मेडिकल में दाखिले के लिए हुई नीट यूजी की परीक्षा पेपर लीक होने की वजह से रद्द होने और दोबारा परीक्षा के कारण करीब 23 लाख बच्चों का भविष्य संकट में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक परीक्षा देकर बच्चे कोटा, दिल्ली या दूसरी जगहों से घर लौट गए थे लेकिन उनको फिर वापस अपने कोचिंग सेंटर्स के पास लौटना पड़ा है। वे नए सिरे से रहने की व्यवस्था करके और फीस देकर पढाई कर रहे हैं। उनके और उनके परिजनों की मानसिक और अन्य परेशानियां अपनी जगह है।
इसी तरह 12वीं बोर्ड की सीबीएसई परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में हुई गड़बड़ियों से 18 लाख के करीब बच्चे परेशान हुए हैं। दोनों परीक्षाओं में कुछ बच्चे कॉमन होंगे फिर भी 30 लाख या उससे ज्यादा बच्चों को सरकारी तंत्र ने संकट में डाला है। उसके बाद बच्चों को भरोसा दिलाने के नाम पर जो हो रहा है वह बरगलाने या समय काटने के सिवा कुछ नहीं है।
जैसे समूचा मीडिया चीख चीख कर कह रहा है कि सरकार ने बड़ा एक्शन लिया, सीबीएसई के चेयरमैन और सचिव को हटा दिया, ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम टेंडर की जांच के लिए कमेटी बनी, कमेटी सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करेगी आदि आदि। लेकिन यह सब बरगलाने का उपाय है। क्या इसको बड़ा एक्शन लेना कहेंगे कि सीबीएसई के चेयरमैन पद से राहुल सिंह को हटा कर कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय का अतिरिक्त सचिव बना दिया गया?
जहां तक जांच के लिए एक सदस्यीय कमेटी बनाने का सवाल है तो राधा चौहान को उसका जिम्मा दिया गया है। यह संयोग है कि कुछ समय पहले राहुल सिंह प्रधानमंत्री के अधीन आने वाले कार्मिक मंत्रालय यानी डीओपीटी में अतिरिक्त सचिव थे और उस विभाग की सचिव राधा चौहान थीं। दोनों ने काफी समय तक साथ काम किया है। हालांकि इस संयोग की ओर इशारा करने का मकसद जांच पर संदेह पैदा करना नहीं है लेकिन यह संयोग हितों का टकराव तो है ही।
इसके बाद जो बरगलाने वाले अन्य उपाय हैं उनको भी सारे लोग देख रहे हैं। जब 12वीं के छात्रों को एक बड़ी मुसीबत में फंसाने के बाद सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिकाओं की जांच की प्रक्रिया शुरू की तो उसकी वेबसाइट ही काम नहीं कर रही थी। इसकी वजह से कई बार समय बढ़ाना पड़ा। अंत में तय हुआ एक जून से जांच शुरू होगी। लेकिन उस दिन साइट ही नहीं चली। उससे पहले शिक्षा मंत्री की ओर से कहा गया था कि साइट और सर्वर ठीक करने के लिए दो आईआईटी से मदद ले रहे हैं।
सरकार इस काम को गंभीरता से ले रही है यह नैरेटिव स्थापित करने के लिए आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर की प्रतिष्ठा दांव पर लगाई गई। ध्यान रहे काम पहले से खराब हुआ था। सीबीएसई की वेबसाइट इस लिहाज से तैयार ही नहीं की गई थी कि लाखों बच्चे एक साथ आवेदन करें तो उसे सही तरीके से हैंडल किया जा सके। लेकिन जब मामला बिगड़ने लगा तो आईआईटी को दांव पर लगा दिया गया।
जाहिर है किसी भी आईआईटी के पास जादू की छड़ी नहीं है, जो दो दिन में सारी चीजें ठीक कर दे। इसका नतीजा यह हुआ कि एक जून से साइट नहीं शुरू हो पाई। साइट दो जून से शुरू हुई तब भी कई तरह की समस्याएं आईं। साइट हैक करने की कोशिश हुई या उसे धीमा किया गया। याद करें कैसे आयकर विभाग ने अपनी साइट को नए सिरे से बनाने का जिम्मा इंफोसिस को दिया था और उसमें कितना समय लगा था और कितने तरह की गड़बड़ियां सामने आई थीं।
वह ठेका 46 सौ करोड़ रुपए का था। सोचें, वहां टैक्स वसूलने का सिस्टम ठीक करना था तो सरकार ने करीब पांच हजार करोड़ रुपए खर्च कर दिए। लेकिन लाखों, करोड़ों छात्रों के लिए एक सिस्टम बनाना था तो वह भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। वहां सिर्फ आईआईटी का नाम लेकर लोगों को बरगलाया गया। ऐसे ही 2024 के पेपर लीक के समय इसरो के प्रमुख की अध्यक्षता में कमेटी बना कर रिपोर्ट मंगाने का मामला था। के राधाकृष्णन कमेटी की रिपोर्ट धूल फांकती रही और दो साल के अंदर ही फिर से पेपर लीक हो गया।
ऐसे ही बरगलाने वाला उपाय यह भी है कि भारत की वायु सेना के विमानों से प्रश्न पत्र पहुंचाए जाएंगे। सवाल है कि अगर प्रश्न पत्र छपने से पहले ही लीक हो गए या परीक्षा केंद्र पर पहुंचने के बाद लीक हुए या परीक्षा केंद्र पर सॉल्वर गैंग ने गड़बड़ी की दूसरी तैयारी करके रखी है तो उसका क्या हल है? उसके लिए कुल मिला कर यह हल है कि प्रधानमंत्री खुद निगरानी कर रहे हैं! सोचें, प्रधानमंत्री की मदद के लिए मंत्रिपरिषद है, जिसमें सबके काम और उत्तरदायित्व तय हैं। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री को परीक्षा की प्रक्रिया की निगरानी करनी पड़ रही है तो इसका अर्थ है कि परीक्षा कराने की जिम्मेदार एजेंसी, मंत्रालय और उसके विभाग पूरी तरह से विफल रहे हैं। फिर क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है या उनको बदला जा रहा है?
सीबीएसई की उत्तर पुस्तिकाओं में जांच की गड़बड़ी के बाद तो कम से कम दो लोगों के तबादले हुए लेकिन नीट यूजी के पेपर लीक के बाद तो परीक्षा कराने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए के किसी अधिकारी या कर्मचारी के ऊपर किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई! शिक्षा मंत्री और उनके मंत्रालय में यथास्थिति बनी रही और सब कुछ पहले की तरह चलता रहा। कहा जा रहा है कि 21 जून को दोबारा परीक्षा हो जाने के बाद कार्रवाई होगी। सवाल है कि अगर एक सिस्टम नाकारा है और लोग सक्षम नहीं हैं, उनकी आंखों के सामने पेपर लीक हुए और परीक्षा रद्द करनी पड़ी तो उन्हीं के हवाले फिर से 23 लाख बच्चों का भविष्य कैसे किया जा सकता है?


