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गपशप

सेहत और स्वास्थ्य का संकट बहुत बड़ा होगा

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भारत बिना तैयारी के सबसे बड़ी आबादी वाला देश बनने जा रहा है। हिसाब सेशिक्षा, कौशल और रोजगार के विकास के साथ स्वास्थ्य-चिकित्सान पर ध्यान बनना चाहिए।  लेकिन अफसोस की बात है कि भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुविधाएं यानी सस्ती सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति लगातार बिगडते हुए है। शिक्षा की तरह अच्छी स्वास्थ्य सेवा भी लगभग पूरी तरह से निजी हाथ में है। शहरी क्षेत्र में तो फिर भी आर्थिक स्थिति अच्छी है, रोजगार और नौकरी की संभावना बेहतर है और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं भी ठीक हैं तो शहरी आबादी के लिए जीवन आसान होगा लेकिन देहात में मुश्किले बढ़ेगी।

गांव-कस्बों की की अर्थव्यवस्था बुरी तरह बिगड़ी है। कृषि सेक्टर कमजोर हुआ है। बड़ी युवा आबादी ने गांवों से शहरों की ओर पलायन किया है। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब से गांवों में शहरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना पर काम चल रहा है लेकिन इसका कोई लक्ष्य हासिल नहीं हो सका। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं बन पाए हैं। तेजी से हो रही शहरीकरण और गांवों से युवाओं के पलायन की वजह से गरीब राज्यों में ज्यादातर उम्रदराज आबादी या महिलाएं गांवों में हैं, जिनके लिए चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गांवों की अर्थव्यवस्था कमजोर होने से अच्छी चिकित्सा  आम लोगों के लिए लगभग नामुमकिन हो गई है।

मुश्किल वाली बात यह है कि बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ रही है। एक आंकड़ें के मुताबिक 2040 में भारत की करीब 16 फीसदी आबादी बुजुर्ग होगी। वह कामकाज करने की उम्र पार कर चुकी होगी। इसका मतलब है कि करीब 22 करोड़ आबादी बूढ़ी और बेकार होगी। उनके स्वास्थ्य की क्या सुविधा है? अभी भारत की जनसंख्या की औसत उम्र 29 साल के करीब है, जबकि जापान में यह उम्र 47 साल है। इसका मतलब है कि वहां बुजुर्ग आबादी बहुत ज्यादा है। तभी उनकी स्वास्थ्य देखभाल के लिए बड़ी जरूरतें होतीं हैं, भारत में क्योंकि युवा आबादी ही बेरोजगार होगी तो बुजुर्ग आबादी का ध्यान कहां से रखा जा सकेगा?

अस्पतालों में प्रति व्यक्ति बेड्स और डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता के लिहाज से भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में से एक है। स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने के नाम पर आयुष्मान भारत योजना है, इसका फायदा मोटे तौर पर निजी अस्पतालों को मिल रहा है। इससे देश में स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा नहीं सुधर रहा है। भारत की सबसे बड़ी जरूरत बुजर्गों की देखभाल और उनको प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की होनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि स्वास्थ्य का बजट बढ़ाया जाए और बजट का ज्यादा हिस्सा प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को विकसित करने में लगे। लेकिन क्या ऐसी कोई प्राथमिकता बनी दिखती है?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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