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ना अलग, ना स्वतंत्र?

जजों की नियुक्ति में सरकार की मंजूरी ही निर्णायक रही, तो फिर कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच अलगाव के सिद्धांत का क्या हुआ? और क्या इसे तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता का समर्पण नहीं माना जाएगा?

भारतीय संविधान में अपनाए गए शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत के तहत न्यायपालिका की स्वायत्त हैसियत है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्याख्या की कि ये विभाजन संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा है। इसी आधार पर उसने 1993 और 1998 में दिए दो निर्णयों के जरिए उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम कायम किया। इस प्रणाली की अक्सर यह कहकर आलोचना की गई है कि इससे सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति में सरकार और विधायिका की भूमिका खत्म कर दी और उसने खुद को ‘स्वायत्त’ की जगह ‘स्वतंत्र’ बना लिया।

ऐसा सिस्टम शायद ही किसी और लोकतांत्रिक देश में हो! मगर भारत की विशेष परिस्थितियों में नियुक्ति प्रक्रिया को पूर्णतः न्यायपालिका के दायरे में रखने के चलन को व्यापक जन-समर्थन रहा है। यह इस भरोसे रहा है कि इससे शासन व्यवस्था में अवरोध एवं संतुलन के सिद्धांत को व्यावहारिक बनाए रखने में मदद मिलेगी। अब सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के व्यवहार के बारे में जो कहा है, उसे इसी बड़े संदर्भ में देखना चाहिए। जस्टिस कौल ने कहा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ कॉलेजियम के जरिए जजों की नियुक्ति का प्रस्ताव भेजने के पहले जजों की लिस्ट पर सरकार की मंजूरी लेते थे। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ सरकार के प्रति ‘अत्यधिक सम्मान की भावना’ रखते थे।

इन टिप्पणियों से सर्व-प्रमुख प्रश्न यही उठता है कि अगर अंततः सरकार की मंजूरी ही निर्णायक पहलू रहा, तो फिर कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच अलगाव के सिद्धांत का क्या हुआ? और क्या इसे तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता का समर्पण नहीं माना जाएगा? फिलहाल, दावा सिर्फ एक प्रधान न्यायाधीश के व्यवहार के बारे में किया गया है, लेकिन हालिया वर्षों में उच्चतर न्यायपालिका के संबंध में इससे मिले-जुले सवाल अक्सर उठते रहे हैं। ये प्रश्न खुद न्यायपालिका में खास भूमिका रखने वाली शख्सियतों ने उठाए हैं। इन चर्चाओं ने कोर्ट की भूमिका को लेकर परिदृश्य को मटमैला कर दिया है। वर्तमान माननीय न्यायाधीशों को इस पर तुरंत गौर करना चाहिए, क्योंकि न्यायपालिका के साथ-साथ पूरी संवैधानिक व्यवस्था की साख दांव पर है।

By NI Editorial

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