Democracy

  • इंडोनेशिया के चुनाव में लोकतंत्र को खतरा?

    चौदह फरवरी को दुनिया के तीसरे सबसे बड़े लोकतंत्र इंडोनेशिया में वोटिंग है। माना जा रहा है पूर्व जनरल प्रोबो सुबियांटो अगले राष्ट्रपति होंगे।और  उनका मानवाधिकारों के मामले में भयावह रिकार्ड है तो लोकतंत्र में उनकी आस्था को लेकर भी संदेह है। वे देशके दूसरे और सबसे लंबे कार्यकाल वाले राष्ट्रपति सुहार्तो के दामाद भी हैं। बावजूद इसके इंडोनेशिया को नई दिशा देने वाले मौजूदा राष्ट्रपति जोको विडोडो ने उन पर हाथ रखा है। उनके समर्थन से उनकी जीत तय मानी जा रही है? तो क्या इंडोनेशिया में भी लोकतंत्र खतरें में है? जवाब सुबियांटो के विवादास्पद अतीत में है।वे...

  • क्यों लिबरल डेमोक्रेसी हर जगह संकट में?

    साल 2024 को चुनावों का साल कहा जा रहा है। कारण यह कि इस वर्ष दर्जनों “लोकतांत्रिक” देशों में आम चुनाव होने वाले हैं। शुरुआत रविवार (सात जनवरी) को बांग्लादेश से हुई, जहां संसद के लिए मतदान हुआ।  फिर ताइवान, पाकिस्तान, रूस, भारत, दक्षिण अफ्रीका, यूरोपीय संघ, पुर्तगाल, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, वेनेजुएला, आदि से होते हुए अमेरिका की बारी आएगी। साल का अंत (अगर प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने समय से पहले ही मतदान करा लेने का निर्णय नहीं लिया, तो) ब्रिटेन के आम चुनाव से होगा। इन तमाम चुनावों में संभवतः ताइवान और मेक्सिको अपवाद हैं, जहां आम चुनाव...

  • लोकतंत्र के लिए अहम नया साल

    नए साल की शुरुआत बांग्लादेश के चुनाव से हो रही है। सात जनवरी को बांग्लादेश में वोट डाले जाएंगे। उसके एक महीने बाद आठ फरवरी को पाकिस्तान में आम चुनाव होंगे और अप्रैल-मई में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत में लोकसभा चुनाव होना निर्धारित है। दक्षिण एशिया में गर्भनाल से जुड़े रहे ये तीनों देश भले आज अलग अलग हैं लेकिन इनमें बहुत कुछ एक जैसा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत का लोकतंत्र दुनिया के किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश की तरह जीवंत है, जहां मतदाताओं की संख्या एक सौ करोड़ के करीब है...

  • चरमरा रहा है लोकतंत्र

    आम अनुभव यही है कि लिबरल डेमोक्रेसी के अंदर नीतिगत आधार पर मौजूद वास्तविक विकल्पों का अभाव बढ़ता चला गया है। नतीजा यह है कि ऐसे नेताओं और दलों के लिए रास्ता खुल गया है, जो जनता के बीच उत्तेजना फैलाने में माहिर हैं। विश्व मीडिया में 2024 को चुनावों का साल बताया गया है। इस वर्ष तकरीबन 60 देशों में किसी ना किसी स्तर के चुनाव होने हैं। शुरुआत बांग्लादेश में सात जनवरी को होने वाले संसदीय चुनाव होगी। लेकिन असल में वहां मतदाताओं के सामने चुनने के लिए कोई सार्थक विकल्प नहीं है। चूंकि प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद...

  • भारत में कार्यपालिका की सर्वोच्चता

    सैद्धांतिक रूप से भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक को समान रूप से लोकतंत्र के तीन स्तम्भों के रूप में रेखांकित किया गया है। शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत तीनों अंगों के कार्यों का बंटवारा किया गया है और उनके अधिकार तय किए गए हैं। संविधान के मुताबिक तीनों को अपने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में रह कर काम करना चाहिए और उसका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में कार्यपालिका की भूमिका सर्वोच्च है और यह स्थिति आजादी के बाद से ही है। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू...

  • लोकतंत्र पर रोना/गाना हास्यास्पद है

    सैद्धांतिक रूप से भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक को समान रूप से लोकतंत्र के तीन स्तम्भों के रूप में रेखांकित किया गया है। शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत तीनों अंगों के कार्यों का बंटवारा किया गया है और उनके अधिकार तय किए गए हैं। संविधान के मुताबिक तीनों को अपने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में रह कर काम करना चाहिए और उसका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में कार्यपालिका की भूमिका सर्वोच्च है और यह स्थिति आजादी के बाद से ही है। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू...

  • लोकतंत्र के संकट के बीच नए अवसर भी मौजूद

    सैद्धांतिक रूप से भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक को समान रूप से लोकतंत्र के तीन स्तम्भों के रूप में रेखांकित किया गया है। शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत तीनों अंगों के कार्यों का बंटवारा किया गया है और उनके अधिकार तय किए गए हैं। संविधान के मुताबिक तीनों को अपने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में रह कर काम करना चाहिए और उसका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में कार्यपालिका की भूमिका सर्वोच्च है और यह स्थिति आजादी के बाद से ही है। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू...

  • अहिंसा लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत: सीएम योगी

    सैद्धांतिक रूप से भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक को समान रूप से लोकतंत्र के तीन स्तम्भों के रूप में रेखांकित किया गया है। शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत तीनों अंगों के कार्यों का बंटवारा किया गया है और उनके अधिकार तय किए गए हैं। संविधान के मुताबिक तीनों को अपने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में रह कर काम करना चाहिए और उसका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में कार्यपालिका की भूमिका सर्वोच्च है और यह स्थिति आजादी के बाद से ही है। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू...

  • लोकतंत्र…. विभत्स चेहरा: प्रजातंत्र के लिए ये ही दिन देखना शेष थे…?

    सैद्धांतिक रूप से भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिक को समान रूप से लोकतंत्र के तीन स्तम्भों के रूप में रेखांकित किया गया है। शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत तीनों अंगों के कार्यों का बंटवारा किया गया है और उनके अधिकार तय किए गए हैं। संविधान के मुताबिक तीनों को अपने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे में रह कर काम करना चाहिए और उसका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में कार्यपालिका की भूमिका सर्वोच्च है और यह स्थिति आजादी के बाद से ही है। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू...

  • नागरिकों का प्रजा में बदल जाना

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  • लोकतंत्र का सच झूठ

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  • पाकिस्तान का फर्जी लोकतंत्र

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  • प्रजातंत्र में ‘बहुमत’ वरदान या अभिशाप…?

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  • आपातकाल को नहीं भुला सकते: पीएम मोदी

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  • इसका अर्थ तो अमित शाह विलन?

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  • ट्विटर के खुलासे पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार को घेरा

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  • जम्मू-कश्मीर को ‘लोकतंत्र से वंचित’ किया गया

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  • तुर्किये में आखिर लोकतंत्र था कब?

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  • लोकतंत्र की अफ़ीम के चटोरों का देश

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  • फिर चुनाव का क्या मतलब?

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