लोकतंत्र पर मोदी-कमला में बात

प्रधानमंत्री मोदी और उपराष्र् पति कमला हैरिस में आतंकवाद और लोकतंत्र की रक्षा पर हुई बात और निश्चय।

नौकरशाही, नेताशाही और लोकतंत्र

मातूर की पंचायत ने अपने गांव के लोगों से कहा है कि वे जब सरकारी अधिकारियों को संबोधित करें तो उन्हें आदरपूर्वक भाई या बहन कह दें लेकिन उन्हें ‘सर’ (महोदय) या मेडम (महोदया) न कहें।

जो सच बोलेंगे, सच्चे होंगे, वे मारे जाएंगे!

देश के चीफ जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का आभार जो उन्होंने सरकारों और लोकतंत्र का आधार मानी जाने वाली संस्थाओं की हकीकत जाहिर की।

संसद की प्रासंगिकता का सवाल

संसद की गरिमा इस बात में है कि इसकी नियमित बैठकें हों, बैठकों में सदन के नेता और नेता विपक्ष दोनों ज्यादा से ज्यादा समय मौजूद रहें, विधायी मसलों पर ज्यादा चर्चा हो और आम सहमति बनाने का प्रयास हो

ममता ने फिर पीएम मोदी को कहा तानाशाह, बोलीं- BJP को सत्ता के बाहर करने तक जोरी रहेगा ‘खेला’

कोलकाता | CM Mamta On BJP: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी पर बड़ा हमला किया है. सीएम ममता ने कहा कि अभी तो भाजपा को सिर्फ बंगाल से भगाया है जब तक देश की सत्ता से बाहर नहीं करते तब तक खेला जारी रहेगा. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर एक बार फिर से तानाशाही करने का आरोप लगाया. श्रीमती बनर्जी ने कहा कि भाजपा जानबूझकर त्रिपुरा में हमारे कार्यक्रम को रोक रही है. क्या भारतीय जनता पार्टी के लिए यही लोकतंत्र है? BJP के लोग तानाशाही चाहते हैं। वे कार्यक्रम आयोजित नहीं करने दे रहे हैं। त्रिपुरा में उन्होंने हमारे लोगों को रैली नहीं करने दी। क्या ये लोकतंत्र है? चुनाव बाद हिंसा में कुछ नहीं हुआ। वे देश की संस्थाओं को नष्ट कर रहे हैं:पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी pic.twitter.com/eCmfNrKq5r — ANI_HindiNews (@AHindinews) July 21, 2021 आज शहीद दिवस के रूप में मना रही है TMC CM Mamta On BJP: बता दें कि तृणमूल कांग्रेस 21 जुलाई यानी कि आज शहीद दिवस के रूप में मना रही है. इसी कार्यक्रम को वर्चुअली संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मोदी सरकार देश की संस्थाओं को लगातार बर्बाद करने का… Continue reading ममता ने फिर पीएम मोदी को कहा तानाशाह, बोलीं- BJP को सत्ता के बाहर करने तक जोरी रहेगा ‘खेला’

“खेला होबे” और सत्य

विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ( chief minister mamata banerjee ) ने “लोकतंत्र बचाने” के नाम पर “खेला होबे” का नारा दिया था। क्या इस नारे का वास्तविक तात्पर्य चुनाव- परिणाम के बाद विरोधियों को सबक सिखाने से था? 2 मई के बाद से बंगाल में जो कुछ हो रहा है- क्या उसका संकेत मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा नंदीग्राम में 29 मार्च 2021 को दिए उस वक्तव्य में छिपा है, जिसमें उन्होंने कहा था, “…आने वाले दिनों में हम ही रहेंगे, तो देख लेंगे…।” पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का रूप बीभत्स है। यह कलकत्ता उच्च न्यायालय की टिप्पणी से पुन: स्पष्ट हो गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा सौंपी गई प्रारंभिक रिपोर्ट पर अदालत ने 2 जुलाई को सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “प्रथम दृष्टया स्थापित होता है कि प.बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा हुई थी, जबकि राज्य सरकार इससे इनकार करती रही। हिंसा में कई लोग मारे गए। कई लोगों को यौन हिंसा और गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा। Corona Update: दुनिया में बढ़ रहा है कोरोना, सबूत हैं कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई यहां तक कि नाबालिग बच्चियों को भी नहीं बख्शा गया, उनका भी क्रूरता से यौन… Continue reading “खेला होबे” और सत्य

सत्तापक्ष रचनात्मक नहीं तो विपक्ष कैसे?

अगर सरकार खुद रचनात्मक नहीं हो, वह विपक्ष की आलोचना को सकारात्मक रूप से नहीं लेती हो, वह संवैधानिक विपक्ष को नेस्तनाबूत करने या उससे देश को मुक्त करने की बात कहती हो, उसका समूचा प्रयास विपक्ष की साख बिगाड़ने और उसके नेताओं को बदनाम करने का हो तो फिर विपक्ष से रचनात्मक रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सब कहते हैं कि विपक्ष को रचनात्मक होना चाहिए और उसे सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोकतंत्र और संसदीय शासन प्रणाली की मजबूती के लिए रचनात्मक विपक्ष बहुत जरूरी है। पर क्या विपक्ष कोई स्वायत्त ईकाई है और क्या वह निर्वात में या आइसोलेशन में रचनात्मक हो सकता है? विपक्ष एक व्यवस्था का हिस्सा है, जिसके शीर्ष पर सरकार बैठी होती है और विपक्ष का रचनात्मक होना हमेशा सरकार के व्यवहार पर निर्भर करता है। जब तक सरकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका को स्वीकार नहीं करेगी और उसके प्रति सकारात्मक नजरिए नहीं रखेगी, तब तक विपक्ष का सकारात्मक या रचनात्मक होना संभव नहीं है। मौजूदा समय में रचनात्मक विपक्ष के रास्ते में यही सबसे बड़ी चुनौती है कि सत्तापक्ष खुद रचनात्मक नहीं है। उसे अपनी आलोचना बरदाश्त नहीं है या यूं… Continue reading सत्तापक्ष रचनात्मक नहीं तो विपक्ष कैसे?

जवाबदेही का सवाल है

अगर किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा हो या उसकी खामियां सामने आ रही हों, तो न्यायिक व्यवस्था को यह अवश्य बताना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही उस दुरुपयोग या खामी की कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा। वरना, लोकतंत्र अपूर्ण बना रहेगा। लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत होता है- जवाबदेही। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी को निरंकुश नहीं होना चाहिए। यानी सबकी किसी ना किसी के प्रति जवाबदेही होती है। इसलिए अगर किसी कानून का दुरुपयोग हो रहा हो या उसकी खामियां सामने आ रही हों, तो न्यायिक व्यवस्था को यह अवश्य बताना चाहिए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। साथ ही उस दुरुपयोग या खामी की कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा। चूंकि अपने देश में यह जवाबदेही नहीं निभाई जाती, इसलिए कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र कभी अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सका। पिछले कुछ सालों में तो यह जहां तक पहुंचा था, वहां से भी वापस लौटता दिखता है। बहरहाल, ये सारे सवाल एक ताजा न्यायिक फैसले से उठे हैँ। पिछले हफ्ते गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून (यूएपीए) के तहत लगे आरोप में नौ साल जेल में बिताने के बाद मोहम्मद… Continue reading जवाबदेही का सवाल है

संघीय ढांचे के लिए चुनौती

राजीव गांधी के सत्ता से बाहर होने के बाद केंद्र में गठबंधन की राजनीति का जो दौर शुरू हुआ था उस दौर में देश की संघीय व्यवस्था सबसे बेहतर ढंग से चली। कमजोर केंद्र की वजह से राज्यों को स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका मिला। गठबंधन की मजबूरी में केंद्र सरकारों ने राज्यों के साथ ज्यादा विवाद नहीं बढ़ाया। करीब 25 साल की उस अवधि में राज्य सरकारों को बरखास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले भी बहुत कम हुए। एक तरह से कमजोर केंद्र की वजह से राज्यों की स्वायत्तता मजबूत हुई। यह भी पढ़ें: झूठे आंकड़ों से बढ़ेगा संकट भारत सैद्धांतिक रूप से एक अर्ध संघ है, जिसमें मजबूत केंद्र की अवधारणा के साथ शासन की संघीय व्यवस्था बनाई गई है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने इसे सहकारी संघवाद का नाम दिया। तभी उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उम्मीद बंधी थी कि देश में संघवाद की व्यवस्था मजबूत होगी क्योंकि वे पहले नेता थे, जो 13 साल तक एक राज्य का मुख्यमंत्री रहने के बाद प्रधानमंत्री बने थे। उनसे पहले मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, नरसिंह राव और एचडी देवगौड़ा ही ऐसे प्रधानमंत्री हुए, जो पहले मुख्यमंत्री रहे थे। लेकिन सबका मुख्यमंत्री का कार्यकाल… Continue reading संघीय ढांचे के लिए चुनौती

बंगाल में भाजपा का अलग राज्य!

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाने का भाजपा को ऐसा मलाल हुआ है कि वह राज्य के अंदर एक अलग अपना राज्य बना रही है। हार को सीधे सीधे स्वीकार करने की बजाय भाजपा पहले दिन से ममता बनर्जी सरकार और तृणमूल कांग्रेस पार्टी के साथ ऐसा टकराव बना रही है, जिससे अगले पांच साल तक राज्य पूरी तरह से बंटा हुआ रहेगा। चुनाव नही जीत पाने की पीड़ा के साथ साथ यह 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी का भी हिस्सा है। आखिर भाजपा को राज्य में अपनी 18 लोकसभा सीटें बचानी हैं। बहरहाल, भाजपा और उसकी केंद्र सरकार ने तय किया है कि उसके जीते सभी 77 विधायकों को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की सुरक्षा दी जाएगी। सोचें, पश्चिम बंगाल में पिछले छह महीने से केंद्रीय अर्धसैनिक बल भी एक चुनावी मुद्दा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर आने वाले तमाम नेताओं को भाजपा की केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों की सुरक्षा दी हुई है। चुनाव के बीच ममता ने कई बार आरोप लगाया कि अर्धसैनिक बल सीधे अमित शाह से आदेश ले रहे हैं। कूचबिहार के सीतलकूची में चार लोग अर्धसैनिक बलों की गोली से मारे गए थे और 24 घंटे से भी कम समय में… Continue reading बंगाल में भाजपा का अलग राज्य!

हिंसा का कौन दोषी?

ये बात बार-बार उचित ही दोहराई जाती है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। दरअसल, किसी सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था में हिंसा के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। मतभेद कितने सद्भावपूर्ण ढंग से निपटाए जाते हैं, दरअसल, यही किसी समाज की सभ्यता को मापने की कसौटी होनी चाहिए। बहरहाल, यह आदर्श स्थिति है। भारत में चुनावी हिंसा अक्सर होती है। इसे नहीं होना चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है, जब सभी संबंधित पक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाएं। इस सिलसिले में जो दल जितना बड़ा है, और जिसे जनता ने जितनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है, उचित ही है कि उससे उतनी अधिक अपेक्षा रखी जाएगी। जाहिर है, आज की तारीख में यह दायित्व सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी को उठाना चाहिए। लेकिन पार्टी का हिंसा के प्रति क्या नजरिया है? फिलहाल, दो राज्यों में हुई चुनावी हिंसा चर्चा में है। पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के बाद हिंसा की अनेक घटनाएं हुईं। लेकिन पश्चिम बंगाल के बारे में जितना सुना गया, उतना उप्र के बारे में नहीं सुना गया। कारण साफ है। भाजपा और उसके समर्थक मीडिया ने जहां शोर मचाया, उसे लोगों ने ज्यादा सुना। लेकिन अगर मानदंड ऐसे दोहरे हों,… Continue reading हिंसा का कौन दोषी?

पूंजी के कब्जे में लोकतंत्र

राजनीति-शास्त्री और समाजशास्त्री अमेरिकी लोकतंत्र में पैदा हुए संकट की वजह यही बताते रहे हैं। उनका कहना है कि देश के लोकतंत्र पर वॉल स्ट्रीट यानी अमेरिकी शेयर बाजार यानी वहां के कॉरपोरेट सेक्टर का शिकंजा इतना कस चुका है कि लोकतंत्र की मूल भावना दमित हो गई है। इसके विरोध में लोग उग्र दक्षिणपंथ या वामपंथ की धुरियों पर जा रहे हैं। हालांकि ये बात नई नहीं है, लेकिन इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश होती नहीं दिखती। इस कारण लोगों में हताशा का फैलना लाजिमी है। अब सामने आए ताजा आंकड़ों का निष्कर्ष है कि 2020 के चुनाव में पूंजी का बड़ा हस्तक्षेप कायम रहा। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीमा कंपनियां, वित्तीय सेवा कंपनियां और रियल एस्टेट सेक्टर ने पिछले चुनाव में खूब चंदा दिया। सेंटर फॉर रेस्पॉन्सिव पॉलिटिक्स नाम की गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के आधार रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस पार्टी और किस नेता को किस कंपनी से कितना चंदा मिला। इसके मुताबिक वॉल स्ट्रीट ने उन 147 रिपब्लिकन नेताओं को भी चंदा दिया था, जिन्होंने सीनेट या हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति जो बाइडेन के निर्वाचन को वैध मानने से इनकार कर दिया। कुल… Continue reading पूंजी के कब्जे में लोकतंत्र

लोकतंत्र की रेटिंग का यदि बना देशी संस्करण…

बड़े आराम से कोई ऐसी शोध संस्था बनाई जा सकती है जो लोकतंत्र की रैंकिंग का देसी संस्करण जारी करने लगे। इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। मगर यह वैसा ही होगा जैसे हम नोबेल पुरस्कार अथवा ऑस्कर जैसा कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर दें। आप चाहें तो अपने पुरस्कार में दूसरों से ज्यादा पैसा दे सकते हैं और उसके लिए दूसरों से ज्यादा भव्य समारोह आयोजित कर सकते हैं।

बंगाल में अधिकारी लोकतंत्र की सर्वोच्चता बनाये रखें : मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम बंगाल के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों से संविधान तथा लोकतंत्र को सर्वोपरि रहने देने एवं कानून का शासन चलने देने का आज अनुरोध किया।

ये खो रही है ये पूंजी?

ये बात ध्यान में रखनी चाहिए कि भारत की छवि अगर इस सदी में आकर एक उभरती अर्थव्यवस्था और दुनिया के लिए एक मॉडल के रूप में बनी थी, तो उसके पीछे हमारे सॉफ्ट पॉवर का बड़ा योगदान था। अब इस शक्ति को दुनिया संदेह की नजर से क्यों देख रही है, यह आत्म-निरीक्षण का विषय है।

और लोड करें