राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

आशंकाओं में दम है

जब रकम वापसी शुरू होगी, तो क्या जो संकट अभी टाला गया है, उसका उस समय अधिक बड़े रूप में सामना करना पड़ेगा? क्या फौरी संकट टालने के लिए भविष्य की चुनौतियां बढ़ा ली गई हैं?

फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट बैंक (एफसीएनआर-बी) योजना के जरिए अनिवासी भारतीयों और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से विदेशी मुद्रा (मुख्य रूप से डॉलर) लाने की योजना कामयाब रही। इससे उस समय 136 बिलियन डॉलर भारत आए हैं, जब देश से डॉलर की निकासी के कारण रुपया बेहद दबाव में था। आए डॉलर के कारण रुपये की कीमत संभली है। लेकिन इस कामयाबी ने कई आशंकाओं को भी जन्म दिया है। यह एक टर्म डिपॉजिट स्कीम है। इसमें तीन से पांच साल की अवधियों के लिए जमा रकम विदेशी मुद्रा में ही मैच्योर होगी। वह रकम विनिमय दर  के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होगी। इस पर मिले ब्याज पर कोई टैक्स भी नहीं लगेगा।

मोटे तौर पर इसे फिक्स्ड डिपॉजिट की ऐसी योजना के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें मैच्युरिटी पर मिलने वाली रकम उस दौरान हुई मुद्रास्फीति के प्रभाव से मुक्त रहेगी। जमा रकम पर लगभग 16 प्रतिशत का तय रिटर्न मिलेगा। और इसीलिए यह सवाल उठा है कि तीन साल के बाद जब रकम वापसी शुरू होगी, तो क्या जो संकट अभी टाला गया है, उसका उस समय अधिक बड़े रूप में सामना करना पड़ेगा? बैंकों को भुगतान डॉलर में ही करना होगा, जिससे तब विदेशी मुद्रा भंडार पर अचानक बड़ा दबाव बढ़ सकता है।

इस बीच अमेरिका या अन्य देश अपनी ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो अनिवासी भारतीय निवेशकों को आकर्षित किए रखने के लिए भारतीय बैंकों को भी अधिक ब्याज देना होगा। उससे देश पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। अभी ही इस योजना के कारण भारत पर विदेशी कर्ज का बोझ 765 बिलियन से बढ़ कर लगभग 900 बिलियन डॉलर हो गया है। जब केंद्र के राजस्व का 40 प्रतिशत और बजट का 26 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने पर खर्च हो रहा हो, तो बढ़े ऋण के दुष्परिणाम को समझा जा सकता है। इसीलिए सवाल उठा है कि क्या फौरी संकट टालने के लिए भविष्य की चुनौतियां बढ़ा ली गई हैं? इसीलिए वित्तीय हलकों में यह अंदेशा जताया गया है कि कहीं इस योजना का हाल भी गोल्ड बॉन्ड स्कीम जैसा ना हो जाए!

By NI Editorial

The Nayaindia editorial desk offers a platform for thought-provoking opinions, featuring news and articles rooted in the unique perspectives of its authors.

Leave a comment