सभ्यता ध्वंस की भाषा, लोकतंत्र की परीक्षा
भाषा ही यह तय करती है कि क्या सोचा जा सकता है और क्या किया जा सकता है, और जब भाषा से संकोच हटता है तो कल्पना भी सीमाएँ तोड़ देती है, और किसी देश या सभ्यता को मिटा देने की बात केवल बयान नहीं रहती, वह एक तरह की अनुमति बन जाती है।।। आज अमेरिका अपने ही दो रूपों के बीच खड़ा है, एक जो सीमाओं को पहचानता है, और दूसरा जो खुलकर शक्ति की भाषा बोलता है। एक समय था जब किसी देश को “पाषाण युग में भेज देने” जैसी धमकियाँ युद्ध कक्षों की सीमित भाषा में रहती...