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एसआईआर में फिर वही कहानी

पंजाब के गुरदासपुर में काहनूवान इलाके के भट्टियां गांव के गुरप्रीत सिंह ने खुदकुशी कर ली। वे राज्य के एक स्कूल में शिक्षक थे और मतगणना सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की ड्यूटी से परेशान थे। उन्होंने अपने नजदीकी लोगों को परेशानी के बारे में बताया भी थी। एक दूसरी रिपोर्ट यह है कि राजधानी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ठप्प है। अनेक स्कूल एक एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि शिक्षक जनगणना के पहले चरण का काम कर रहे थे और उससे फारिग हुए तो अब एसआईआर का काम कर रहे हैं। एसआईआर और जनगणना से पहले वे लोग एसआईआर से ही जुड़े मतदाताओं की मैपिंग का काम कर रहे थे। तीसरी खबर यह है कि ओडिशा में 20 लाख से ज्यादा लोगों के नाम कटे हैं और विपक्षी पार्टियां विरोध में उतरी हैं। चौथी खबर है कि पश्चिम बंगाल में हाई कोर्ट ने कहा है कि तार्किक विसंगति के आधार पर जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं उनकी सुनवाई ट्रिब्यूनल में जिस रफ्तार से हो रही है उस रफ्तार से सारे मामलों की सुनवाई पूरी होने में 21 साल लगेंगे।

इन खबरों की जानकारी देने का संदर्भ यह है कि अब चुनाव आयोग को एसआईआर का कराने का अनुभव एक साल का हो गया फिर भी पुरानी कहानी दोहराई जा रही है। पिछले साल जून में ही बिहार में एसआईआर की शुरुआत हुई थी। एक साल के बाद और एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में एसआईआर कराने के बाद भी इससे जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है। उलटे बार बार वही समस्याएं सामने आ रही हैं, जो पहले के चरणों में आई हैं। अब भी एसआईआऱ के काम से जुड़े लोग दबाव महसूस कर रहे हैं और खुदकुशी की नौबत आ रही है। अब भी लोग मैपिंग के लिए परेशान हैं और नाम कट रहे हैं। अब भी स्कूलों में पढ़ाई रोक कर यह काम किया जा रहा है। सोचें, सरकारी और निजी स्कूलों की पढ़ाई के अंतर पर। इसे लेकर सोशल मीडिया में एक मजाक चल रहा है कि, ‘बच्चे स्कूल में अपने शिक्षक को खोज रहे हैं, शिक्षक एसआईआर के लिए बच्चों के माता, पिता को खोज रहे हैं और बच्चों के माता, पिता मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए अपने माता, पिता का नाम खोज रहे हैं और इस तरह पूरे देश को काम पर लगा कर प्रधानमंत्री विदेश दौरे कर रहे हैं’। बहरहाल, एक मामला तार्किक विसंगति का भी है। हालांकि यह मसौदा मतदाता सूची और अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद ही पता चलेगा कि चुनाव आयोग तीसरे चरण वाले राज्यों में इस श्रेणी में कितने लोगों का नाम डालता है।

गौरतलब है कि तीसरे चरण में राजधानी दिल्ली सहित 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया 30 जून को शुरू हो गई। पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में मई के आखिरी दिन से तीसरा चरण शुरू हो गया था। आयोग ने तय किया है कि दिसंबर तक इसे पूरा किया जाएगा। हालांकि इस बात की गारंटी नहीं होती है कि इस समय सीमा में काम पूरा हो जाएगा। कम से कम उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का अनुभव तो यही कहता है। उत्तर प्रदेश में कई बार तारीखें बढ़ाई गईं, जबकि पश्चिम बंगाल में तो अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और चुनाव भी हो गया। 27 लाख 10 हजार लोगों के नाम तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाता सूची से हटा दिए गए। इनमें से विधानसभा चुनाव से पहले 17 सौ से थोड़े ज्यादा भाग्यशाली लोगों का नाम मतदाता सूची में शामिल हो पाया। इन 27 लाख लोगों के अलावा करीब सात लाख अन्य लोगों ने भी मतदाता सूची से नाम काटे जाने के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई है। अभी ट्रिब्यूनल के सामने 32 लाख नाम लंबित हैं और हाई कोर्ट का कहना है कि अगर इसी रफ्तार से सुनवाई हुई तो सारे मामले का निपटारा करने में 21 साल लगेंगे।

अभी तक के अनुभव के हिसाब से देखें तो यह मानना थोड़ा मुश्किल है कि चुनाव आयोग ने पूरी ईमानदारी से और निरपेक्ष होकर एसआईआर का काम किया। यह मानना भी थोड़ा मुश्किल है कि व्यवस्थागत खामियों, प्रक्रियागत मुश्किलों और तकनीकी सीमाओं की वजह से लाखों लोगों की अपील लंबित रह गई। अगर वास्तव में ऐसा होता तब तो उम्मीद की जा सकती थी कि चुनाव आयोग उससे सबक लेकर अपने सिस्टम को बेहतर करेगा और तीसरे चऱण के एसआईआर में वैसी गड़बड़ियां नहीं होंगी, जैसे दूसरे चरण में हुईं। यह बहुत दिलचस्प है कि पहले चऱण में सिर्फ एक राज्य बिहार में एसआईआर हुआ और तीन महीने में प्रक्रिया पूरी हो गई। कुछ विवाद जरूर हुए लेकिन मोटे तौर पर लोगों ने स्वीकार किया कि आयोग ने मतदाता सूची की सफाई की है। मृत लोगों, स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए लोगों और एक से ज्यादा जगह नाम वाले लोगों को मतदाता सूची से हटा दिया गया। तार्किक विसंगति जैसा जुमला सुनने को नहीं मिला।

पहले और दूसरे चरण में कई प्रक्रियागत सुधार भी हुए। जैसे चुनाव आयोग ने पहले आधार को स्वीकार करने से इनकार किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आधार स्वीकार किया जाने लगा। हालांकि अब भी आधार को पहचान प्रमाणित करने वाला इकलौता दस्तावेज नहीं माना जा रहा है। यानी कोई चाहे कि वह आधार के सहारे मतदाता सूची में नाम शामिल करा ले तो यह संभव नहीं है। दूसरे चरण में तो कई तरह के विवाद हुए और देरी भी हुई। इनसे सबक लेकर सिस्टम को फुलप्रूफ बनाने का मौका चुनाव आयोग के सामने था। उसे सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि जिस तरह पश्चिम बंगाल में एसआईआर के काम का बोझ बूथ लेवल अधिकारियों यानी बीएलओ के ऊपर पड़ा और उसकी वजह से कई बीएलओ की मौत होने या खुदकुशी करने की खबरें सामने आईं वैसे तीसरे चऱण में नहीं हो। यह भी सुनिश्चित करना चाहिए था कि लोगों को पहले जैसी परेशानी न झेलनी पड़े और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा कोई विवाद न हो, जिससे लाखों लोगों के नाम कटें और लोग मतदान के अधिकार से वंचित रह जाएं।

राजधानी दिल्ली सहित जिन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है उनमें पहले दो चरण से अलग कोई खास सुधार नहीं दिख रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण समय की कमी है। चुनाव आयोग ने पहले दो चरण की तरह ही तीसरे चरण में भी मतदाता प्रपत्र भरने और जमा कराने के लिए एक ही महीने का समय दिया है। इससे बीएलओ, बीएलए और आम मतदाताओं पर दबाव है। बाकी कुछ सुधार हुए हैं या सब कुछ पहले जैसा ही है इसका पता मसौदा मतदाता सूची जारी होने के बाद ही चल पाएगा।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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