ताजा सामने आए कुछ आंकड़े मुमकिन है, देश में कम लोगों तक ही पहुंच पाएं। लेकिन जिनकी नजर उन पर है, वे अवश्य ही एक बार फिर देश की असली हकीकत और डेमोग्राफिक डिविडेंड जैसी बातों से आगाह होंगे।
चीन के साथ पश्चिम के बढ़ते टकराव के साथ ही पश्चिमी मीडिया ने भारत के आर्थिक विकास के मामले में अगला हॉट स्पॉट होने का गुब्बारा खूब फुला रखा है। भारत सरकार के लिए तो यह एक उपहार की तरह है, जिसकी चुनावी रणनीति में हेडलाइन मैनेज करना और उनके जरिए सकारात्मक धारणाएं बनाना सर्वोपरि महत्त्व का बना रहा है। चूंकि सरकार और पश्चिमी मीडिया एक जैसी बातें कहते सुने जाते हैं, तो इसमें कोई हैरत नहीं है कि भारतीय जनमत का एक बड़ा हिस्सा सचमुच इस कहानी में यकीन कर रहा है। अमेरिका में पढ़ाने वाले भारतीय प्रोफेसरों अरविंद सुब्रह्मण्यम और अशोक मोदी ने हाल में अपने शोधपत्र और किताब से भारत के लोगों को हकीकत का अहसास कराने की कोशिश है, लेकिन उनकी तथ्यपरक बातें कम ही लोगों तक पहुंच पाई हैँ। इस माहौल में ताजा सामने आए कुछ आंकड़े भी कम लोगों तक ही पहुंच पाएंगे, लेकिन जिनकी नजर उन पर है, वे अवश्य ही एक बार फिर देश की असली हकीकत पर गौर करेंगे।
एक आंकड़ा तो राष्ट्रीय सैंपल सर्वे 2020-21 से सामने आया है, जो डिजिटल इंडिया की असलियत से हमें वाकिफ कराता है। इसके मुताबिक भारत में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में सिर्फ 41 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो इंटरनेट पर किसी फाइल या फोल्डर को कॉपी या उसे मूव करने में सक्षम हैँ। अटैचमेंट कर ई-मेल भेजने की क्षमता इस उम्र वर्ग में सिर्फ 26.7 प्रतिशत लोगों में है। बाकी स्किल से लैस युवा वर्ग की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है। जबकि यही उम्र वर्ग है, जिसके आधार पर भारत को अपनी जनसंख्या का लाभ मिलने का कथानक बुना गया है। और जब यह हाल है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि चीन से पश्चिमी कंपनियों के बाहर जाने का लाभ उठाने में भारत पिछड़ा हुआ है। इंडियन सेलुलर इलेक्ट्रॉनिक एसोसिएशन ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि 2018 से 2022 से बीच चीन से अमेरिका के लिए निर्यात में 29 बिलियन डॉलर की कमी आई। लेकिन मुख्य लाभ वियतनाम, मेक्सिको, मलेशिया और ताइवान ने उठाया। क्या ये दोनों आंकड़े एक-दूसरे से संबंधित नहीं हैं?
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