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तेल के संकट की याद तो आई!

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तेल के संकट की याद आ गई। हालांकि ऐसा नहीं है कि उनको इसके बारे में पता नहीं था। देश में पेट्रोल, डीजल और गैस का संकट तो करीब ढाई महीने पहले ही शुरू हो गया था। लेकिन चूंकि उस समय चुनाव चल रहे थे। इसलिए उस समय लोगों को बताया नहीं जा सकता था। अब संकट के बारे में बताने का सही समय आ गया है। प्रधानमंत्री पहले भी जानते थे कि देश में तेल के कुएं नहीं हैं। लेकिन यह बात उन्होंने देश के लोगों को तब बताई जब पांच राज्यों के चुनाव समाप्त हो गए।

रविवार, 10 मई को जब वे कर्नाटक और तेलंगाना के दौरे पर थे तब उन्होंने हैदराबाद की अपनी सभा में कहा कि भारत के लोग किफायत से पेट्रोल, डीजल और गैस का इस्तेमाल करें क्योंकि भारत के पास तेल के बड़े बड़े कुएं नहीं हैं। ऐसा लग रहा है कि भारत के पास जो भंडार है उसमें भी कमी आ गई है। तभी यह बताने की जरुरत महसूस हुई है।

अगर पांच राज्यों में चुनाव नहीं चल रहे होते तो प्रधानमंत्री यह बात पहले ही बताते। लोगों को आगाह करते कि पड़ोस के देश में युद्ध चल रहा है और भारत पर इसका बड़ा असर हो सकता है। इसलिए लोग तेल सोच समझ कर खर्च करें। लेकिन उस समय तो पेट्रोल, डीजल और गैस के संकट को लेकर प्रधानमंत्री या उनकी सरकार के किसी मंत्री ने एक शब्द नहीं कहा। उलटे प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्रियों और अनेक राज्यों के मुख्यमंत्रियों के हवाई जहाज उड़ते रहे, जनसभाएं होती रहीं, रैलियां व रोड शो होते रहे। सवाल है कि क्या उनमें पेट्रोल, डीजल और गैस का खर्च नहीं हो रहा था? क्या थोड़ी रैलियां और रोड शो कम करके तेल नहीं बचाया जा सकता था?

बहरहाल, अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया। उसके दो हफ्ते बाद 16 मार्च को पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हुई। ईरान पर हमले के बाद एक मार्च से लेकर 10 मई तक एक बार भी सरकार की ओर से नहीं कहा गया कि तेल का संकट है। एक बार भी लोगों से अपील नहीं की गई कि वे संयम बरतें। हालांकि कई फैसले ऐसे हुए, जिससे लोग संयम बरतने को मजबूर हुए। जैसे कॉमर्शियल गैस की सप्लाई कम कर दी गई। कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत सीधे तीन हजार रुपए से ज्यादा कर दी गईं। विमानों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमत बढ़ा दी गई। विमानन कंपनियों के अधिकतम किराए पर लगी रोक को हटा लिया गया। सो, अपने आप लोग मजबूर हुए संयम बरतने के लिए।

लेकिन जैसे ही पांच राज्यों के चुनाव खत्म हुए और सरकारों का गठन शुरू हुआ वैसे ही तेल संकट की चेतावनी आ गई और लोगों को संयम बरतने की नसीहत दी गई। प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत विस्तार से इसके बारे में बताया। वे सिर्फ इतना कह कर नहीं रूक गए कि भारत के पास तेल के कुएं नहीं हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को निजी गाड़ियों का इस्तेमाल कम करना चाहिए। कारपूलिंग करनी चाहिए। जिस तरह कोरोना की महामारी के समय किया उस तरह से वर्क फ्रॉम होम अपनाना चाहिए। प्र

धानमंत्री ने किसानों से रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल कम करने और जैविक खाद की ओर यानी गोबर आदि की ओर लौटने को भी कहा। उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को विदेश यात्राएं स्थगित करनी चाहिए ताकि विदेशी मुद्रा की बचत हो। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से सोने की खरीद कम करने की सलाह भी दी।

सोचें, कितनी बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि लोग विदेश घूमने नहीं जाएं और सोना नहीं खरीदें! इसका अर्थ है कि तेल का संकट गहरा है। यह पहले भी था लेकिन पहले चूंकि चुनाव चल रहे थे और उसके बीच अगर लोगों को इस तरह की नसीहत दी जाती तो चुनाव का नैरेटिव बिगड़ सकता था। इसलिए उस समय लोगों से कहा गया कि कोई संकट नहीं है और प्रधानमंत्री मोदी ने सब कुछ काबू में कर लिया है। यह धारणा बनवाई गई कि दुनिया के देशों में संकट है लेकिन भारत में चूंकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं इसलिए कोई संकट नहीं है।

दूसरी ओर दुनिया के दूसरे सभ्य व लोकतांत्रिक देशों ने इस तरह के उपायों के बारे में अपने नागरिकों को युद्ध शुरू होते ही बता दिया था। कई देशों ने वर्क फ्रॉम होम शुरू कराया और तेल की खपत कम करने के दूसरे उपाए आजमाने शुरू किए। विमानों की उड़ानों में कटौती की गई। लोगों के वेतन, भत्ते आदि घटाए गए। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाई गईं। लेकिन भारत में विधानसभा चुनावों के खत्म होने का इंतजार किया गया। उसके बाद इस संकट के बारे में बताया गया।

अब प्रधानमंत्री ने जो कहा है उसके खतरे को समझने की जरुरत है। असल में दुनिया के किसी दूसरे देश के मुकाबले भारत के लिए चिंता ज्यादा है। भारत अपनी जरुरत का 85 फीसदी तेल आय़ात करता है। अपनी जरुरत का 60 फीसदी से ज्यादा गैस भी भारत आयात करता है। लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। युद्ध रूका हुआ है फिर भी होर्मुज की खाड़ी नहीं खुल रही है, जहां से भारत का 40 फीसदी तेल आता है। इसके अलावा खाड़ी के दूसरे देशों पर ईरान के हमले से तेल के कुओं को नुकसान हुआ तो तेल व गैस के संयंत्र भी नष्ट हुए हैं। इससे तेल के दाम बढ़े।

सो, अगर सब कुछ सामान्य हो जाए तब भी तेल की आपूर्ति बहाल होने और कच्चे तेल की कीमत युद्ध से पहले की स्थिति तक पहुंचने में बहुत समय लगेगा। इसका अर्थ है कि भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति कम रहेगी और कीमत ज्यादा देनी होगी। इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा जिसका असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा। भारत के साथ दूसरा संकट यह है कि देश में तेल व गैस के भंडारण की व्यवस्था भी बहुत अच्छी नहीं है। तभी घरेलू आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। इसका तेल व गैस पर आधारित दूसरे उद्योगों पर बहुत बड़ा असर हुआ है। हजारों की संख्या में फैक्टरियां बंद हुईं या उत्पादन कम हुआ है। इससे रोजगार के अवसर घटे हैं और मजदूरों का पलायन हुआ है।

दूसरी ओर दुनिया देशों का बाजार जिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आविष्कारों और नए उत्पादों के दम पर ऊपर जा रहा है उस क्षेत्र में भारत शून्य है। यही कारण है कि बाजार में भारत का वेटेज लगातार कम होता जा रहा है और ताइवान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों का वजन बढ़ रहा है। ताइवान की एक कंपनी की बाजार पूंजी शेयर बाजार में सूचीबद्ध भारत की सभी कंपनियों की सामूहिक पूंजी से ज्यादा हो गई है। सो, अर्थव्यवस्था को लेकर भारत के बारे में विश्व की धारणा व्यापक रूप से प्रभावित हुई है। इसे लेकर ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंकर रूचिर शर्मा ने पिछले दिनों कहा था कि वे 30 साल से इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के क्षेत्र में हैं और कभी भी भारत के प्रति ऐसी उदासीनता देखने को नहीं मिली। उन्होंने कहा कि दुनिया भारत के बारे में सोच ही नहीं रही है। यह एक अलग आर्थिक संकट का संकेत है।

बहरहाल, प्रधानमंत्री ने पेट्रोल, डीजल और गैस को लेकर जिस तरह की सलाह और चेतावनी दी है वह संकट की गंभीरता बताने वाला है। इसका अर्थ है कि आने वाले कुछ समय तक भारत में ईंधन का संकट रहेगा। अगले कुछ दिनों में पेट्रोल, डीजल व गैस की कीमतों में इजाफा हो तब भी हैरानी नहीं होगी। अगर ईंधन महंगा होता है तो फिर जरुरत की सभी चीजों की कीमतें बढ़ेंगी। यानी महंगाई का नया दौर शुरू होगा। एक तरफ रोजगार कम हो रहे हैं तो दूसरी ओर कीमतें बढ़ेंगी। इसके बावजूद आपूर्ति सामान्य रहेगी इसकी गारंटी नहीं है। वह गारंटी करने के लिए सरकार को अपनी खरीद में विविधता लाने के साथ साथ भंडारण की व्यवस्था को बेहतर करना होगा। इसके साथ ही ऊर्जा के दूसरे स्रोतों में बड़ा निवेश करना होगा ताकि आयातित तेल पर निर्भरता कम हो।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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