राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

जनता किसको सुनाए अपना हाल

दुनिया के किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक देश के नागरिक की असहायता ऐसी नहीं होगी, जैसी भारत महान के नागरिकों की है। उसकी कहीं सुनवाई नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अभी हो गई है। पहले से ऐसा ही था लेकिन अब स्थिति ज्यादा खराब और गंभीर हो गई है। क्योंकि पहले कहीं सुनवाई नहीं होती थी तो नेताओं के यहां सुनवाई की उम्मीद होती थी। नेता बात सुनते थे क्योंकि उनको चुनाव लड़ने जाना होता था और जनता का वोट चाहिए होता था। लोग अपने पार्षद, विधायक और सांसद से शिकायत करते थे तो सुनवाई हो जाती थी। लोग धरना, प्रदर्शन करते थे तो बात सुन ली जाती थी। लेकिन अब वहां भी कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि जनता अपना पार्षद, विधायक या सांसद चुन ही नहीं रही है। हर चुनाव में कोई न कोई एक बड़ा चेहरा होता है, जिसके लिए कहा जाता है कि आप उम्मीदवार को मत देखिए उस चेहरे को देखिए और वोट कीजिए।

भारतीय राजनीति की यह बहुत दिलचस्प परिघटना है कि जनता उम्मीदवार को गालियां देती है, उसकी अयोग्यता और अक्षमता का मजाक उड़ाती है लेकिन उसको ही वोट करती है क्योंकि वह किसी न किसी महान, चमत्कारिक, अवतारी नेता की पार्टी का प्रत्याशी होता है। तभी चुनाव के बाद जनता अपने स्थानीय प्रतिनिधि के पास शिकायत लेकर जा नहीं सकती है और चमत्कारी या अवतारी नेता कहां मिलते हैं शिकायत सुनने को! जब उनकी मर्जी होगी तब सुन लेंगे और कुछ उपहार भी दे देंगे लेकिन जैसे ईश्वर के सामने हर प्रार्थना कबूल नहीं होती है वैसे ही चमत्कारी नेता के सामने भी सारी प्रार्थनाएं स्वीकृत नहीं होती हैं।

इस तरह वोट की ताकत से लैस भारतीय नागरिक के पास अपनी तकलीफें सुनाने और उसका समाधान हासिल करने का जो एकमात्र रास्ता था वह भी बंद हो गया है। ध्यान रहे राजनीतिक व्यवस्था से बाहर आम आदमी की कहीं सुनवाई पहले भी नहीं होती थी। दुर्भाग्य है कि इस देश में एक भी संस्था जनता की मदद के लिए नहीं बनाई गई है। जनता की मदद के नाम पर जो संस्थाएं बनी हैं वो अंततः व्यवस्था के काम आती हैं। पुलिस स्टेशन जनता की शिकायत दर्ज करने के लिए बने हैं लेकिन वे अपराधियों के संरक्षण के लिए काम करते हैं। अदालतें आम नागरिक की समस्याओं को सुलझाने के लिए बनी हैं लेकिन वह अमीर और ताकतवर लोगों की समस्याएं पहले सुलझाती हैं और आम आदमी अदालतों के चक्कर काटता रहता है। यह अनायास नहीं है कि देश में पांच करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। आम नागरिकों के लिए उपभोक्ता अदालतें बनी हैं लेकिन वहां कंपनियों को ज्यादा राहत मिलती है। कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए आयोग बना है लेकिन देश में प्रतिस्पर्धा की जगह कंपनियों का एकाधिकार बन रहा है। कलेक्टर अब जिलाधीश बन गया है, जिसकी एक झलक दिख जाए तो जनता धन्य हो जाती है। सोशल मीडिया में रील्स बनती हैं कि अमुक जिले के कलेक्टर ने आम लोगों की शिकायतें सुनीं, जबकि उसका काम ही यही है। वन संरक्षण के कानून हैं लेकिन वन में रहने वालों की बजाय माइनिंग करने वाली और उद्योग लगाने वाली कंपनियों को उसका ज्यादा लाभ है। यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। कम लिखा है, ज्यादा समझने की जरुरत है।

सोचें, क्या स्थिति है कि देश के नागरिक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की समस्या से जूझ रहे हैं। एक के बाद एक गाड़ी खराब होने और माइलेज बिगडऩे की कहानियां सामने आ रही हैं लेकिन सरकार में कोई सुनवाई नहीं है। उलटे सरकार की ओर से दो टूक कह दिया गया गया कि नॉर्मल पेट्रोल का मतलब ई-20 पेट्रोल है। यानी बिना मिलावट वाला पेट्रोल नहीं मिलेगा और सरकार मिलावट वाले पेट्रोल की कीमत भी कम नहीं करेगी। भाजपा के एक सांसद ने कहा, ‘शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के यहां से आएगा’? दुनिया के किसी भी सभ्य देश के नागरिक को अपनी सरकार से इस तरह का जवाब नहीं मिलेगा। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक ऐसे ही जवाब के हकदार बना दिए गए हैं!

प्रधानमंत्री हर महीने मन की बात करते हैं लेकिन वे भी जनता के मन की बात नहीं समझ पा रहे हैं और न उसका जिक्र कर रहे हैं। पेपर लीक और ऑनस्क्रीन मार्किंग से लाखों छात्र परेशान हुए। लेकिन सरकार में किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। लेह से आकर सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे तो सरकार ने उनकी परवाह नहीं की और जब संसद का सत्र नजदीक आया तो उनको धरने की जगह से उठा कर अस्पताल में डाल दिया गया। उनको भूख हड़ताल शुरू करने के 21वें दिन जंतर मंतर से उठाया गया, उससे पहले सरकार ने सबसे निचले दर्जे के किसी कर्मचारी, अधिकारी को भी उनसे बात करने के लिए नहीं भेजा। उलटे वांगचुक को उठाने के बाद प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च किया तो लाठी चला कर, आंसू गैस के गोले छोड़ कर और पानी की बौछार करके उनके प्रदर्शन को दबाया गया। यही कहानी झारखंड में भी दोहराई गई है। सोचें, औपनिवेशिक शासन के दौरान महात्मा लगांधी सत्याग्रह या अनशन करते थे तब भी जुल्मी गोरी सरकार अपना प्रतिनिधि उनसे बात करने भेजती थी।

अब कोई सुनवाई नहीं है। आपको इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से शिकायत है तो करते रहिए शिकायत। आपको पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी और उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के तरीके से शिकायत है तो करते रहिए शिकायत। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में आपका नाम कट गया है तो उसकी भी शिकायत करते रहिए। गंदी हवा से दम घुट रहा है और प्रदूषित पानी पीकर बीमार हो रहे हैं तो उसकी भी शिकायत करते रहिए। जंगल काटे जाने और अंधाधुंध माइनिंग से बाढ़ आ रही है और भूस्खलन हो रहा है, जिसमें आपका घर बह रहा है तो कोई बात नहीं शिकायत करते रहिए। महंगाई से परेशान हैं और नौकरी नहीं मिल रही है तब भी कोई बात नहीं शिकायत करते रहिए। जिस तरह इस देश के करोड़ों लोगों की शिकायतें और प्रार्थनाएं मंदिरों की दीवारों से टकरा कर लौटती हैं उसी तरह करोड़ों लोगों की शिकायतें कर्तव्य भवनों या सेवा तीर्थ की दीवारों से टकरा कर लौट रही हैं। उनके हाल की किसी को परवाह नहीं है। ‘सवारी अपने सामान की रक्षा स्वंय करे’ वाली स्थिति है। जनता अपनी स्थिति के लिए स्वंय जिम्मेदार है और स्वंय ही रास्ता तलाशे। सरकार राज करने के लिए है और जनता नागरिक का कर्तव्य निभाने के लिए!

Tags :

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment