पंजाबी भाषा जैसी छोटी-छोटी बातों को उछाल कर सिखों के आम मानस में अन्याय, भेदभाव, उत्पीड़न और दोयम दर्जे का नागरिक होने का जो जहर घोला जा रहा है वह अंतत: आर-पार की लड़ाई बनाने वाला होगा। यह भी पढ़ें: ब्लू स्टारः कालजयी घाव! Jarnail Singh Bhindranwale : ब्लू स्टार ऑपरेशन यदि हिंदू-सिख रिश्तों में मोड़ है तो जरनैल सिंह भिंडरावाले वह सिख किंवदंती है, जिसे भारत को बतौर राष्ट्र समझ कर सबक लेना चाहिए। सवाल है जरनैल सिंह भिंडरावाले का उभरना, बनना और नौजवान सिखों की एक पीढ़ी का हीरो होना, सिख राजनीति को नचाना, हिंदू-सिख खाई खुदवाना, आंतक-खालिस्तान का वैश्विक चेहरा बनना और अंत में भारत की सेना से लड़ कर मरने की गति को प्राप्त होना कैसे हुआ? बहुत अहम सवाल है और जवाब बिखरा हुआ है। मुझे उस वक्त के अनुभव में यह समझ आया कि Jarnail Singh Bhindranwale का पनपना-उभरना बतौर पंजाब के मुख्यमंत्री, देश के गृह मंत्री, भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की बदौलत था। भिंडरावाले का बनना कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से था। इसके साथ… Continue reading ब्लू स्टार: भिंडरावाले की किंवदंती

ब्लू स्टारः कालजयी घाव!

मैंने वे हिंदू परिवार (हां, भारद्वाज, गोयल परिवारों में भी) देखें हैं, जिनमें बड़े बेटे को केश-कड़ा धारण करवा कर सिख बनाया जाता था। मंदिर और गुरूद्वारा दोनों जगह सिख और हिंदू समभाव पूजा करते थे। सनातन

इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

विदेशी साजिश के खौफ-पैरानॉयड मनोदशा में इमरजेंसी ( emergency conspiracy global image ) का फैसला था। हालातों के डर पैदा करने वाली खुफिया ब्रीफिंग में रॉ प्रमुख आरएन काव ने इंदिरा गांधी का कैसे-क्या माइंड बनाया इस पर किसी का फोकस नहीं रहा।… फिर पेंडुलम के दूसरे छोर पर नेहरू की बेटी को तानाशाह की वैश्विक बदनामी ने पहुंचाया। कैसे वे प्रजातंत्र स्थापक-पोषक पिता नेहरू की जगत पुण्यता के कंट्रास्ट में अपनी तानाशाह बदनामी पर विचार नहीं करतीं। तभी एक दिन उनका अपने स्तर पर चुनाव का फैसला था। यह भी पढ़ें: इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड! emergency conspiracy global image : सवाल है यदि इंदिरा गांधी चुनाव नहीं करातीं और संजय गांधी को भारत भर में अपने लोगों का संगठन फैलाने के लिए पांच-दस साल का अवसर देतीं या एकदलीय व्यवस्था ले आतीं तो क्या जनता उसे गुमसुम वैसे ही बरदाश्त नहीं करती जैसे 19 महीने किया! मगर संजय गांधी के न चाहने के बावजूद इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला करके लोगों के हाथों में मतपत्र पहुंचाया। सब कुछ कंट्रोल में था। नॉर्मल था। न खुला विरोध, न भूमिगत आंदोलन और न बड़ौदा डायनामाइट कांड जैसे फटाके। विपक्ष के उस गुब्बारे को दुनिया ने जाना जिसमें अखबारों से… Continue reading इमरजेंसीः विदेशी साजिश और वैश्विक इमेज

इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

अपना मानना है कि इंदिरा गांधी का इमरजेंसी ( emergency Indira gandhi ) लगाना और चुनाव का फैसला उनका खुद का निर्णय था। वे अंतर्मन से गाइडेड थीं। वे पार्टी में विद्रोह (चंद्रशेखर-धारिया की बेबाकी, जगजीवन राम-वाईबी चव्हाण आदि की महत्वाकांक्षाओं) के भय और विदेशी साजिश के डर के पैरानॉयड में थी। जिन्हें 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा भारत की 85 साल पुरानी पार्टी को तोड़ने का इतिहास ज्ञात है वे जानते हैं कि इंदिरा गांधी ने राजनीति को कैसी मनोदशा में खेला। मैं 1975-76 में पत्रकार नहीं था लेकिन जेएनयू में फ्रीलांसिग करने लगा था। ऐसा जेएनयू में होने के कारण नहीं था, बल्कि भीलवाड़ा में ‘नई दुनिया’ सहित उपलब्ध पत्र-पत्रिकाओं, ‘बीबीसी’ से बनी राजनीतिक चेतना से था। उस वक्त कच्चे दिमाग में जो दिलचस्पी बनी, उसके फ्लैशबैक में जब मैं मार्च 1971 से जून 1975 के चार सालों की घटनाओं पर सोचता हूं तो एक पहेली बनती है। सोचें, कांग्रेस के दो फाड़ के बाद इंदिरा गांधी ने अपने बूते लोकसभा की 352 सीटें जीती थीं। मार्च 1971 के चुनाव में विरोधी कामराज-मोरारजी कांग्रेस को सिर्फ 16 सीटें मिली थीं। तब नंबर दो पार्टी सीपीएम (25) थी और नंबर तीन पर जनसंघ (22 सीटें)। समाजवादियों की संसोपा-प्रसोपा के… Continue reading इमरजेंसीः पहेली और पैरानॉयड!

इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी की घोषणा के साथ पहले से बनाई लिस्ट अनुसार रात में सोते हुए जितने नेताओं-कार्यकर्तार्ओं को गिरफ्तार किया गया था वहीं इमरजेंसी बंदियों का असली लब्बोलुआब है। घोषणा के अगले दिन सूरज निकला तो तब गिरफ्तार हुए अपने केसी की जुबानी का सत्य कि दिल्ली की सड़कों पर, जेपी के पटना में इमरजेंसी के खिलाफ कुत्ता भी भौंकता हुआ नहीं था! indira gandhi in 1975 अनुभव में इमरजेंसी दिखती नहीं थी। विपक्ष को सांप सूंघा हुआ था। न प्रदर्शन थे और न आंदोलन। सन् 1975-76 में देश की आबादी कोई 70 करोड़ थी। लेकिन इमरजेंसी के खिलाफ पर्चे बांटते पकड़े गए लोगों की संख्या थी सात हजार। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बीस महीने में एक लाख 40 हजार लोगों की गिरफ्तारी का अनुमान लगाया था। और पता है इनमें सर्वाधिक कौन थे? 40 हजार सिख थे। इनके बाद आनंदमार्गी, नक्सलियों-मार्क्सवादियों की संख्या थी। हां, सबसे बड़ी संख्या अकाल तख्त की तानाशाही के खिलाफ आवाज के चलते थी। अकालियों ने सर्वाधिक गिरफ्तारियां दी। ऐसा किसी हिंदू संगठन या आरएसएस से जेल भरने का आव्हान नहीं था। इमरजेंसी का मर्दानगी से विरोध पंजाब में सिखों का और केरल में सीपीएम के काडर का था, जबकि दिल्ली से लेकर बिहार के हिंदी भाषी… Continue reading इमरजेंसीः खामोख्याल विपक्ष

इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

जेएनयू और दिल्ली घूमते-देखते हुए लगा ही नहीं कुछ असामान्य है। जन-जीवन, आवाजाही और अखबार सब सामान्य। हां, अखबारों में विपक्ष और राजनीति की खबर ढूंढे नहीं मिलती थीं और न इमरजेंसी की खबर। मानों भारत बिना विपक्ष और राजनीति के हो। जेएनयू में बंदिश, घुटन जैसा कुछ महसूस नहीं हुआ। न ही सहपाठी छात्र-प्रोफेसर-स्टाफ उद्वेलित या बेचैन।…. जेएनयू की उन दिनों की याद से अब समझ आता है कि 26 जून 1975 से लेकर 10 जुलाई 1975 के पंद्रह दिनों में जो होना था वह हो गया। hari shankar vyas jindageenama : छब्बीस जून 1975 का वह दिन…मैं तब भीलवाड़ा में था। जेएनयू में दाखिले की तैयारी करता हुआ। जुलाई में दिल्ली आया और अपने जिले के एमफिल छात्रों रविंद्र व्यास, नंदलाल गुर्जर और राजस्थान से ही आए प्रो. कुरैशी की मदद व पिछड़े इलाके जैसी कसौटी से दाखिला हुआ। गंगा हॉस्टल में कमरा नंबर 317 रहने का ठिकाना। तीसरे फ्लोर पर सामने सीताराम येचुरी का कमरा था।…तब नए-पुराने दोनों कैंपस मुर्दनगी में शांत से लगे। उन दिनों भीड़ वैसे भी नहीं थी और मेरे जैसे, छोटे शहर के छोटे कॉलेज से आए छात्र के लिए भव्य, मगर खाली-खाली इमारतों में सामान्य हलचल हैरान करने वाली थी। आबोहवा में… Continue reading इमरजेंसी… मुझे दिखी नहीं!

वे काले दिन बनाम ये अच्छे दिन

जनतंत्र को अपने ठेंगे पर रखे घूम रहे लठैतों के इस दौर में इंदिरा जी का कद तो और भी सौ गुना बढ़ जाता है। इसलिए 46 साल पहले के आपातकाल के 633 दिनों पर खूब हायतौबा मचाइए, मगर पिछले 2555 दिनों से भारतमाता की छाती पर चलाई जा रही अघोषित आपातकाल की चक्की के पाटों को नज़रअंदाज़ मत करिए। दिल पर हाथ रखकर बताइए कि आज आप के कितने मौलिक अधिकार सचमुच शेष रह गए हैं? गंगा जल हाथ में ले कर पूरी ईमानदारी से बताइए कि वे दिन तो चलिए काले थे, लेकिन ये ‘अच्छे दिन’ कैसे हैं? यह भी पढ़ें: लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर Indira Gandhi Emergency : हर साल आपातकाल की सालगिरह पर चूंकि उन ‘काले दिनों’ पर हाय-हाय करने का दस्तूर है, इसलिए इस बार जब 46 साल पूरे हो गए हैं, मैं भी आप से कुछ गुज़ारिश करना चाहता हूं। इसलिए कि इन साढ़े चार दशकों में यह धारणा बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई है कि जनतंत्र से इंदिरा गांधी का कोई लेना-देना था ही नहीं। 1975 के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी को तो यह सिखाने में कोई कसर छोड़ी ही नहीं गई है कि इंदिरा जी… Continue reading वे काले दिन बनाम ये अच्छे दिन

Kangana Ranaut दिखेंगी पूर्व PM ‘इंदिरा गांधी’ के किरदार में, खुद को ऐसे तैयार कर रही एक्ट्रेस

नई दिल्ली | Kangana Ranaut बाॅलीवुड की सबसे चर्चित और विवादों में घिरी रहने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत  (Kangana Ranaut) अब एक बार फिर से चर्चा में है। अब कंगना रनौत एक बार फिर से पॉलीटिकल ड्रामा फिल्म का हिस्सा बनने जा रही हैं। कंगना अब अगली फिल्म में भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के किरदार में लोगों को राजनीति का सियासी पाठ पढ़ाएंगी। कंगना अपनी इस फिल्म के लिए खासी एक्साइटेड हैं और फिल्म की तैयारी शुरू कर दी है। ये भी पढ़ें:- Khatron Ke Khiladi : की शूटिंग खत्म कर भारत लौटे सितारे, जानें कब होगा शो का टेलिकास्ट कंगना रानौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में पर अपनी आने वाली फिल्म की तैयारियों के कुछ वीडियो अपने फैंस के साथ शेयर किए हैं। जिसमें वह इस इंदिरा गांधी के करिदार में ढलने के लिए अपने बाॅडी को तैयार करती दिख रही हैं। कंगना ने अपनी स्टोरी में यह लिखा है कि उनकी ये फिल्म 1975 की इमरजेंसी पर आधारित होगी। कंगना ने इसी साल की शुरुआत में अपनी इस फिल्म की घोषणा कर दी थी और कहा था कि, उनकी ये फिल्म बायोपिक नहीं, बल्कि एक ग्रैंड पीरियड ड्रामा होगी। ये भी पढ़ें:- IND Vs NZ… Continue reading Kangana Ranaut दिखेंगी पूर्व PM ‘इंदिरा गांधी’ के किरदार में, खुद को ऐसे तैयार कर रही एक्ट्रेस

हिमयुग के द्वार खड़ी नरेंद्र भाई की भाजपा

सियासी-भेड़ों का ऐसा रेवड़ भारत की राजनीति में पहले कभी नहीं देखा गया। सत्तासीन राजनीतिक दल के मुखियाओं की दादागिरी के दौर पहले भी आए, लेकिन सन्नाटे का ऐसा दौर पहले कभी नहीं आया था। सत्तारूढ़ दल की अगुआई कर रही शक़्लों की सनक पहले भी कुलांचे भरती रही है, मगर बेकाबू होती टांगों को मरोड़ने वाली मुट्ठियां भी कहीं-न-कहीं से उग आया करती थीं। यह पहली बार हो रहा है कि रायसीना-पहाड़ी पर बैठे एक बेहृदय-सम्राट की मनमानी को पूरा सत्तारूढ़ दल इस तरह टुकुर-टुकुर देख रहा है। इस बेतरह सहमे हुए समूह का इतना भी साहस नहीं हो रहा है कि कम-से-कम मिमियाने ही लगे। आज़ादी के बाद क़रीब सत्रह साल प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू के बारे में, और आप कुछ भी कह लें, उन्हें ग़ैर-लोकतांत्रिक कोई नहीं कह सकता। सो, देश में और उस दौर के सत्तासीन दल कांग्रेस के भीतर असहमित के स्वरों के प्रति सम्मान का शायद वह स्वर्ण-काल था। सब जानते हैं कि नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सर्वसम्मति नहीं थी। भारत को आज़ादी मिलने के आसार 1946 आते-आते पूरी तरह साफ़ हो गए थे। यह भी तय था कि आज़ाद भारत की पहली सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष को आमंत्रित… Continue reading हिमयुग के द्वार खड़ी नरेंद्र भाई की भाजपा

नकचढ़े विपक्ष की भुरभुरी मूरत

पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव नतीजे अगर भारतीय जनता पार्टी के लिए खराब रहे भी, जो कि, अन्य सभी स्थितियां सामान्य रहने की दशा में, रहेंगे ही; तो भी हो क्या जाएगा? कांग्रेसियों के मनोबल में चंद रोज़ के लिए थोड़ा-सा उफ़ान आ जाएगा, ममता बनर्जी की उमंगों को थोडा़-सा सहारा मिल जाएगा और द्रमुक के नैया फिर लहरों पर उछलने लगेगी। मगर क्या इससे विपक्ष इस क़ाबिल हो जाएगा कि 2024 की गर्मियों में नरेंद्र भाई मोदी को लोक कल्याण मार्ग के राजमहल से निकाल कर साबरमती किनारे झुग्गी बसाने पर मजबूर कर दे? इन चुनावों के नतीजे दृश्य बदलेंगे, लेकिन दृश्य तो तब बदलेगा, जब विपक्षी राहगीर अपनी राह बदलेंगे। पहले तो वे राह बदलेंगे नहीं। फिर उन्हें नरेंद्र भाई का जालबट्टा राह बदलने देगा भी नहीं। तो जब अपनी-अपनी पोटली बगल में दबाए वे सब आज की ही राह पर अगले तीन साल भी यूं ही चलते रहेंगे तो नरेंद्र भाई को क्या खा कर पानी पिला पाएंगे? इसलिए मैं भी नरेंद्र भाई की ही तरह आश्वस्त हूं कि कुछ नहीं होने वाला और मेरा मन भी कदम्ब की डाल पर बैठे-बैठे उन्हीं की तरह चैन की अपनी बांसुरी बजाते रहने को हो रहा है। मगर… Continue reading नकचढ़े विपक्ष की भुरभुरी मूरत

अशोक गहलोत जन्मदिन विशेष : मोदी ही नहीं सीएम अशोक गहलोत का भी झलकता है चाय-प्रेम, हर चुस्की में दिखता है सियासी दाव

आज राजस्थान(Rajasthan) के मुख्यमंत्री और राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ( Ashok Gehlot) का जन्मदिन है. अशोक गहलोत का जन्म 3 अप्रैल1951 को राजस्थान के जोधपुर ( jodhpur) में हुआ था. आज अशोक गहलोत 69 वर्ष के हो चुके हैं. राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत के जन्मदिन पर अनकी जिंदगी से जुड़ा एक अनछुआ पहलु आपको बताते हैं. सीएम गहलोत चाय और पार्लेजी बिस्किट (Parle-G) के बहुत बड़े शौकीन हैं. यहीं कारण है कि सीएम गहलोत कई बार सड़क किनारे चाय पीते दिख जाते हैं. इस बारे में एक सीएंम के परिवार के एक सदस्य ने बताया कि वो अपने साथ हमेशा एक बिस्किट का पैकेट रखते हैं. वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( PM Narnedra modi) का चाय प्रेम भी किसी से भी छिपा नहीं है. इसे महज इत्तेफाक ही कहा जा सकता है कि दोनों चाय प्रेमी एक मिडिल क्लास परिवार से आते है. दोनों ने ही फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है. ये चाय शायद कुछ हद तक दोनों की सोच में भी समानता लाती है.क्योकि कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के लिए अशोक गहलोत ने देश में सबसे पहले लॉकडाउन ( Lockdown) का ऐलान किया था. इसके कुछ दिन बाद ही… Continue reading अशोक गहलोत जन्मदिन विशेष : मोदी ही नहीं सीएम अशोक गहलोत का भी झलकता है चाय-प्रेम, हर चुस्की में दिखता है सियासी दाव

इंदिरा पर बन गया फोकस

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इंदिरा गांधी की जम कर तारीफ की। उन्होंने 1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी को सहयोग और उनके साहस की तारीफ की और साथ ही 1975 में भी अपने परिवार को मिली मदद का जिक्र किया।

आपातकाल की भूल और ‘यूरेका-यूरेका’ टोली

राहुल गांधी ने आपातकाल को भूल बताने की अपनी बात दोहराई तो कई अर्द्धशिक्षित क़लमकार और टीवी सूत्रधार ‘यूरेका-यूरेका’ चिल्लाने लगे। वे बेचारे जानते ही नहीं थे कि आपातकाल की ग़लती तो ख़ुद इंदिरा गांधी ने मान ली थी। उनके बाद राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी कई बार कह चुके थे कि आपातकाल लगाना भूल थी। कांग्रेस पार्टी भी अपने अधिकृत दस्तावेज़ों में आपातकाल की ग़लती मान चुकी है। मगर राहुल के कहे का पल्लू पकड़ कर मौजूदा सत्तासीनों के आरती-कर्मियों ने दो-चार दिन ऐसा हल्ला मचाया, गोया इंदिरा गांधी का जनतंत्र से कोई लेना-देना ही नहीं था। 1975 के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी को यह सिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई है कि इंदिरा जी लोकतंत्र-विरोधी थीं और एक तरह से तानाशाह ही थीं। इंदिरा जी ने आपातकाल क्यों लगाया था, इस पर लंबी चर्चा हो सकती है। उन्होंने विपक्षी नेताओं को क्यों जेल भेजा था, इस पर भी काफी बहस की गुंज़ाइष है। और, आपातकाल में सचमुच कितनी ज़्यादती हुई या नहीं हुई और की तो किसने की, किसके इशारे पर की, इस पर तो पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। बावजूद इन तमाम पहलुओं के, मैं भी मानता हूं कि इंदिरा… Continue reading आपातकाल की भूल और ‘यूरेका-यूरेका’ टोली

कंगना अगली फिल्म में निभाएंगी इंदिरा गांधी का किरदार

राजनीतिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली एक अगली फिल्म में कंगना रनौत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का किरदार निभाती नजर आएंगी।

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