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बांग्लादेश में क्या बदला?

जमात-ए-इस्लामी और अवामी लीग की स्थिति में बुनियादी बदलाव बांग्लादेश में आए असल बदलाव का संकेत है। ये परिवर्तन सिरे से नकारात्मक है। इससे आवाम का कोई भला नहीं होगा। बल्कि उन्हें धर्मांधता की खाई में झोंकने की प्रवृत्तियां और हावी होंगी।

बांग्लादेश में अगस्त 2024 से अब तक के घटनाक्रम के अध्ययनकर्ता इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि एक बहुत बड़ी उथल- पुथल के बावजूद वहां कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं हुआ। फर्क सिर्फ इतना पड़ा कि वहां उदार राजनीतिक धारा पृष्ठभूमि में चली गई और राजनीतिक मुकाबला मजहबी कंजरवेटिव और मजहबी कट्टरपंथियों के बीच सिमट गया। फिलहाल, अपने सांगठनिक ढांचे, निहित स्वार्थों से बेहतर तालमेल, और पुरानी सियासी पहचान के कारण कंजरवेटिव बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भारी पड़ी है। आम चुनाव में उसे दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ, जबकि प्रमुख विपक्षी दल के रूप में जमात-ए-इस्लामी उभरी है, जिसे एक समय प्रतिबंधित किया गया था।

जमात इस्लामी कट्टरपंथ का प्रतिनिधि दल है, जिसने 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में पाकिस्तान का साथ दिया था। इसी कारण बांग्लादेश के निर्माण के बाद उसे प्रतिबंधित किया गया। जमात पर से प्रतिबंध बीएनपी के संस्थापक जनरल जियाउर रहमान के शासनकाल में उठाया गया। उसके बाद के कई चुनावों में जमात का बीएनपी से गठबंधन रहा। शेख हसीना के 15 साल के आखिरी शासनकाल में स्वतंत्रता संग्राम से “गद्दारी” और बांग्ला-भाषियों के मानव संहार में पाकिस्तानी फौज का साथ देने के इल्जाम में उसके कुछ नेताओं को फांसी की सजा हुई, अनेक जेल में डाले गए, और उसके संगठन को हाशिये पर रखा गया। वहां से निकल कर देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन जाना असल में बांग्लादेश में आए बदलाव की असल कहानी है।

गौरतलब है कि अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़कर भागने के बाद बनी अंतरिम सरकार ने उनकी पार्टी अवामी लीग को नष्ट करने के लगभग वैसे ही कदम उठाए, जैसाकि अवामी लीग ने जमात के खिलाफ उठाया था। लीग को इस बार चुनाव लड़ने नहीं दिया गया। जमात और लीग की स्थिति में आया ये बुनियादी बदलाव बांग्लादेश की दीर्घकालिक दिशा में आए बदलाव का संकेत है। विवेकशील दृष्टिकोण से देखें, तो ये बदलाव सिरे से नकारात्मक है। इससे बांग्लादेश के आवाम का कोई भला नहीं होगा। बल्कि उन्हें धर्मांधता की खाई में झोंकने की प्रवृत्तियां और अधिक हावी होंगी। उसका नतीजा उनकी रोजमर्रा की मुसीबतें बढ़ने के रूप में सामने आएगा।

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By NI Editorial

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