नई दिल्ली। एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका के भ्रष्टाचार का अध्याय शामिल करने के मामले में दो महीने पहले दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव किया है। इस मामले में 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जिन तीन शिक्षाविदों ने विवादित हिस्सा लिखा। उन्हें हटा दिया जाए और दोबारा काम न दिया जाए। अदालत ने उन्हें हटाने का फैसला बदल दिया है।
तीनों शिक्षाविदों ने अदालत में एक याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को अदालत ने आदेश बदल दिया। अदालत ने कहा कि केंद्र, राज्य, यूनिवर्सिटी और सरकारी फंड पाने वाले संस्थान इस मामले में खुद फैसला लें। मामले में जिन तीन शिक्षाविदों का नाम आया था। उनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार शामिल हैं।
मार्च के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन लोगों ने जान बूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और छात्रों के सामने न्यायपालिका की नकारात्मक छवि दिखाई। कोर्ट ने यह टिप्पणी भी वापस ले ली है। गौरतलब है कि एनसीईआरटी ने 23 फरवरी को कक्षा आठ के छात्रों के लिए सोशल साइंस की नई टेक्स्ट बुक जारी की थी। इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का एक अध्याय शामिल किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया और सुनवाई की। अदालत की नाराजगी के बाद ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय वाली किताब प्रतिबंधित कर दी गई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने किताब छापने और बिक्री पर रोक लगाने का आदेश दिया था। साथ ही कहा कि जो किताबें छप चुकी हैं, उसे जब्त करने और डिजिटल कॉपियों को भी हटाने को कहा था। उसी समय अदालत ने तीनों लेखकों को भी हटाने को कहा था, जिसमें अभी बदलाव किया गया है।


