भारत में दलबदल कानून पर नए सिरे से विचार की जरुरत है। 1985 में बने और उसके बाद कई बार संशोधित और अदालती आदेशों से परिमार्जित हुए इस कानून के रहते जिस तरह से विधायक और सांसद पार्टी बदल रहे हैं उससे तो लग रहा है कि यह कानून पूरी तरह से बेअसर है। इसलिए या तो इसे समाप्त कर देना चाहिए और 1985 से पहले वाली व्यवस्था बहाल कर देनी चाहिए या फिर कानून को नए सिरे से परिभाषित करके उसे ऐसा रूप देना चाहिए कि सचमुच विधायकों और सांसदों को पार्टी बदलने या पार्टी तोड़ने से रोका जा सके। हालांकि इस प्रस्ताव को कई लोग अलोकतांत्रिक मानेंगे। लेकिन क्या करें?
अगर वैचारिक प्रतिबद्धता, राजनीतिक नैतिकता और सामाजिक शुचिता शून्य हो जाए तो क्या ही किया जा सकता है! आमतौर पर राजनीति और नैतिकता को एक दूसरे का विरोधी माना जाता है। लेकिन दुनिया के ज्यादातर सभ्य देशों में ऐसा नहीं है। अमेरिका या यूरोप के देशों में ऐसा नहीं होता है कि एक पार्टी से जीता हुआ व्यक्ति पाला बदल कर उस पार्टी में चला जाए, जिसका वैचारिक और राजनीतिक विरोध करके जीता हो। यह भारत में ही होता है, जहां सत्य के लिए हरिश्चंद्र और मर्यादा के लिए भगवान राम जैसा प्रतिमान गढ़ा गया है।
बहरहाल, दलबदल विरोधी कानून को लेकर इस चर्चा को आगे बढ़ाएं उससे पहले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों में हुई टूट को समझने की जरुरत है। यह दलबदल की किसी दूसरी घटना से बिल्कुल अलग है। राज्यसभा के सांसदों का चुनाव आम जनता नहीं करती है। राज्यसभा के सांसद विधायकों द्वारा चुने जाते हैं और विधायकों के जरिए राज्य का प्रतिनिधित्व संसद के उच्च सदन में करते हैं। इसलिए अगर उन राज्यसभा सांसदों को चुनने वाले विधायक आम आदमी पार्टी में ही हैं तो फिर इनके दलबदल को कैसे मान्यता दी जा सकती है?
सामान्य तर्क से भी इनकी सदस्यता खारिज हो जानी चाहिए। तकनीकी पहलू जो भी हो लेकिन जिन विधायकों के वोट से राधव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, राजेंदर गुप्ता, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल जीते हैं वे विधायक अगर आम आदमी पार्टी के साथ ही हैं तो फिर उनके वोट से जीते सांसद दूसरी पार्टी में कैसे जा सकते हैं? लोकसभा या विधानसभाओं के सदस्य सीधे जनता के वोट से जीतते हैं। तो समझ में आता है कि सीधे जनता से जाकर नहीं पूछा जा सकता है कि वह सांसदों या विधायकों के पाला बदलने के पक्ष में है या नहीं। लेकिन अगर राज्यसभा सांसदों को चुनने वाले विधायक कहते हैं कि वे इनके दलबदल से सहमत नहीं हैं तो क्या इनकी सदस्यता नहीं समाप्त हो जानी चाहिए?
अब संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल दलबदल कानून को देखें तो इसकी अनेक बार व्याख्या हुई है फिर भी इसमें बहुत अस्पष्टता है। सबसे पहले तो यही स्पष्ट नहीं है कि क्या विधायक दल या संसदीय दल को पार्टी माना जा सकता है या पार्टी सबसे ऊपर है, जिसके तहत विधायक व संसदीय दल आते हैं? इस पर कई बार सुनवाई हुई और चर्चा भी हुई है। लेकिन स्पष्टता नहीं आई है। असल में 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के जरिए दलबदल कानून बनाया गया था। उसमें ‘स्प्लिट’ यानी ‘विभाजन’ और ‘मर्जर’ यानी ‘विलय’ की दो स्थितियों को परिभाषित किया गया। किसी राजनीतिक दल में ‘विभाजन’ का यह नियम बनाया गया कि अगर किसी पार्टी के विधायक या ससंदीय दल के एक तिहाई सदस्य एक साथ होकर पार्टी से अलग होते हैं तो उसे पार्टी का ‘विभाजन’ माना जाएगा और अलग होने वाले सदस्यों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। यानी उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। जब इसका बहुत दुरुपयोग होने लगा तब 2003 में संविधान के 91वें संशोधन के जरिए इसे समाप्त कर दिया गया।
जहां तक ‘मर्जर’ यानी ‘विलय’ की बात है तो उसे संविधान में बनाए रखा गया लेकिन उसमें बहुत कंफ्यूजन है। 10वीं अनुसूची में दर्ज दलबदल कानून के पैरा चार में कहा गया है कि अगर कोई चुना हुआ विधायक या सांसद किसी दूसरी पार्टी में शामिल होता है तो उसकी सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी। लेकिन साथ ही इसका अपवाद भी बनाया गया। कहा गया कि अगर किसी सांसद या विधायक के दूसरी पार्टी में जाने की परिघटना उसकी असली पार्टी के दूसरी पार्टी में विलय से जुड़ी है तो उसकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी। यानी जो विलय करना चाहता है उसे साबित करना होगा कि वह असली पार्टी है।
इसे आगे दो सब पैराग्राफ में परिभाषित किया गया। सब पैरा एक में कहा गया कि अगर असली पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय हो जाता है तो असली पार्टी के सदस्यों की सदस्यता नहीं समाप्त होगी। इसके आगे दूसरे सब पैराग्राफ में कहा गया कि यह ‘विलय’ तभी वैध होगा, जब असली पार्टी के विधायक दल या संसदीय दल के दो तिहाई सदस्य इसके लिए राजी होंगे। इसमें कंफ्यूजन इसलिए है क्योंकि कई लोग दोनों सब पैराग्राफ को एक साथ मिला कर पढ़ते हैं तो उसका अलग अर्थ निकलता है और अलग अलग करके पढ़ते हैं तो अर्थ अलग हो जाता है। दोनों सब पैराग्राफ एक साथ पढ़ते हैं तो ‘विलय’ का अर्थ यह निकलता है कि असली पार्टी का दूसरी पार्टी में पूरी तरह से विलय हो, जिसे विधायक दल के कम से कम दो तिहाई की मंजूरी प्राप्त हो। लेकिन जब दोनों सब पैराग्राफ अलग अलग पढ़ते हैं तो ‘विलय’ का मतलब होता है अगर विधायक दल के दो तिहाई सदस्य दूसरी पार्टी में ‘विलय’ के लिए तैयार हो जाते हैं तो ‘विलय’ हो जाता है, भले राज्य या देश के स्तर पर उस असली पार्टी का विलय दूसरी पार्टी में हो या नहीं हो।
अदालतों ने भी ‘विलय’ के प्रावधान की अलग अलग व्याख्या की है। बहुजन समाज पार्टी के 37 विधायकों के टूटने का मामला एक मिसाल है। इसमें राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य के मामले में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधायक दल का मतलब किसी सदन के चुने हुए सदस्यों का समूह है, जो एक राजनीतिक दल का हिस्सा है। इस आधार पर अदालत ने कहा था कि विधायक दल में ‘विभाजन’ अनिवार्य रूप से असली राजनीतिक दल में ‘विभाजन’ से जुड़ा हुआ होना चाहिए। सरल शब्दों में इसकी व्याख्या यह है कि ‘विभाजन’ की शुरुआत असली राजनीतिक दल में होनी चाहिए, जिसकी स्वीकृति विधायक दल करे। इसका यह अर्थ भी निकाल सकते हैं कि विधायक दल अपने आप नहीं टूट सकता है।
या विधायक दल के दो तिहाई सदस्यों के टूटने को स्वतः पार्टी में टूट नहीं माना जा सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल कानून के पैरा चार के दोनों सब पैराग्राफ को मिला कर पढ़ा था। लेकिन 2019 में जब गोवा विधानसभा में कांग्रेस के 10 विधायक टूट कर भाजपा में गए तो उस मामले में हाई कोर्ट ने दलबदल कानून के पैराग्राफ चार के दोनों सब पैराग्राफ को अलग अलग पढ़ा और कहा कि कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों ने अलग होकर दूसरी पार्टी में ‘विलय’ का फैसला किया है तो यह कानूनी रूप से सही है क्योंकि दो तिहाई विधायकों ने अलग होने का फैसला किया है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर असली पार्टी की मंजूरी लेने की जरुरत नहीं है। परंतु यह व्याख्या दलबदल कानून की मूल भावना के अनुकूल नहीं है। मूल भावना यह है कि पहले असली पार्टी का विलय दूसरी पार्टी में होना चाहिए और तब विधायक या संसदीय दल के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की ओर से उसकी मंजूरी ली जाए। दलबदल कानून यह मानता है कि कोई भी विधायक या सांसद अगर किसी पार्टी से जीतता है तो उसके बारे में फैसले में असली पार्टी की भूमिका होनी चाहिए। अन्यथा वह व्यक्ति इस्तीफा देकर फिर से जनता के बीच जाए।
बहरहाल, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों की टूट के बाद यह जरूरी हो गया है कि दलबदल कानून की खामियों को दूर किया जाए। इसमें बहुत से लूपहोल्स हैं। इनका फायदा उठा कर महाराष्ट्र में शिव सेना टूटी या एनसीपी टूटी। बिहार में राजद के विधायक पाला बदल कर एनडीए के साथ गए। झारखंड में जेवीएम के विधायक कांग्रेस और भाजपा में गए। उत्तराखंड में कांग्रेस विधायकों के टूटने का विवाद हुआ। कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश तक दलबदल की अनेक घटनाएं हुईं। सवाल है कि दलबदल रोकने के कानून के बावजूद इतनी आसानी से पार्टियों में टूट हो जाती है या उनका विलय हो जाता है और किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है क्योंकि स्पीकर महीनों, बरसों तक मामले को लटकाए रखते हैं तो फिर इस कानून की जरुरत क्या है?


