जीवनशैली संबंधी विकृतियां, बांझपन और गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं के कारण गर्भधारण से पहले की देखभाल पर अब अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भावी माता-पिता को गर्भावस्था से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करने से प्रजनन और जन्म संबंधी परिणामों में सुधार हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि जहां हाल के वर्षों में आधुनिक चिकित्सा ने इस नजरिए पर ज्यादा जोर दिया है, वहीं आयुर्वेद सदियों से गर्भाधान संस्कार के जरिए इसी तरह की अवधारणा की वकालत करता रहा है। गर्भाधान संस्कार गर्भधारण से पहले की देखभाल का एक कार्यक्रम है ।
कर्नाटक के उडुपी में एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय एवं अस्पताल उन केंद्रों में से एक है जो कई सालों से अपने आयुर्वेदिक गर्भधारण-पूर्व देखभाल के तहत ‘गर्भाधान संस्कार’ की सुविधा प्रदान कर रहा है। दक्षिण भारत के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे युगल यहां आते हैं जो गर्भधारण की योजना बनाने से पहले सलाह लेना चाहते हैं।
एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय एवं अस्पताल की प्राचार्य और वरिष्ठ प्रसूति विज्ञानी डॉ. ममता के वी के अनुसार, इस कार्यक्रम के तहत गर्भधारण से पहले व्यक्तिगत आयुर्वेदिक देखभाल, खान-पान में बदलाव, जीवनशैली से जुड़े उपायों और परामर्श के ज़रिए माता-पिता बनने वाले दंपति की सेहत को बेहतर बनाने पर बल दिया जाता है।
उन्होंने ‘गर्भाधान संस्कार’ को ‘गर्भधारण के लिए सुविचारित तैयारी’ बताया, जिसमें गर्भावस्था से पहले होने वाले माता-पिता की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक कल्याण का ध्यान रखा जाता है।
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ममता ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया ‘गर्भ’ शब्द का अर्थ है भ्रूण और ‘आधान’ का अर्थ है स्थापना। इस तरह ‘गर्भाधान’ का मतलब गर्भधारण के लिए सुविचारित तैयारी है। ‘संस्कार’ शब्द का अर्थ है कि गर्भधारण केवल एक जैविक घटना नहीं है, बल्कि होने वाले माता-पिता को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करने और बेहतर बनाने की एक पवित्र प्रक्रिया है, ताकि वे अपने बच्चे को सबसे स्वस्थ शुरुआत दे सकें।
हालांकि यह अवधारणा हज़ारों साल पहले ही विस्तार से बतायी गयी थी, लेकिन आयुर्वेद आज भी इसे बहुत अहम मानता है क्योंकि जीवनशैली से जुड़ी ऐसी बीमारियां बढ़ रही हैं जो प्रजनन और गर्भधारण के नतीजों पर असर डालती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार, सफल गर्भधारण चार ज़रूरी चीज़ों पर निर्भर करता है – ‘ऋतु’ (सही मौसम या प्रजनन की उम्र), ‘क्षेत्र’ (एक स्वस्थ जमीन या खेत, जो महिला प्रजनन प्रणाली को दर्शाता है), ‘अम्बु’ (पर्याप्त पोषण, जो विकास में मदद करने वाले पानी के समान है) और ‘बीज’ (स्वस्थ बीज, जो अंडाणु और शुक्राणु को दर्शाता है)।
संस्थान के ‘प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग’ विभाग की वरिष्ठ प्रसूति विज्ञान एवं स्त्रीरोग चिकित्सक ममता ने बताया कि आयुर्वेद, ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांड’ के प्राचीन दार्शनिक सिद्धांत के आधार पर गर्भधारण की तुलना एक स्वस्थ पौधे को उगाने से करता है।
उन्होंने कहा जैसे अच्छी फसल के लिए सही मौसम, उपजाऊ जमीन, पर्याप्त पानी और स्वस्थ बीजों की जरूरत होती है, वैसे ही माना जाता है कि गर्भधारण से पहले जब ये चारों चीजें सही स्थिति में होती हैं, तभी स्वस्थ संतान का जन्म होता है।
आयुर्वेद के अनुसार, गर्भाधान संस्कार का उद्देश्य गर्भधारण से पहले इन सभी कारकों को बेहतर बनाना है, ताकि एक स्वस्थ गर्भावस्था और स्वस्थ बच्चे की नींव मजबूत हो सके।
उन्होंने कहा कि इसीलिए गर्भाधान संस्कार को सोलह संस्कारों में पहला माना जाता है, जो मानव जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। गर्भधारण से पहले सेहत के बढ़ते महत्व को आधुनिक वैज्ञानिक साहित्य में भी देखा जा सकता है।
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