जीडीपी 8.4 फीसदी की दर से बढ़ी

केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के बीच सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास के आंकड़े जारी कर दिए हैं।

दुनिया के सबसे अमीर आदमी एलोन मस्क पाकिस्तान की पूरी जीडीपी से भी ज्यादा दौलतमंद, यह मुकाम हासिल करने वाले पहले व्यक्ति बने

$300 बिलियन की कुल संपत्ति को छूने के करीब है जिससे वह ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति बन गए हैं। फिलहाल उनकी कुल संपत्ति 292 अरब डॉलर है।

सुधार के लिए अभी इंतजार करना होगा!

पहली नजर में 20.1 फीसदी की विकास दर का आंकड़ा बहुत बड़ा लगेगा लेकिन सबको पता है कि यह लो बेस इफेक्ट है। पिछले साल इसी तिमाही में विकास दर माइनस 24.4 फीसदी रही थी।

अब आंकड़ें बोलते रहें!

वी शेप रिकवरी का मतलब होता है कि अर्थव्यवस्था जहां से गिरी थी, तेजी से वापस वहीं पहुंच गई है। क्या खुद सरकार के अपने आंकड़ें ऐसा बताते हैं?

ताकि ध्यान सच पर रहे

अगर 23.7 फीसदी की भी विकास दर हासिल हो, तो उसका मतलब होगा कि अर्थव्यवस्था उस जगह पर पहुंचेगी, जहां उसे 30 जून 2020 को होना चाहिए था।

मोदी जी ‘मेक इन इंडिया’का शेर तो हो गया ढेर, नारा नहीं काम दीजिए…

प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े जोर शोर से मेक इन इंडिया का नारा दिया था. लेकिन यह नारा ढेर होता हुआ दिखाई दे रहा है. भारत में लोगों को कृषि के बाद सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाला सेक्टर टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज है.

महंगाई का आंकड़ा दायरे से बाहर

नई दिल्ली। जून के महीने में भी खुदरा महंगाई का आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से तय किए गए दायरे से ऊपर रहा ( Inflation out of range ) । राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, एनएसओ की ओर से जारी आंकड़े के मुताबिक जून महीने में खुदरा महंगाई की दर 6.26 फीसदी रही। भारतीय रिजर्व बैंक ने चार फीसदी का दायरा तय किया है और दो फीसदी का मार्जिन रखा है। खुदरा महंगाई की दर चार फीसदी और दो फीसदी के मार्जिन से ऊपर रही। Corona: तीसरी लहर बेहद करीब, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की चेतावनी पिछले महीने यानी मई में खुदरा महंगाई की दर 6.30 फीसदी थी। इस लिहाज से 0.04 फीसदी की मामूली कमी इसमें हुई है लेकिन उससे आमलोगों को कोई खास राहत नहीं मिलेगी। एनएसओ के आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई की दर में सबसे ज्यादा हिस्सा खाने-पीने की चीजों का है। जून के महीने में खाने-पीने की चीजें मई के मुकाबले ज्यादा महंगी हुईं। खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ने का कारण पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में हुई बढ़ोतरी है। एनएसओ की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर जून में 5.15 फीसदी रही, जो मई में… Continue reading महंगाई का आंकड़ा दायरे से बाहर

वित्त मंत्री के दावे और हकीकत

दुनिया की सभी सरकारों का अपने कामकाज, पिछली सरकारों के कामकाज और विपक्ष के प्रति व्यवहार लगभग एक जैसा होता है। जैसे दुनिया की सभी सरकारें अपने बुरे कामों और गलत फैसलों को भी अच्छा कहती हैं। इसी तरह दुनिया की सभी सरकारें अपनी तुलना पिछली सरकारों के काम से करती हैं और अपने काम को बेहतर बताती हैं। दुनिया की सभी सरकारें कमियों का ठीकरा पहले की सरकारों पर फोड़ती हैं और उसके अच्छे कामों का श्रेय लेती हैं। दुनिया की सभी सरकारें विपक्ष को गैर जिम्मेदार बताती हैं, चाहे विपक्ष वहीं काम क्यों न कर रहा हो, जो सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष में रहते हुए किया हो। ये सब यूनिवर्सल नियम हैं और भारत की मौजूदा सरकार भी अपवाद नहीं है। फर्क सिर्फ डिग्री का है। मौजूदा सरकार ये सारे काम बहुत ज्यादा बड़े पैमाने पर कर रही है या ऐसे भी कह सकते हैं कि सिर्फ ये ही काम कर रही है। प्रधानमंत्री के भाषणों, मंत्रियों की प्रेस कांफ्रेंस और पार्टी प्रवक्ताओं की टेलीविजन बहसों को देख कर इसे समझा जा सकता है। यह भी पढ़ें: अदालते है लोकतंत्र का दीया! यह भी पढ़ें: भारत भी तो कुछ कहे चीन को! वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक… Continue reading वित्त मंत्री के दावे और हकीकत

महंगाई की मारः नाक में दम

यह संतोष का विषय है कि देश में आई कोरोना की दूसरी लहर अब लौटती हुई दिखाई पड़ रही है। लोग आशावान हो रहे हैं कि हताहतों की संख्या कम होती जा रही है और अपने बंद काम-धंधों को लोग फिर शुरु कर रहे हैं। लेकिन मंहगाई की मार ने आम जनता की नाक में दम कर दिया है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक थोक मंहगाई दर 12.94 प्रतिशत हो गई है। सरल भाषा में कहें तो यों कहेगे कि जो चीज़ एक हजार रु. में मिलती थी, वह अब 1294 रु. में मिलेगी। ऐसा नहीं है कि हर चीज के दाम इतने बढ़े हैं। किसी के कम और किसी के ज्यादा बढ़ते हैं। जैसे सब्जियों के दाम यदि 10 प्रतिशत बढ़ते है तो पेट्रोल के दाम 35 प्रतिशत बढ़ गए। याने कुल मिलाकर सभी चीजों के औसत दाम बढ़ गए हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मंहगाई की यह छलांग पिछले 30 साल की सबसे ऊँची छलांग है। यह भी पढ़ें: क्या कांग्रेस पाकिस्तानपरस्त? यहां तकलीफ की बात यह नहीं है कि मंहगाई बढ़ गई है बल्कि यह है कि लोगों की आमदनी घट गई है। जिस अनुपात में मंहगाई बढ़ती है, यदि उसी अनुपात में आमदनी भी… Continue reading महंगाई की मारः नाक में दम

टूटती उम्मीदों की कथा

भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने डगमग अर्थव्यवस्था को एक तरह से अंधकार में धकेल दिया है। बैंको से निजी कर्ज लेने वालों, क्रेडिट कार्ड से कर्ज लेने वालों और प्राइवेट कंपनियों से गोल्ड लोन लेने वालों के डिफॉल्ट में पिछले महीने हुई बढ़ोतरी बढ़ती जा रही तबाही का संकेत देती है। रोजमर्रा के उपयोग की चीजें का बाजार जिस तरह अप्रैल और मई में ढहा है, उसका भी यही संकेत है कि भारत दुर्दशा अकथनीय रूप लेती जा रही है। दरअसल, ऐसी कहानी दुनिया भर में देखने को मिल रही है। इसलिए फिलहाल ऐसी भी कोई उम्मीद नहीं है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की मजबूती भारत को संभाल लेगी। मसलन, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ताजा रिपोर्ट गौरतलब है। उसमे बताया गया है कि वैश्विक संकट के कारण 2022 तक बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 20 करोड़ 50 लाख हो जाएगी। गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी होने के साथ-साथ विषमता भी बढ़ेगी। आईएलओ का कहना है कि रोजगार के अवसरों में होने वाली बढ़ोतरी साल 2023 तक इस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगी। ये सूरत तब की है, जब अभी पता नहीं है कि कोरोना महामारी के अभी आगे और कितने दौर आएंगे। हर दौर नई समस्याएं पैदा… Continue reading टूटती उम्मीदों की कथा

आर्थिकी भी खलास!

हिसाब से आर्थिकी की बरबादी को नंबर एक पर मानना चाहिए। पर मैं अशिक्षा, अज्ञानता को इसलिए अधिक घातक-गंभीर समझता हू क्योंकि यदि भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हम-आप से लेकर आम नागरिक सभी) अशिक्षा-अज्ञान के वायरस में जकड़ गए तो आर्थिकी के सकंटों का आगे निदान ही संभव नहीं। महामारी के आगे हम लावारिस इसलिए मर रहे हैं और आगे भी मरेंगे क्योंकि अशिक्षा-अज्ञान-अंधविश्वासों में सदियों से जकड़े हुए हैं। यह भी पढ़ें: सब खलास, शिक्षा सर्वाधिक! गुजरे सप्ताह भारत की बरबादी में सन् 2020-21 की विकास दर में 7.3 प्रतिशत की गिरावट की खबर आईसबर्ग का महज ऊपरी हिस्सा था। पानी के नीचे समुद्र में 140 करोड़ लोगों का जीवन बरबादी की उन जंजीरों में जकड़ा है, जो महामारी के बाद भी जस की तस रहेगी। महामारी और कोरोना वायरस न इस साल जाने वाला है और न अगले साल। हम लोगों के चलते कोविड-19 भारत में पंचवर्षीय योजना लिए हुए हो सकता है। ध्यान रहे आर्थिकी की बरबादी नोटबंदी के बाद से है। वायरस आया तो उसने महामागर में गहरे धकेला है। इससे भारत को बाहर निकालना अब मोदी सरकार के बस की बात नहीं है। क्यों? पहली बात चंद अमीरों और सरकारी नौकरीधारियों (हाकिमों) को छोड़ कर… Continue reading आर्थिकी भी खलास!

अब रास्ता किधर है?

इसके बाद दूरगामी योजना बनानी चाहिए। अगर फिर से आज जैसी मुसीबत को दोहराए जाने से रोकना है तो इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है कि भारत को अपनी जीडीपी का 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश करे। साथ ही स्वस्थ्य प्रणाली को विकेंद्रित करना जरूरी है। ( coronavirus) आजादी के बाद महामारियों से निपटने में भारत का रिकॉर्ड बेहतर रहा है। कोरोना महामारी आने के पहले अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इस बारे में एक चर्चा में कहा था कि जब एड्स आया, तो कहा गया था कि इसकी सबसे ज्यादा मार भारत पर पड़ेगी। लेकिन एहतियाती कदम उठाकर ऐसा होने से रोक दिया गया। आज भी ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में सिलसिलेवार तरीके से और राष्ट्रीय स्तर पर योजना बना कर वायरस के प्रसार को नियंत्रित किया जा सकता है। उनके मुताबिक आज भारत की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक सही संवाद की कमी है। ऐसा संवाद जो सच पर आधारित हो और जिसमें लोगों को गुमराह ना किया जाए। अब हम जहां पहुंच गए हैं, वहां तुरंत सरकारों को राजनीतिक रैलियों और धार्मिक समारोहों सहित शादियों और सामूहिक समारोहों में भाग लेने से हतोत्साहित करना चाहिए। लोगों को बताया जाना… Continue reading अब रास्ता किधर है?

मुश्किल है आगे की जिंदगी

अभी लोगों की एकमात्र चिंता जान बचाने की है। लेकिन अगर कोरोना वायरस से जिन लोगों की जान बच गई, उनके लिए भी आगे की जिंदगी बेहद मुश्किल होने वाली है। अर्थव्यवस्था की कमर पहले ही टूट चुकी थी। अब वह धराशायी होने के कगार पर है। कोरोना दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था की भी चूलें हिला दी हैं। हालत ये हो गई है कि कभी भविष्य की सुपरपावर कहे जाने वाले देश का अब निवेश ग्रेड अनिश्चित हो गया है। पिछले साल भारत की क्रेडिट रेटिंग्स में एक के बाद कई कटौतियां की गईं थीं, जिसके बाद ‘निवेश ग्रेड’ का उसका दर्जा बामुश्किल ही बचा हुआ है। खबरों के मुताबिक अप्रैल से जारी दूसरी कोविड लहर के बाद तो एसएंडपी, मूडीज और फिच जैसी एजेंसियां और भी ज्यादा चिंतित हैं। ये एजेंसियां भारत की भविष्य की विकास दर में या तो कटौती कर चुकी हैं या करने की चेतावनी दे चुकी हैं। ये पूर्वानुमान भी जाहिर किया गया है कि सरकार पर कर्ज इस साल जीडीपी का 90 फीसदी पहुंच सकता है, जो एक रिकॉर्ड होगा। जो देश फिच की बीबीबी श्रेणी में हैं, उन पर औसत कर्ज 55 फीसदी है। भारत भी अब तक इसी श्रेणी में ( corona-second-wave)… Continue reading मुश्किल है आगे की जिंदगी

अर्थव्यवस्था लौट रही है पटरी पर!

कोरोनाकाल में भारत की अर्थव्यवस्था किस प्रकार मजबूत होकर उभर रही है, इसका खुलासा संस्था- “वैश्विक आर्थिक सहयोग और विकास संगठन” (ओ.ई.सी.डी.) की रिपोर्ट ने भी किया है।

पॉजिटिव हुई देश की विकास दर

कोरोना वायरस की महामारी में लगातार दो तिमाही में निगेटिव रही भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर पॉजिटिव हो गई है।

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