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यही भारत कथा है

ये मामला भारत में मोनोपॉली, ड्यूओपॉली और कार्टेल्स बनने की बढ़ती गई शिकायतों की पुष्टि है। इसी का परिणाम है कि उत्पादन संबंधी इनपुट लागत ऊंची बनी रही है, जिससे निवेश और बाजार के विस्तार के लिए प्रतिकूल स्थितियां बनी हैं।

कॉम्पीटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि बड़ी स्टील उत्पादक कंपनियों टाटा, जिंदल स्टील और सेल ने कई अन्य छोटी कंपनियों के साथ मिल कर कार्टेल (गुट) बनाया और देश में इस्पात की कीमत मिल-जुल कर तय की। 2015 से 2023 के बीच की कई अवधियों में ऐसा किया गया। यानी इन कंपनियों ने आपस में अपेक्षित प्रतिस्पर्धा नहीं की। जबकि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सिर्फ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से ही उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद उचित मूल्य पर मिल सकते हैं। जबकि उत्पादक कंपनियां मिलीभगत कर लें, तो गुणवत्ता पर समझौता करते हुए या मनमानी कीमत वसूलते हुए वे अपना मुनाफा बढ़ाती हैँ। इसीलिए ऐसी प्रवृत्ति रोकने का कानून है। सीसीआई की जांच इस नतीजे पर पहुंची कि स्टील उत्पादक कंपनियों ने संबंधित कानून उल्लंघन किया।

सीसीआई के पास मामला बिल्डरों की अर्जी से पहुंचा, जिसमें इल्जाम लगाया गया था कि नौ स्टील कंपनियों ने मिलीभगत से बाजार में स्टील की उपलब्धता घटाई, ताकि वे महंगी दर पर अपने उत्पाद बेच सकें। सीसीआई ने इन कंपनियों के 56 अधिकारियों को दोषी ठहराया है, जिन पर भारी जुर्माना लगाए जाने की संभावना है। स्पष्टतः ये घटना भारतीय अर्थव्यवस्था में मोनोपॉली (एकाधिकार), ड्यूओपॉली (द्वि-अधिकार) और कार्टेल्स बनने की बढ़ती गई शिकायतों की पुष्टि है। इसी का परिणाम है कि उत्पादन संबंधी इनपुट लागत ऊंची बनी रही है, जिससे निवेश और बाजार के विस्तार के लिए प्रतिकूल स्थितियां बनी हैं।

हैरतअंगेज यह है कि ऐसी कंपनियों की सहायता के लिए सरकार भी सहर्ष आगे रही है। बीते हफ्ते ही केंद्र ने डंपिंग रोकने के नाम पर आयातित स्टील पर सेफगार्ड ड्यूटी लगाया। उसके बाद भारतीय स्टील कंपनियों ने अपने उत्पाद की कीमत में 2 से 4 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी। यानी भारतीय उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ गया है। मुद्दा यह है कि जो उद्योग घराने अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरतों पर अपने मुनाफे को इस तरह तरजीह दे रहे हों, क्या सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए? देश के अंदर वे प्रतिस्पर्धा को रोक रहे हैं, तो उन्हें आयातित उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर करने में क्या बुराई है?

By NI Editorial

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