हमेशा ऐसा ही रहेगा, जब दुनिया विकास के पथ पर नए मुकाम हासिल करेगी, लेकिन लोग यही कहते सुने जाएंगे कि चीजें पहले बहुत अच्छी थीं। एक ताजा अध्ययन से भी इसी बात की पुष्टि हुई है। लोग मान रहे हैं कि नैतिकता का पतन हो रहा है।
तकरीबन तीन दशक पहले निराशावाद पर एक किताब आई थी। उसमें कहा गया था कि दुनिया में हमेशा ऐसा रहेगा, जब दुनिया विकास के पथ पर नए मुकाम हासिल करेगी, लेकिन लोग यही कहते सुने जाएंगे कि चीजें पहले बहुत अच्छी थीं। एक ताजा अध्ययन से सामने आए निष्कर्ष ने उस किताब की याद ताजा कर दी है। आज अधिकांश लोग यही मान कर चल रहे हैं कि मनुष्य में दया, दूसरे के लिए सम्मान का भाव, और ईमानदारी जैसे गुण खत्म होते जा रहे हैँ। बहरहाल, मनोवैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि ऐसी राय सिर्फ एक स्वभावगत भ्रम है। नए अध्ययन की रिपोर्ट मशहूर पत्रिका नेचर के ताजा अंक में प्रकाशित हुई है। अध्ययन 60 देशों में हुए एक सर्वेक्षण पर आधारित है। इस सर्वे के दौरान ज्यादातर लोगों ने यही राय जताई कि बीते छह-सात दशकों में नैतिकता में भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन अमेरिका के कोलंबिया बिजनेस स्कूल में अनुसंधानकर्ता एडम मैस्त्रियानी के नेतृत्व में हुआ।
इस दौरान लोगों से एक सवाल यह पूरा गया कि उनकी राय में 2020, 2010 और साल 2000 में कौन सा ऐसा वक्त था, जब स्थितियां बेहतर थीं। दौरान आम राय उभरी की अब दया की भावना और नैतिकता में गिरावट आई है। ऐसी राय हाई स्कूल में पढ़ रहे छात्रों से लेकर उनके माता-पिता की पीढी तक ने जताई। लिबरल से लेकर कंजरवेटिव दोनों तरह के व्यक्तियों को इस मामले में एकमत पाया गया। मगर खुद इसी अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि दशकों पहले हुए सर्वेक्षणों में भी लोगों ने ऐसी ही राय जताई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि नैतिक पतन की बात एक भ्रम है। दरअसल, ऐसे कई संभव कारण हो सकते हैं, जिनकी वजह ऐसा भ्रम पैदा होता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक इनसान का स्वभाव ऐसा है, जिसमें वह नकारात्मक सूचनाओं पर अधिक ध्यान देता है। इसके अलावा देखा गया है कि मनुष्य की बुरी यादें अच्छी यादों की तुलना जल्दी भूल जाती हैं। ऐसे में अक्सर यह महसूस होता है कि पहले स्थितियां बेहतर थीं। यानी मनुष्य का यही स्वाभाव ऐसे भ्रम का कारण बनता है।
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