कोई नाविक किसी खास रूट (जैसे होरमुज) से गुजरने से मना करता है, तो कंपनी उसका अनुबंध रद्द कर सकती है या ‘ब्लैकलिस्ट’ कर सकती है। इससे उसका भविष्य दांव पर लग सकता है।
भारत सरकार ने पश्चिम एशिया में भारतीय नाविकों के हमलों का शिकार बनने के बाद भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए ‘सीफेयरर-फर्स्ट आपातकालीन सुरक्षा योजना’ लागू की है। शिपिंग कंपनियों और भर्ती एजेंसियों को अगले निर्देश तक होरमुज मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नाविकों को तैनात ना करने के निर्देश दिए गए हैं। मगर क्या इससे भारतीय नाविक सचमुच सुरक्षित हो जाएंगे? ये सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि कागजी सरकारी आदेश और समुद्र की कड़वी हकीकत में कोई मेल नज़र नहीं आता। इसलिए अंदेशा गहरा है कि इस सरकारी पहल को लागू करना मुश्किल साबित होगा। नाविक शिपिंग कंपनियों (या उनकी नौकरी भर्ती एजेंसियों) के कर्मचारी होते हैं, भारत सरकार के नहीं। उनका रोजगार निजी अनुबंध पर टिका होता है।
नाविक किसी विदेशी या भारतीय शिपिंग कंपनी या किसी थर्ड-पार्टी मैनिंग एजेंसी के साथ छह से नौ महीने का कांट्रैक्ट साइन करते हैं। इसके तहत कोई नाविक किसी खास रूट (जैसे होरमुज) से गुजरने से मना करता है, तो कंपनी उसका अनुबंध रद्द कर सकती है या ‘ब्लैकलिस्ट’ कर सकती है। इससे उसका भविष्य दांव पर लग सकता है। नौवहन बाजार में भी काम पाने भारी होड़ है। यही कारण है कि नाविक अक्सर जोखिम लेकर भी कहीं जाने को तैयार हो जाते हैं। दुनिया में तमाम नाविकों के बीच भारतीयों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है। जबकि अधिकांश जहाज पनामा, लाइबेरिया, या मार्शल आइलैंड्स जैसे देशों के झंडे तले रजिस्टर्ड हैं, भले उनके मालिक किसी देश के हों।
ऐसे में भारतीय नाविकों पर उस देश का कानून लागू होता है, जिसके नाम पर जहाज पंजीकृत है। भारत सीधे किसी विदेशी जहाज के रूट को लेकर दखल नहीं दे सकता। तो फिर सरकार इस फैसले को लागू कैसे करवाएगी? अधिक से अधिक वह रिक्रूटमेंट और प्लेसमेंट एजेंसियों एजेंसियों पर दबाव डाल सकती है कि वे नाविकों को जबरन खतरे वाले क्षेत्रों में ना भेजें। नाविकों को ‘राइट टू रिफ्यूज’ के तहत युद्ध क्षेत्र में जाने से इनकार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन वे ऐसा करियर को दांव पर लगाते हुए ही कर पाएंगे। यही इस मामले का पेच है।
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