Macaulay

  • औपनिवेशिक मानसिकता का सच बड़ा है!

    यूं तो प्रधानमंत्री मोदी ने मैकॉले मानसिकता की सही पहचान की है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। भारत का प्रभावशाली राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक वर्ग सिर्फ मैकॉले ही नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स की विचारधारा से भी लंबे समय तक ग्रस्त रहा है। स्वतंत्रता के बाद से यह वैचारिक तंत्र— कभी साथ मिलकर, कभी अलग-अलग अपने ‘अधूरे एजेंडे’ को आगे बढ़ाता रहा। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को ‘मैकॉले मानसिकता’ से पूरी तरह मुक्त कराने का संकल्प दोहराया। उनके अनुसार— "वर्ष 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए...

  • मैकाले के इंजिन को ही मोदीजी चला रहे!

    भारत की एकमात्र “अनलूटेबल” संपत्ति वह पतली परत है—अंग्रेज़ी-फ्लुएंट, विश्लेषणात्मक रूप से प्रशिक्षित दिमाग़ों की—जिसे मैकाले ने जन्म दिया था। बाकी कोयला, खनिज, नदियाँ—हमने ही चुरा लिए, बर्बाद किए, या लाल फ़ीते में कसकर बांध दिए। इतना सब होने के बावजूद हमने इसके साथ क्या किया? लगभग कुछ नहीं—बल्कि उल्टा किया। एक असहज सच है, जिसे बोलते ही या लिखते ही कथित “देशभक्त” व्हाट्सऐप ग्रुप का दरवाज़ा बंद हो जाएगा। पर सच से आँख चुराने का कोई फ़ायदा नहीं है। आधुनिक भारत आज भी उसी ईंधन पर चल रहा है, जिसे 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने हमारी नसों में...

  • मैकाले को गाली और विरासत की पूजा!

    मैकाले को बेचारा माने या महान? इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने कोसा है। कहा है कि मैकाले भारतीयों की ‘गुलामी की मानसिकता’ का ज़िम्मेदार है। पर फिर अगले दिन उन्होंने मैकाले की विरासत का अभिनंदन किया। मत्था टेका। पेचीदा मसला है। सोचें, भारत की आज बनावट और बुनावट क्या है? नरेंद्र मोदी यदि बतौर प्रधानमंत्री सत्ता भोग रहे हैं, तो किसके कारण? इसके लिए वे संविधान को पूजते हैं। और इस संविधान की बनावट-बुनावट क्या है? मोटामोटी अंग्रेज़ मैकाले का सपना। मैकाले, बर्क, जेम्स मिल, लॉर्ड कर्ज़न यानी मालिक अंग्रेज़ों के क़ानूनों, इस्पाती खांचे-ढांचे की शासन-पद्धति का एक कलमबद्ध ग्रंथ!...