संपादकीय
ना अलग, ना स्वतंत्र?
जजों की नियुक्ति में सरकार की मंजूरी ही निर्णायक रही, तो फिर कार्यपालिका एवं न...
ये हाल कैसे हुआ?
क्या चीन से संबंध सुधारने की प्रक्रिया इस पराजयवादी मानसिकता के तहत चल रही है कि चीन का मुकाबला करना संभव नहीं र...
इससे हासिल क्या होगा?
श्रम सर्वे अगर गिग कर्मियों और घरेलू काम में लगी महिलाओं की केवल गिनती करता है, जबकि उन्हें साम...
नैरेटिव कंट्रोल की चिंता
हाल में संकेत मिले कि सत्ता पक्ष का नैरेटिव कंट्रोल टूट रहा है। उस नियंत्रण को वापस...
साइबर सुरक्षा में सेंध
ताजा घटनाएं न केवल संबंधित संस्थाओं की लापरवाही का संकेत हैं, बल्क...
हकीकत से मुंह मोड़ना
मुंह मोड़ लेने से वो ठोस हकीकतें नहीं बदल जाएंगी, जिस कारण देश में अशांति का म...
सड़कों पर नई पीढ़ी
जब मूलभूत प्रश्न राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रहते और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं जन समस्याओं का समय पर सम...
अब औपचारिकता भी नहीं?
इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अ...
जगह अलग, कहानी वही!
एनडीएमए के भीड़ प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देशों को धार्मिक आयोजनों के कर्ता-धर्ताओं ने शायद पढ़ने की जरूरत भी नहीं...
अधिकार तो ठीक है…
अदालत ने स्वीकार किया इंटरनेट की वर्तमान स्थिति बच्चों के लिए कतई सुरक्षित नहीं है। यह मानने के बावजूद जजों ने स...
बदलाव या बहाली?
सरकार और रेज़ीम एक ही चीज नहीं हैं। सरकार लोगों का एक समूह है, जिसके पास सत्ता...
आईडीबीआईः नायाब नमूना
आईडीबीआई की कहानी कहीं अधिक गंभीर समस्या का उदाहरण है। आईसीआईसीआई और आईडीबीआई को दीर्घकालिक औद्योगिक एवं ढांचागत...
अंदर की कहानी
भारत अब ब्रिटेन से नीचे जाकर छठे नंबर पर है। एक समय अमेरिका और चीन के बाद भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ब...