देश में जनगणना का दूसरा चरण शुरू हो गया है। पहले चरण में मकानों की गिनती के बाद अब नागरिकों की गिनती हो रही है। इसकी शुरुआत लद्दाख से हुई है। अभी स्वगणना का दौर चल रहा है और एक सितंबर से सरकारी कर्मचारी लद्दाख के हर घर में जाएंगे। देश के बाकी हिस्सों में नागरिकों की गिनती का काम अगले साल होगा। सरकार ने एक मार्च की आधी रात का समय संदर्भ तिथि के तौर पर तय किया है। उस दिन तक जिन लोगों का जन्म होगा उनकी गिनती होगी। लद्दाख में गिनती शुरू होने के साथ ही एक नए इतिहास की शुरुआत हुई। लद्दाख पहला क्षेत्र बना, जहां 1931 के बाद पहली बार जातियों की गिनती शुरू हुई है। आखिरी बार 1931 में अंग्रेजी राज में जाति जनगणना हुई थी। उसी के आंकड़े के आधार पर आज भी जातियों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है। आजाद भारत में पहली बार जाति जनगणना हो रही है और शुरुआत लद्दाख से हुई है।
सो, कायदे से इसका बहुत प्रचार होना चाहिए था। हर छोटी बड़ी चीज को इवेंट में बदलने वाली भाजपा ने इसको अनदेखा कर दिया। कहीं भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जिनके मंत्रालय में जनगणना का विभाग आता है, ने इसका श्रेय नहीं लिया। चुपचाप जातियों की गिनती शुरू हो गई। तभी इस प्रक्रिया को लेकर संदेह शुरू हुआ। जिस तरह से जाति जनगणना का प्रपत्र बना है उसमें सरकार जातियों की तय सूची नागरिकों को नहीं उपलब्ध करा रही है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़ कर बाकी नागरिकों पर छोड़ा गया है कि वे अपनी जाति बताएं। उनकी बताई जाति को ही जनगणना प्रपत्र में दर्ज किया जा रहा है। कांग्रेस ने इसे लेकर गंभीर सवाल उठाया है।
असल में इसे लेकर भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के बीच काफी समय से माथापच्ची चल रही थी। भाजपा और संघ दोनों को अंदाजा हो गया था कि जाति जनगणना व्यापक हिंदू एकता बनाने बनाए रखने में बाधा बन सकती है। संख्या सामने आने के बाद जातियां अपनी पहचान को लेकर ज्यादा मुखर होंगी और उससे राजनीतिक भागीदारी व सत्ता में हिस्सेदारी का संघर्ष और सघन होगा। समानता के नाम पर लाए गए यूजीसी के दिशानिर्देशों का नुकसान भाजपा और संघ दोनों को महसूस हो रहा था। यह भी दिख रहा था कि किस तरह से भाजपा और संघ का सबसे बड़ा समर्थक समूह यूजीसी के बहाने आरक्षण हटाओ का अभियान चला रहा है।
एक तरफ आरक्षण बढ़ाने की मुहिम है तो दूसरी ओऱ आरक्षण हटाने की सीधी मांग है। आरक्षण हटाने की मांग करने वाला वर्ग भाजपा का पुराना और सबसे मजबूत समर्थक वर्ग है। इसके अलावा ‘जेन जी’ आंदोलन ने भी दिखाया है कि छात्रों और युवाओं को पुरानी पहचान के साथ बांधे रखना संभव नहीं होगा। उनके लिए विचारधारा और दूसरी किसी तरह की प्रतिबद्धता से पहले अपना हित आता है। तभी इस सवाल पर विचार हुआ कि क्या जाति जनगणना उनके हितों को पूरा करेगी? चूंकि अनुसूचित जाति और जनजाति की गिनती पहले से होती रही है। इसलिए उनकी जाति का नाम शामिल करने में कोई समस्या नहीं थी। परंतु पिछड़ा और सामान्य वर्ग की जातियों को दर्ज करने का काम नागरिकों के ऊपर ही छोड़ा गया है।
सरकार को अंदाजा था कि जाति गणना भाजपा की राजनीतिक संभावना को कमजोर कर सकती है। परंतु मुश्किल यह थी कि सरकार जाति जनगणना की घोषणा कर चुकी थी और उसकी घोषणा से पहले बिहार, कर्नाटक व तेलंगाना में जाति गणना हो गई है। अगर भाजपा की केंद्र सरकार इससे पीछे हटती तो उसे कांग्रेस की ओर से होने वाले बड़े हमले का सामना करना पड़ता और तब यह आरोप भी लगता कि उसने बहुजनों के हित का ध्यान नहीं रखा। ध्यान रहे इस समय किसी भी प्रादेशिक नेता के मुकाबले राहुल गांधी बहुजन हितों के बड़े चैंपियन है। यह बात भाजपा को परेशान कर रही है। तभी उसे ऐसा रास्ता निकालना था, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सो, उसने जाति जनगणना में जातियों की सूची उपलब्ध नहीं कराने का फैसला किया।
असल में सरकार के सामने दो विकल्प थे। पहला विकल्प वह था, जो बिहार सरकार ने जाति गणना में अपनाया था। उसमें बिहार की सभी जातियों की सूची नागरिकों के सामने रखी गई थी और उसमें से चुन कर उनको अपनी जाति बतानी होती थी। बिहार में कुल सवा तीन सौ से कुछ ज्यादा जातियां हैं, जिनकी सूची उपलब्ध कराई गई। अगर सचमुच सरकार गंभीर होती तो बिहार की तरह ही हर राज्य की जाति की सूची नागरिकों के सामने उपलब्ध कराई जाती और लोगों से उसमें से जाति चुनने को कहा जाता। अगर कोई कहता कि उसकी जाति का नाम सूची में नहीं है तो उसके लिए अन्य की एक अलग श्रेणी बनाई जा सकती थी।
दूसरा विकल्प यह था कि जातियों की सूची नहीं दी जाए और नागरिकों को खुद ही जाति बताने को कहा जाए। इस तरीके से 2011 की जनगणना के समय तत्कालीन यूपीए सरकार ने जातीय व सामाजिक गणना कराई थी। इसमें से सरकार ने पहला और ज्यादा वैज्ञानिक विकल्प नहीं चुना। उसने दूसरा विकल्प चुना। सरकार ने नागरिकों पर छोड़ दिया कि वह जाति बताए।
इस तरह 2011 में जो जातीय व सामाजिक गणना हुई थी उसका क्या हस्र हुआ वह सबको पता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय नागरिकों ने 46 लाख के करीब जातियां दर्ज करा दीं। भारत में कुल तीन हजार के करीब जातियां हैं। लेकिन लोगों ने जाति, उपजाति और गोत्र आदि के नाम भी दर्ज करा दिए। इसलिए पूरी कवायद ही बेकार हो गई। अब एक बार फिर इसी तरीके से जातीय जनगणना हो रही है। इसका हस्र भी वैसा ही होगा। इससे धारणा के स्तर पर यह स्थापित हो जाएगा कि सरकार ने जातीय जनगणना कराई, लेकिन असल में उससे कुछ भी हासिल नहीं होगा। बताया जा रहा है कि जातियों की सूची जारी करके जनगणना नहीं कराने का फैसला इस तर्क के आधार पर किया गया कि यह अंग्रेजों को फॉलो करने जैसा हो जाएगा।
असल में अंग्रेजों ने जातियों की सूची बनाई थी और मोटे तौर पर वही सूची अभी तक चल रही है। अंग्रेज जाति की गणना उस सूची के आधार पर कराते थे। आजाद भारत की सरकार वैसे क्यों गिनती कराए, यह मैसेज बनाने के लिए दूसरा तरीका अपनाया गया। लेकिन वह तरीका चालाकी से पूरे मामले को भटका देने वाला साबित होगा।
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