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भारत

भारत अब ब्रिटेन से नीचे जाकर छठे नंबर पर है। एक समय अमेरिका और चीन के बाद भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना प्रबल बताई जाती थी। लेकिन उसके बाद कहानी पलट गई।

इस हफ्ते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस वित्त वर्ष के लिए भारत के जीडीपी ग्रोथ की संभावना 6.5 प्रतिशत से बढ़ा कर सात प्रतिशत कर दिया। सरकार ने इसे अपने इस दावे की पुष्टि बताया है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारत की विकास कथा आगे बढ़ रही है। भारत के प्रति आईएमएफ का सकारात्मक नजरिया बेशक अच्छी खबर है। लेकिन समस्या यह है कि यह पूरी कहानी नहीं है। जिस आर्थिक वृद्धि दर की चर्चा हुई है, वह रुपये में की गई गणना है। जबकि डॉलर के अर्थ में भारत की जीडीपी घटती चली गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के सकल आर्थिक उत्पाद एवं उसकी वृद्धि दर की गणना डॉलर में ही की जाती है।

इसी कारण रुपये की कीमत में गिरावट के साथ अंतरराष्ट्रीय सूची में भारत का दर्जा गिरा है। भारत अब ब्रिटेन से भी नीचे जाकर छठे नंबर पर है। एक समय अमेरिका और चीन के बाद भारत के तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना प्रबल बताई जाती थी। लेकिन उसके बाद कहानी पलट गई। फिलहाल, आईएमएफ ने भारत के लिए कुछ सकारात्मक बातें कही हैं। मसलन, जनसंख्या संबंधी लाभ, बढ़ता घरेलू बाजार, कथित ढांचागत सुधार की बेहतर स्थिति। इनमें जनसंख्या संबंधी लाभ अब एक सैद्धांतिक पहलू ही रह गया है, जबकि बढ़ता घरेलू बाजार आबादी के छोटे से हिस्से के पास इकट्ठा होते धन का परिणाम है। इस रूझान को स्वस्थ नहीं समझा जाता।

उधर आईएमएफ ने वैश्विक ऊर्जा संकट, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में निवेश की लगी होड़, और बॉन्ड ब्याज दरों में वृद्धि के साथ ऋण लेना महंगा होने के जारी ट्रेंड को भारत के लिए प्रमुख चुनौती के रूप में पेश किया है। ऊर्जा की महंगाई अब आम महंगाई का कारण बनने लगी है। गौरतलब है कि सितंबर में थोक महंगाई दर 11.39 फीसदी और खुदरा महंगाई दर 5.54 फीसदी तक पहुंच गई। नतीजतन रिजर्व बैंक को ब्याज दर बढ़ानी पड़ी, जिसका असर आर्थिक वृद्धि पर पड़ेगा। तो कुल सूरत यह निकलती है कि तमाम “सकारात्मक” बातों के बावजूद पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने का सपना फिलहाल और दूर हो गया है!

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By NI Editorial

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