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सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता का सवाल

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर के आंकड़ों को लेकर शुरू हुई बहस समाप्त नहीं हो रही है। इन आंकड़ों पर सवाल उठाने वालों के लिए ही असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नाराज फूफा’ वाला जुमला गढ़ा। उन्होंने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स यानी एसआरसीसी में पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर ‘जेन जी’ को संबोधित करते हुए यह जुमला पहली बार बोला। उसके बाद आठ सितंबर को वडोदरा में भी ‘जेन जी’ के बीच यह जुमला दोहराया। वडोदरा में प्रधानमंत्री भारतीय रेलवे के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उद्घाटन किया।

इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस फ्रेट कॉरिडोर के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में सोचा गया था लेकिन कांग्रेस पार्टी की फाइल अटकाने की प्रवृत्ति के चलते इस प्रोजेक्ट में देरी हुई। रेल मंत्री और प्रधानमंत्री दोनों ने विस्तार से इस बारे में बात की, जिसके बाद टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में इस पर खूब चर्चा हुई कि कैसे 2004 से लेकर 2014 के बीच सिर्फ एक किलोमीटर का फ्रेट कॉरिडोर बना और अब कैसे प्रधानमंत्री ने करीब डेढ़ हजार किलोमीटर की वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उद्घाटन भी कर दिया। ‘स्पीड’ और ‘स्केल’ के लिए मोदी सरकार की खूब वाहवाही भी हुई।

यही से इस बात को समझने की जरुरत है कि सरकार के आंकड़ों पर क्यों सवाल उठते हैं और क्यों लोगों का आंकड़ों पर भरोसा नहीं बनता है। इसे समझाने की और भी कई मिसालें हैं लेकिन चूंकि ‘नाराज फूफा’ का जुमला गढ़े जाने के बाद पहला मौका वडोदरा के रेलवे के कार्यक्रम का है तो उसी के बहाने प्रधानमंत्री और रेल मंत्री की कही बातों और टेलीविजन चैनलों में चल रही बहस की चर्चा हो सकती है। यह हकीकत है कि 10वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान यानी 2002-2007 के बीच डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी माल ढुलाई के लिए अलग रेल लाइन बनाने की परियोजना के बारे में सोचा गया।

2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी तो डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए स्पेशल पर्पस व्हीकल बनाने से लेकर रेलवे के पीएसयू राइट्स को इसकी परियोजना रिपोर्ट बनाने और व्यावहारिकता का अध्ययन करने को कहा गया। उसके बाद कर्ज के लिए जापान और विश्व बैंक दोनों से संपर्क किया गया।

इस प्रक्रिया में बहुत समय लगा। 11वीं पंचवर्षीय योजना यानी 2007-12 के बीच काम आगे बढ़ा। जापान ने 2008 में और विश्व बैंक ने 2011 में कर्ज की मंजूरी दी, जिसके बाद काम शुरू हुआ। ध्यान रहे जब भी कोई नया काम शुरू होता है तो उसमें समय लगता है, ऐसा नहीं है कि यह बात प्रधानमंत्री को पता नहीं है। डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट से लेकर फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने और कर्ज के इंतजाम से लेकर जमीन अधिग्रहण तक के काम में बहुत समय लगता है। उसके बाद का काम आसान होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मौजूदा रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव दोनों अपने निजी अनुभव से इस बात को जान रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही बुलेट ट्रेन की घोषणा की थी। अहमदाबाद से मुंबई को जोड़ने वाली पहली लाइन के निर्माण का शिलान्यास सितंबर 2017 में हुआ था। लेकिन अभी तक बुलेट ट्रेन का परिचालन शुरू नहीं हुआ है। यह भारत की वास्तविकता है, जहां किसी भी नई परियोजना के शुरू होने और अंजाम तक पहुंचने में बहुत समय लगता है। जैसा कि अश्विनी वैष्णव कह रहे हैं कि 2027 में बुलेट ट्रेन का पहला चरण शुरू हो जाएगा, अगर ऐसा हो भी जाता है तो परियोजना के बारे में सोचने से लेकर उसके शुरू होने तक में 10 साल से ज्यादा का समय लगेगा। लेकिन वही कह रही है कि जब डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के बारे में 2004 में सोचा गया तो 2014 तक उसे शुरू क्यों नहीं कर दिया गया!

यह जो एप्रोच है उसी वजह से सरकार के आंकड़ों, उसके दावों और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। सरकार के आंकड़े अधूरे होते हैं और दावों में कई बातें छिपा दी जाती हैं। जैसे सरकार ने कोरोना महामारी के समय पहले इसकी गंभीरता छिपाई। फिर अचानक पूरा देश बंद कर दिया और जब इसकी भयावहता बढ़ी तो मौतों से लेकर अंतिम संस्कार और दवाओं से लेकर ऑक्सीजन की उपलब्धता तक के उलटे सीधे दावे किए गए। लोग जो अपनी आंखों से देख रहे थे, सरकार का दावा उसके उलट था। ऐसे ही नवंबर 2016 में मोदी सरकार ने नोटबंदी की। देश की कुल मुद्रा में पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों की संख्या 86 फीसदी थी। उन्हें पूरी तरह से चलन से बाहर कर दिया गया।

पूरे देश में कारोबार ठप्प हो गया लेकिन सरकार ने दावा किया कि वित्त वर्ष 2016-17 में देश की आर्थिक विकास दर 8.2 फीसदी रही है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने आंकड़ों की विश्वसनीयता पर लिखे अपने लेख में इसका जिक्र किया है। उन्होंने यह भी बताया है कि कैसे सरकार ने 2017 में कंजम्पशन सर्वे यानी उपभोक्ता का सर्वेक्षण रोक दिया। सोचें, भारत उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है। उसके आंक़डों के बगैर आर्थिकी की वास्तविक तस्वीर कैसे सामने आएगी! सुब्रमण्यम ने इसका भी जिक्र किया कि खुले में शौच से मुक्ति का झूठा दावा किया गया। यह बात बिल्कुल सही है। एक दिन अचानक सरकार ने ऐलान कर दिया कि देश में खुले में शौच से मुक्त हो गया। इसमें संदेह नहीं है कि बड़ी संख्या में शौचालय बने हैं लेकिन यह भी वास्तविकता है कि देश खुले में शौच से मुक्त नहीं हुआ है।

इस तरह के अनेक दावों और घोषणाओं के बरक्स जमीनी सचाई में जो अंतर है उसने लोगों के मन में अविश्वास बढ़ाया है। सरकार की बड़ी बड़ी घोषणाओं, बड़े बड़े दावों और सब कुछ हमने किया का हुंकारा भरने से लोगों में अविश्वास बढ़ा है। पहले वे सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करते थे, भले बाद में उसकी सत्यता की जांच करें। लेकिन अब इसका उलटा होता है। अब लोग अविश्वास करते हैं और चाहते हैं कि सरकार अपने दावे को प्रमाणित करे। इस बदलाव को सुब्रमण्यम ने ‘ट्रस्ट बट वेरिफाई’ से ‘डाउट बट रिमेन ओपन’ के रूपक से परिभाषित किया है। यह बड़ा बदलाव है।

असल में लोग अपने जीवन में जिस चीज को महसूस नहीं कर रहे हैं उसकी घोषणा न सिर्फ अविश्वास बढ़ा रही है, बल्कि उनके मन में गुस्सा भी पैदा कर रही है। हवाई चप्पल वाला भी हवाई जहाज में चलेगा, यह घोषणा अब सिर्फ मजाक नहीं है, बल्कि लोगों की नाराजगी का कारण है। ट्रेनों की संख्या हो या रोजगार और शिक्षा का मामला हो या दुनिया में डंका बजने का दावा हो, वास्तविकता बिल्कुल अलग है। इसलिए सरकार के दावों, घोषणाओं व आंकड़ों पर लोगों का विश्वास कम हो रहा है। जीडीपी की विकास दर का मौजूदा आंकड़ा भले गलत नहीं हो लेकिन सरकार की घोषणाओं पर विश्वास इतना कम हो गया है कि जैसे ही किसी ने आंकड़ों पर सवाल उठाया वैसे ही लोगों के मन में अविश्वास पैदा हो गया। सो, इस पर सवाल उठाने वालों को ‘नाराज फूफा’ कहने से बात नहीं बनेगी, बल्कि विश्वसनीयता बनानी होगी, जो लंबी और दुरुह प्रक्रिया है।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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