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सेकुलर पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट

भारतीय जनता पार्टी की पारंपरिक विरोधी पार्टियों के सामने अस्तित्व का ऐतिहासिक संकट खड़ा हो गया है। आजादी के बाद कभी भी इस तरह की स्थिति नहीं बनी थी। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों सहित दूसरी प्रादेशिक पार्टियां पिछले कई बरसों से कमजोर होती जा रही हैं। इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो एक के बाद एक राज्य से प्रादेशिक पार्टियों का आधार कमजोर हो रहा है। लेकिन उनके सामने अस्तित्व का संकट लगातार मिल रही चुनावी हार के कारण नहीं आया है। इसके बीज देश की जनसंख्या व भौगोलिक संरचना में छिपे हैं।

आने वाले कुछ दिनों में होने वाला परिसीमन इस ऐतिहासिक संकट को और बड़ा कर देगा। फिर इस देश में भाजपा से मुकाबला करने वाली पारंपरिक पार्टियां समाप्त होंगी और भाजपा जिस तरह से बहुसंख्यक राजनीति कर रही है उसी तरह से अल्पसंख्यक राजनीति करने वाली पार्टियों का उदय होगा। यानी जैसे आजादी से पहले कांग्रेस के सामने मुस्लिम लीग खड़ी हुई थी उसी तरह मुस्लिम राजनीति करने वाली पार्टियां खड़ी होंगी। इस बात को समझने के लिए असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों को समझना होगा।

असम की 126 सदस्यों की विधानसभा में सत्तापक्ष यानी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 102 सीटें जीती हैं, जबकि 24 सीटें विपक्ष के खाते में गई हैं। इन 24 विधायकों में से 22 मुस्लिम विधायक हैं। कांग्रेस 19 सीटों पर जीती है, जिनमें से 18 मुस्लिम हैं। अखिल गोगोई की रायजोर दल दो सीटों पर जीती है, जिसमें एक मुस्लिम विधायक हैं। बदरूद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के दो विधायक हैं और दोनों मुस्लिम हैं, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के इकलौते विधायक भी मुस्लिम हैं।

यानी विधानसभा में जिस तरह विपक्ष बैठेगा उधर 24 में से 22 मुस्लिम चेहरे होंगे। दूसरी ओर सत्ता पक्ष की ओर एक भी मुस्लिम विधायक नहीं होगा। इस बार के चुनाव में भाजपा ने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। पिछली बार उसने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। भाजपा की सहयोगी असम गण परिषद ने इस बार भी कुछ मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे लेकिन कोई जीत नहीं पाया। उसके सभी 10 विधायक हिंदू हैं। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के भी सभी 10 विधायक हिंदू हैं। सो, विधानसभा में हिंदू सत्ता पक्ष के मुकाबले मुस्लिम विपक्ष होगा।

पश्चिम बंगाल की तस्वीर अभी असम से थोड़ी भिन्न है, लेकिन उसकी भी दिशा वैसी ही है, जैसी असम में दिख रही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी के 80 में से साढ़े 42 फीसदी यानी 33 विधाय़क मुस्लिम हैं। कांग्रेस के दो विधायक जीते हैं और दोनों मुस्लिम हैं। हुमायूं कबीर आम जनता उन्नयन पार्टी बना कर दो सीटों से लड़े थे और दोनों पर जीत दर्ज की है। इंडियन सेकुलर फ्रंट को एक सीट मिली है और उसके विधायक भी मुस्लिम हैं। दूसरी ओर भाजपा के सभी 206 विधायक हिंदू हैं। इसका अर्थ है कि विधानसभा में सत्ता पक्ष में सिर्फ हिंदू विधायक होंगे और विपक्ष में 87 विधायकों में करीब 38 विधायक मुस्लिम होंगे।

असम और पश्चिम बंगाल की स्थिति में थोड़ी भिन्नता इसलिए है क्योंकि अभी पश्चिम बंगाल में परिसीमन नहीं हुआ है। असम में 2023 के परिसीमन में विधानसभा सीटों की भौगोलिक और जनसंख्या संरचना इस तरह से बनाई गई कि जनजातीय प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए हिंदू बहुल क्षेत्रों में सीटें बढ़ा दी गईं। मुस्लिम बहुल इलाकों में जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित कर दी गईं। इतना ही नहीं कई सीटों की भौगोलिक संरचना को इस तरह से बदला गया कि कुछ सीटों पर मुस्लिम आबादी की सघनता बढ़ गई, जबकि बाकी सीटों पर उनका चुनावी महत्व कम हो गया।

एक अनुमान के मुताबिक परिसीमन से पहले करीब 40 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक होता था, जो अब 26 सीटों पर सिमट गया है। उन्हीं 26 सीटों में से 24 सीटें विपक्ष ने जीती हैं। इनमें विपक्ष की कोई च्वाइस नहीं रह गई है। अपने आप इन सीटों पर उन्हें मुस्लिम उम्मीदवार देने होंगे और मुस्लिम ही जीतेंगे। अगले कुछ दिन में पश्चिम बंगाल में भी परिसीमन होगा और वहां भी हिंदू बहुलता वाली सीटों की संख्या बढ़ेगी और मुसलमानों के निर्णायक प्रभाव वाली सीटों की संख्या कम होगी।

उसका असर यह होगा कि विपक्ष की सीटों की संख्या कम होगी और जीतने वाले चेहरे अनिवार्य रूप से मुस्लिम होंगे। हो सकता है कि पूरे देश में इस तरह की स्थिति बने और न अगर नहीं बने तब भी धारणा के स्तर पर पूरे देश में यह बात पहुंचेगी।

इस स्थिति का सीधा नुकसान कांग्रेस और दूसरी उन पार्टियों को होगा, जो पारंपरिक रूप से भाजपा की विरोधी हैं और जिनको मुस्लिम वोट देते रहे हैं। मुस्लिम उनको इसलिए वोट देते थे क्योंकि ये पार्टियां जाति या क्षेत्र के समीकरण के आधार पर कुछ हिंदू वोट हासिल करती थीं और भाजपा को हरा देती थीं। यह कोई बहुत उलझा हुआ गणित नहीं है और न उलझा हुआ सिद्धांत है। कांग्रेस या लेफ्ट या भाजपा विरोधी दूसरी प्रादेशिक पार्टियों को मुस्लिम वोट इसलिए मिलता था क्योंकि थोड़े से हिंदू वोट लेकर वे भाजपा को हराती थीं।

अगर पूरे देश में परिसीमन होता है और यह धारणा बनती है कि ये पार्टियां भाजपा को नहीं हरा पाएंगी क्योंकि इनको पर्याप्त हिंदू वोट नहीं मिल रहे हैं तो मुस्लिम मतदाता इनको वोट नहीं करेंगे। वे अपनी पार्टी और अपना नेता चुनेंगे। असम और बंगाल से इसकी शुरुआत हो सकती है। ध्यान रहे पिछले कुछ समय से मुसलमानों को प्रतिनिधित्व की बात प्रभावित कर रही है। उनको लग रहा है कि सेकुलर पार्टियां उनका प्रतिनिधित्व घटाती जा रही हैं और उनकी आवाज भी नहीं उठा रही हैं। असदुद्दीन ओवैसी, बदरूद्दीन अजमल, हुमायूं कबीर जैसे नेता इसका लाभ उठाना चाह रहे हैं। एक बार जब यह धारणा बनी कि सेकुलर पार्टियां सिर्फ मुस्लिम वोट के भरोसे हैं, तो फिर मुस्लिम मतदाता इन पार्टियों को छोड़ेंगे।

इसकी शुरुआत असम और पश्चिम बंगाल से हो सकती है। असम में कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम हैं। जब कांग्रेस निचले असम के मुस्लिम बहुल इलाकों के अलावा कहीं और जीतने में सक्षम नहीं रह जाएगी और भाजपा को नहीं रोक सकेगी तो मुस्लिम समुदाय कांग्रेस का साथ देने की बजाय अजमल और ओवैसी की पार्टी की ओर देखेगा। वहां कम से कम प्रतिनिधित्व बढ़ेगा और आवाज उठाने वाले अपने लोग होंगे। ध्यान रहे असम और बंगाल के चुनाव नतीजों के तुरंत बाद ओवैसी ने कहा भी कि मुस्लिम अवाम अपने नेताओं को आगे बढ़ाए। यह प्रक्रिया बस शुरू ही होने वाली है। इस चुनाव नतीजे के बाद बंगाल में भी यह धारणा स्थापित होगी। अगर परिसीमन हो जाता है तो तृणमूल कांग्रेस अभी जितनी सीटों पर जीती है उतनी भी नहीं जीत पाएगी। जब यह धारणा बन जाएगी कि ममता या कोई भी पारंपरिक पार्टी भाजपा को नहीं रोक पाएगी तो मुस्लिम आबादी अपनी पार्टी और अपने नेता की ओर देखेगी।

असम और बंगाल के बाद यह अखिल भारतीय परिघटना बनेगी। भाजपा को असम और जम्मू कश्मीर में परिसीमन से होने वाले फायदे का स्वाद मिल गया है। जम्मू कश्मीर में परिसीमन के बाद सात सीटें बढ़ीं, जिनमें एक सीट मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में बढ़ी थी और छह सीटें जम्मू में बढ़ी थीं। इन छह में से पांच सीटें कांग्रेस ने जीती है। इसी तरह असम में परिसीमन के बाद हुए पहले चुनाव में भाजपा ने अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा पार किया। उसने अकेले 82 सीटें जीती। इससे पहले दो चुनावों में वह 60 सीट पर अटक रही थी। उसके गठबंधन ने तीन चौथाई से ज्यादा सीटें जीती हैं।

बहरहाल, एक तरफ परिसीमन की प्रक्रिया चलेगी और दूसरी ओर राजनीतिक स्तर पर भाजपा ने मुसलमानों को बिल्कुल अलग थलग करने की राजनीति अपना ली है। भाजपा अब लोकसभा या किसी भी विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट नहीं दे रही है। उत्तर प्रदेश में खुल कर 80 और 20 का चुनाव बताया जाता है। भाजपा के प्रदेश के सर्वोच्च नेता यह बात कहते हैं कि उन्हें 20 फीसदी का वोट नहीं चाहिए। बंगाल में 70 और 30 का चुनाव कहा गया। जब केंद्र और देश के तीन चौथाई हिस्से पर शासन करने वाला दल इस तरह से मुस्लिम समुदाय को अलग करेगा और उनके मन में यह धारणा बनेगी कि भाजपा विरोधी पारंपरिक पार्टियां भाजपा को नहीं रोक पाएंगी तो वह इन पार्टियों का साथ क्यों देगा?

इससे इन पार्टियों का अस्तित्व समाप्त होगा। हो सकता है कि इसमें थोड़ा समय लगे लेकिन इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह प्रक्रिया देश के लिए भी एक बड़ा खतरा और एक बड़ी चुनौती पैदा कर रही है। आजादी से पहले मार्ले-मिंटो सुधार और मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम पर जिस तरह अलग मुस्लिम निर्वाचक मंडल को लागू किया गया था। वह स्थिति दूसरी तरह से देश में अपने आप बनती दिख रही है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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