बड़ी देर से टूटी नींद!

बहरहाल, ये पहल काबुल पर तालिबान के कब्जे के दो महीनों के बाद हुई है। इस दौरान कूटनीति काफी आगे बढ़ चुकी है। इसमें चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान की बढ़त साफ दिखती है।

इतिहास का न्याय अब

जब किसी समाज की चेतना जगती है, तो इतिहास से भी न्याय मांगता है। अब देखने की बात सिर्फ यह होती है कि वह न्याय किसी तरह से मांगता है।

भारत में बढ़ती भूख

संवेदनशील सरकार का पहला कदम इस सच को स्वीकार करना होता। लेकिन जब सच को स्वीकार करने के लिए सरकार तैयार नहीं है, तो फिर सुधार की अपेक्षा तो बेकार ही है।

वर्तमान की बलि भविष्य!

दुनिया के उन देशों ने भी जलवायु की दीर्घकालिक चिंता छोड़ दी है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के मसले पर संवेदनशील समझा जाता था। यूरोप को इस मामले में दुनिया में अग्रणी समझा जाता था।

बहस या सीधी चुनौती?

हालिया सूरत यह है कि दुनिया में लोकतंत्र और मानव अधिकारों की जो प्रचलित धारणा और कसौटियां हैं, उन पर भारत के रिकॉर्ड की आलोचना बढ़ती गई है।

बच्चे पढ़ें तो कैसे?

तो जाहिर है, शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए शिक्षकों के रोजगार की शर्तों और ग्रामीण इलाकों में काम करने की स्थिति में सुधार करने की अविलंब आवश्यकता है।

मुश्किलें और भी हैं…

डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया तीनों मच्छर से फैलने वाली बीमारी हैं। मौजूदा मौसम मच्छरों की ब्रीडिंग के लिए अनुकूल है।

श्वेत पत्र से हो शुरुआत

आज भी देश में बहुत से लोग, जो आम तौर पर सरकार समर्थक हैं, यह मानते हैं कि चीन को भारत मुंहतोड़ जवाब दे चुका है।

राहत की एक खबर

तमिलनाडु दूसरा राज्य बना है, जो कानूनन रिटेल स्टोर और दुकानों में कर्मचारियों को “बैठने का अधिकार” देता है।

ऊर्जा संकट की चपेट में

भारत में आज भी लगभग 55 फीसदी बिजली कोयले से बनती है। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ने के असर भी भारत अछूता नहीं है।

बनारस रैली के बाद

जो स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया देखने को मिली, उसे भाजपा विरोधियों ने इसका संकेत समझा है कि जनता में मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी है।

वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

ये अफसोसनाक है कि मलेरिया आज तक एक जानलेवा बीमारी बना हुआ है। यह मादा एनाफेलीज मच्छर के काटने से होता है। अब तक इससे बचाव के लिए मच्छर मारने वाले स्प्रे या मच्छरदानी लगाने जैसे उपाय किए जाते रहे हैं।

जायज सवाल बनाम हकीकत

प्रधान न्यायाधीश ने एक तरह से देश के विवेकशील लोगों के मन में घुमड़ रहे प्रश्न को आवाज दी, जब उन्होंने आशीष मिश्रा के प्रति पुलिस की नरमी का जिक्र किया।

पहल और राह के रोड़े

ये प्रस्ताव पारित शायद ही हो पाए। इसलिए कि ऐसा हुआ, तो सरकारों की एक बड़ी जवाबदेही पर्यावरण के मामले में भी बन जाएगी।

अमेरिका- चीन में सुलह!

विश्लेषकों की राय रही है कि अमेरिका और चीन के बीच सचमुच सैनिक टकराव हुआ, तो वह ताइवान के सवाल पर ही होगा।

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