पहली जरूरत तो यह है कि स्किल इंडिया योजना में जहां भ्रष्टाचार के संकेत मिले हैं, उसके दोषी लोगों की जवाबदेही तय की जाए। दूसरी बात यह समझने की है कि ऐसी योजनाओं से बेरोजगारी की समस्या खत्म नहीं मिलेगी।
स्किल इंडिया यानी प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना शुरू होने के कुछ समय बाद ही इसको लेकर कई तरह के इल्जाम लगे। कुछ हलकों से इसे निजी कंपनियों को सार्वजनिक धन के ट्रांसफर की योजना बताया गया था। आरोप लगा कई बड़ी कंपनियों ने अपने ट्रेनिंग सेंटर बना कर सरकारी धन ले लिया और उसका उपयोग पहले से कार्यरत अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने में किया। जबकि योजना का मकसद स्किल ना होने के कारण बेरोजगार नौजवानों को रोजगार योग्य बनाना था। बाद में कुछ मीडिया रिपोर्टों से कौशल विकास केंद्रों में गंभीर गड़बड़ियों की बात सामने आई थी। अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने जो विवरण दिया है, उससे इस योजना में गंभीर भ्रष्टाचार का संदेह पैदा हुआ है। सीएजी की संसद के शीतकालीन सत्र में पेश रिपोर्ट के मुताबिक हजारों की संख्या में भुगतान बैंक खाता संख्या ‘11111111111’ में किए गए। इसके अलावा 34 लाख से अधिक भुगतान लंबित हैं। उधर निरीक्षण के दौरान बहुत से ट्रेनिंग सेंटर बंद पाए गए। स्किल इंडिया योजना 2015 में शुरू की गई।
तब से इसके कुल तीन चरणों पर अमल हुआ है। सीएजी को ट्रेनिंग के बाद प्रमाण-पत्र देने के क्रम में भी गड़बड़ियां देखने को मिलीं। इन हालात को देखते हुए इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं है कि यह योजना युवा बेरोजगारी को घटाने में नाकाम रही, जबकि इस पर करदाताओं के साढ़े 14 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए। 2025 में केंद्र ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, एपरेन्टिस प्रोमोशन स्कीम और जन शिक्षण संस्थान योजना को मिला कर एकीकृत स्किल इंडिया कार्यक्रम शुरू किया है। लेकिन एपरेन्टिस यानी प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना भी अब तक बेअसर ही है। इसके तहत इंटर्नशिप के तकरीबन एक लाख 20 हजार अवसर दिए गए, लेकिन सिर्फ लगभग दो हजार युवाओं ट्रेनिंग पूरी की है। क्या इन अनुभवों से सरकार कोई सबक लेगी? पहली जरूरत तो यह है कि जहां भ्रष्टाचार के संकेत मिले हैं, उनकी पारदर्शी जांच हो और दोषी लोगों की जवाबदेही तय की जाए। दूसरी जरूरत यह समझने की है कि इस तरह की योजनाओं से बेरोजगारी की समस्या कम नहीं होगी, क्योंकि इसकी जड़ें कहीं गहरी हैं।


