राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, कला, सिनेमा आदि पर एक खास रंग चढ़ता नजर आया है। उसको लेकर दूसरी सोच की राजनीति से जुड़ी ताकतों में असहजता रही है। उससे चौड़ी होती गई खाई अब खुले विभाजन की वजह बन रही है।
साहित्य अकादमी पुरस्कारों पर उठा विवाद भारतीय साहित्य में विभाजन की हद तक पहुंच गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सात भारतीय भाषाओं के लिए अलग से पुरस्कार शुरू करने का एलान कर दिया है। अपने इस कदम की वजहों को लेकर स्टालिन ने कोई लाग-लपेट नहीं बरता। बल्कि दो टूक कहा- ‘कुछ दिन पहले विजेताओं की सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के दखल पर साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा रद्द कर दी गई। हमें नहीं मालूम कि अब ये घोषणा होगी भी या नहीं। कला और साहित्य में हस्तक्षेप खतरनाक है।’
स्टालिन ने कहा कि इस पर “रचनात्मक” प्रतिक्रिया दिखाते हुए “प्रथम चरण में” तमिलनाडु सरकार ने तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, बांग्ला और मराठी भाषाओं के लिए हर साल सेमोझी साहित्य पुरस्कार देने का फैसला किया है। “डीएमके 2.0” (यानी अगले विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाली) सरकार इस पहल को मजबूत एवं विस्तृत करेगी। मतलब शायद यह कि पुरस्कार के दायरे में अन्य भाषाओं को भी लाया जाएगा। फिर भी, फिलहाल भाषाओं का जो चयन किया गया है, उसमें एक पैटर्न साफ दिखा है। इसमें हिंदी को अलग रखने का सियासी पैगाम साफ नजर आता है। यह तो खुद स्टालिन के बयान से स्पष्ट है कि इन पुरस्कारों का भविष्य अप्रैल- मई में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा। इस रूप में ताजा एलान का चुनावी राजनीति से जुड़ाव भी साफ है।
बहरहाल, मुद्दा यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, कला, सिनेमा आदि को राजनीति से जोड़ने की प्रवृति तेजी से बढ़ी है। परिणास्वरूप इन माध्यमों पर एक खास रंग चढ़ता नजर आया है। उसको लेकर दूसरी सोच की राजनीति से जुड़ी ताकतों में असहजता है, यह तो काफी समय से जाहिर हो रहा था। अब खास बात यह हुई है कि वो बढ़ती खाई खुले विभाजन में तब्दील हो गई है। बेशक, ऐसी लामबंदी से साहित्य, कला, सिनेमा आदि के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता के लिए भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। मगर आज की यही हकीकत है, जो अब अधिक चिंताजनक रूप ग्रहण कर रही है।


