गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। इन्हीं में से एक आम समस्या है स्ट्रेच मार्क्स, जिसे स्ट्राई ग्रेविडेरम भी कहा जाता है। यह पेट, जांघों, कूल्हों और कभी-कभी स्तनों के आसपास दिखाई देने वाली हल्की या गहरी लकीरों के रूप में होते हैं। ये भले ही पूरी तरह से नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कई महिलाओं के लिए यह चिंता और असहजता का कारण बन जाते हैं।
असल में गर्भावस्था के दौरान जैसे-जैसे पेट बढ़ता है, त्वचा तेजी से खिंचती है। जब त्वचा की अंदरूनी परतें इस खिंचाव को पूरी तरह संभाल नहीं पातीं, तो वहां छोटे-छोटे निशान बन जाते हैं, जिन्हें स्ट्रेच मार्क्स कहते हैं। शुरुआत में ये गुलाबी या लाल रंग के होते हैं, लेकिन समय के साथ हल्के सफेद रंग के हो जाते हैं।
आयुर्वेद में माना जाता है कि अगर त्वचा को अंदर से पोषण और बाहर से सही देखभाल मिले, तो इन निशानों को काफी हद तक कम किया जा सकता है या उनकी तीव्रता को रोका जा सकता है। इसके लिए प्राकृतिक तेल और जड़ी-बूटियों का उपयोग बहुत फायदेमंद बताया गया है।
आयुर्वेदिक उपायों में चंदन, वेटिवर (उशीर) और तुलसी जैसी औषधियों का विशेष महत्व है। इनका लेप बनाकर हल्के तेल के साथ पेट पर नियमित रूप से लगाने की सलाह दी जाती है।
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माना जाता है कि इससे त्वचा मुलायम बनी रहती है और खिंचाव के कारण होने वाली खुजली और जलन में भी आराम मिलता है। खासकर गर्भावस्था के चौथे महीने से इस तरह की देखभाल शुरू करने की सलाह दी जाती है और इसे पूरे गर्भकाल तक जारी रखने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
इसके अलावा, करंज के पत्तों से तैयार तेल या लेप भी त्वचा की लोच बनाए रखने में मददगार माना जाता है। यह त्वचा को पोषण देता है और सूखापन कम करता है, जिससे स्ट्रेच मार्क्स बनने की संभावना कुछ हद तक घट जाती है।
आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि गर्भावस्था में खुजली होने पर त्वचा को खुजलाना नहीं चाहिए। कई बार लोग अनजाने में त्वचा को रगड़ देते हैं, जिससे स्ट्रेच मार्क्स और ज्यादा बढ़ सकते हैं। हल्की खुजली के लिए प्राकृतिक तेल या डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है।
साथ ही, संतुलित आहार भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शरीर को पर्याप्त पानी, फल, हरी सब्जियां और पोषक तत्व मिलेंगे तो त्वचा अंदर से मजबूत बनी रहती है। इससे भी स्ट्रेच मार्क्स की संभावना कम हो सकती है।
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि स्ट्रेच मार्क्स पूरी तरह से रोकना हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि यह शरीर के प्राकृतिक बदलाव का हिस्सा हैं। लेकिन सही देखभाल, नियमित तेल मालिश और आयुर्वेदिक उपायों से इन्हें काफी हद तक कम किया जा सकता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है।
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