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सरकार के लिए वरदान है भारत का विपक्ष

विपक्षी पार्टियां सरकार से लड़ने के लिए कितना सुविधानजक रास्ता चुनती हैं इसकी मिसाल ‘इंडिया’ ब्लॉक की सोमवार, आठ जून को हुई बैठक है। इस बैठक में विपक्षी पार्टियों के बीच पांच प्रस्तावों पर सहमति बनी। मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी। इनमें से दो मुद्दे तो विपक्षी गठबंधन के अंदर आपसी तालमेल से जुड़े हैं। बैठक में यह तय किया गया कि हर दो महीने में ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। इस लिहाज से अगली बैठक के लिए आठ अगस्त का दिन तय किया गया। आठ अगस्त को हैदराबाद में अगली बैठक होगी। इसके अलावा एक सहमति इस पर बनी कि संसद के मानसून सत्र में विपक्ष की सभी पार्टियां हर दिन कार्यवाही शुरू होने से पहले बैठक करेंगी। यह पहले से भी होता था। सुबह 10 बजे राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के चैम्बर में विपक्ष की बैठक होती थी। इसलिए इसमें कुछ नया नहीं है।

विपक्ष की बैठक में बाकी जिन तीन प्रस्तावों पर सहमति बनी वो देश के सामने मौजूद ज्वलंत समस्याओं से जुडे हैं। पहला प्रस्ताव मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर है। विपक्षी पार्टियों ने तय किया कि एसआईआर में निष्पक्षता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी जाएगी। एक प्रस्ताव यह स्वीकार किया गया कि नीट यूजी की परीक्षा के पेपर लीक होने और सीबीएसई की 12वीं की बोर्ड परीक्षा में हुई गड़बड़ी के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग जाएगा। तीसरी सहमति इस प्रस्ताव पर बनी कि महंगाई और बेरोजगारी को लेकर सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाने की अपील की जाएगी। इस पूरे मामले में आंदोलन करने का एक भी प्रस्ताव नहीं लाया गया। किसी ने यह जरुरत नहीं समझी कि महंगाई, बेरोजगारी, पेपर लीक, एसआईआर को लेकर लगातार चलने वाला जन आंदोलन शुरू किया जाए और सरकार को जनता की नजर में

जवाबदेह बनाया जाए।

सोचें, इससे पहले कब ऐसा विपक्ष देखने को मिला था, जो लगातार हो रहे पेपर लीक और छात्रों की परेशानी को लेकर अपने ड्राइंग रूम में बैठे बैठे शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगे! कब ऐसा विपक्ष रहा था, जो महंगाई और बेरोजगारी पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करे! जब भाजपा विपक्ष में थी यानी 2014 से पहले तो गैस सिलेंडर में 10 रुपए की बढ़ोतरी या पेट्रोल, डीजल की कीमत में एक रुपए की बढ़ोतरी के खिलाफ सड़क पर उतरती थी। चीनी और तेल की महंगाई के खिलाफ खुद कांग्रेस के आंदोलन की वजह से ढाई साल की मोरारजी देसाई सरकार 1980 में चुनाव हार गई थी। 1998 में प्याज की कीमतों पर राजधानी दिल्ली में भाजपा की सरकार चली गई थी। लेकिन अब महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है और बेरोजगारी कहां जाकर रूकेगी इसका अंदाजा किसी को नहीं है लेकिन विपक्ष कह रहा है कि इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। सर्वदलीय बैठक होगी तो विपक्ष के नेता अपने वातानुकूलित ड्राइंग रूम से निकल कर, वातानुकूलित गाड़ी में बैठ कर, संसद या उसकी एनेक्सी के किसी वातानुकूलित कक्ष में पहुंच जाएंगे, जहां चाय, पकौड़ी खाते हुए महंगाई और बेरोजगारी पर चर्चा होगी और अखबारों में कहीं सिंगल कॉलम की खबर बनेगी।

इसी तरह से एसआईआर का मामला है। बिहार सबसे पहला राज्य था, जहां एसआईआर हुआ। उस समय बिहार में विधानसभा का चुनाव होने वाला था तो राहुल गांधी ने एसआईआर को लेकर 15 दिन तक यात्रा की थी। हालांकि राजद के तेजस्वी यादव इसे लेकर बहुत सहज नहीं थे। फिर भी वे साथ घूमे। लेकिन उसके बाद राहुल गांधी ने एसआईआर को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद विपक्ष को फिर लग रहा है कि एसआईआर का उनको नुकसान हो सकता है। बंगाल में 27 लाख से ज्यादा नाम तार्किक विसंगति के आधार पर काट दिए गए।

इन लोगों के पास दस्तावेज हैं और न्यायाधिकरण में उन दस्तावेजों की जांच के बाद 60 फीसदी लोगों को वैध मतदाता माना जा रहा है। इसका अर्थ है कि तार्किक विसंगति के आधार पर जिन 27 लाख लोगों के नाम कटे हैं उनमें से 22 लाख वैध मतदाता हो सकते हैं। अगर इनके नाम नहीं कटते तो बंगाल का चुनाव नतीजा अलग भी हो सकता था। विपक्ष को यह अंदाजा है कि एसआईआर और परिसीमन दो ऐसी चीजें हैं, जिनके दम पर भाजपा 2029 का चुनाव जीतने की रणनीति बना रही है। लेकिन उस एसआईआर के खिलाफ आंदोलन करने और लोगों को जागृत करने की बजाय विपक्ष चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखेगा।

विपक्ष जब महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करने लगे, लगातार हो रहे पेपर लीक को लेकर सोशल मीडिया में पोस्ट लिख कर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगे और पूरे चुनाव की दशा और दिशा बदल देने वाले एसआईआर जैसे अभियान पर चिट्ठी लिख कर अपनी शंका जाहिर करे तो समझ लेना चाहिए कि विपक्ष के अंदर सड़क पर उतर कर संघर्ष करने और जन आंदोलन खड़ा करने की क्षमता समाप्त हो गई है। वह सुविधाभोगी और आरामतलब हो गया है। सवाल है कि क्या विपक्ष को जमीनी हकीकत और जनता के मूड का बिल्कुल अंदाजा नहीं है? वर्तमान स्थिति को लेकर खास कर पेपर लीक और सीबीएसई की ग़ड़बड़ियों पर जैसा असंतोष और गुस्सा लोगों के अंदर है वह कॉकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया अकाउंट के फॉलोअर्स की संख्या से जाहिर हुआ।

उसके आंदोलन में जिस तरह से स्वंयस्फूर्त तरीके से हजारों लोग जुटे उससे भी जाहिर हुआ है कि लोग उद्वेलित हैं और जरुरत उनके गुस्से को सही दिशा देने की है। लेकिन विपक्ष इस मौके का लाभ नहीं उठाएगा और लेकिन दूसरी ओर सत्तापक्ष यानी भाजपा इससे सबक लेकर या तो सुधार करेगी या नैरेटिव बदल कर इसको हैंडल करने की कोशिश करेगी। विपक्ष की आठ जून की बैठक में और भी कई चीजें देखने को मिलीं। विपक्ष का आपसी अविश्वास भी दिखा और समन्वय की कमी भी दिखी। लेकिन उसको छोड़ दें तब भी विपक्ष ने जो एजेंडा तय किया उसको देख कर यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि ऐसा विपक्ष भाजपा के लिए वरदान की तरह है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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