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जो दलबदलू हैं वो ‘बागी’ हो गए!

अलग अलग समय में हुए दुनिया के दो महान विचारकों ने विचारधारात्मक युद्ध में शब्द और भाषा के इस्तेमाल को लेकर बहुत कुछ लिखा है। पहले जॉर्ज ऑरवेल ने और फिर नोम चोमस्की ने। ऑरवेल ने अपने महान उपन्यास ‘नाइंटीन एटी फोर’ के अंत में ‘द प्रिंसिपल्स ऑफ न्यूस्पीक’ के बारे में लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि ‘न्यूस्पीक’ में एक ‘बी वोकैबुलरी’ है, जिसमें कोई भी शब्द विचारधारात्मक रूप से तटस्थ या निरपेक्ष नहीं है। मिसाल के तौर पर एक शब्द है ‘जॉयकैम्प’, सुन कर ऐसा लगता है, जैसे यह मौजमस्ती की कोई जगह होगी लेकिन असल में यह शब्द ‘फोर्स्ड लेबर कैम्प’ के लिए इस्तेमाल होता है। ऐसे ही ‘मिनीपैक्स’ यानी मिनिस्ट्री ऑफ पीस है, जिसका असली मतलब मिनिस्ट्री ऑफ वॉर है।

यानी जो युद्ध का मंत्रालय है, उसे ही शांति का मंत्रालय कहा जाए और जहां मजदूरों से बेगारी कराई जाती है, उन्हें मरणांतक यातना दी जाती है उसे ‘जॉयकैम्प’ कहा जाए। इसी बात को नोम चोमस्की ने अपनी किताब ‘अंडरस्टैंडिंग पावर’ में कहा कि शब्दों के डिक्शनरी वाले अर्थ अलग होते हैं लेकिन उन्हें जब विचाराधारात्मक युद्ध में इस्तेमाल किया जाता है तो उसके मायने बदल जाते हैं। जैसे उन्होंने लिखा है कि ‘आतंकवाद’ एक ऐसी चीज है, जो हमेशा दूसरे लोग करते हैं। ऐसे ही उन्होंने लिखा है, “एक शब्द है ‘डिफेंस’, मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी सरकार ने कहा हो कि उसने कोई आक्रामक कार्रवाई की है। सब कहते हैं कि हमने अपने ‘डिफेंस’ में अमुक कार्रवाई की है”।

जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले अप्रैल 1946 में एक लंबा लेख लिखा था, ‘पोलिटिक्स एंड द इंगलिश लैंग्वेज’। इसमें उन्होंने क्राफ्ट्स ऑफ पोलिटिकल राइटिंग यानी राजनीतिक लेखन की कला के बारे में लिखा था। इसको कई तरह से पढ़ा जाता है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि विचारधारात्मक युद्ध में किसी शब्द के शब्दकोष वाले अर्थ को बिल्कुल अलग अर्थ में प्रस्तुत किया जा सकता है। ऑरवेल के लेख का एक पाठ यह भी है कि राजनीतिक लेखन में कैसे सत्ता के सेंसर से बचा जा सकता है। लेकिन वह अलग मामला है। अभी तो हम इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि ‘थॉट पुलिस’ कैसे शब्दों के मायने बदल रही है। यह व्यापक स्तर पर हो रहा है और जाने अनजाने में देश के नागरिक इसके जाल में फंसते जा रहे हैं। वे न तो नैरेटिव की ताकत को समझ पा रहे हैं और न उस नैरेटिव में इस्तेमाल होने वाले शब्दों को समझ रहे हैं।

इस नासमझी में लोग उन शब्दों को दोहरा रहे हैं, जिसके मायने बड़ी होशियारी से बदल दिए गए हैं। ‘रिबेल’ या ‘बागी’ ऐसा ही शब्द है। अपने मूल राजनीतिक दल से दलबदल करने वाले सांसदों और विधायकों को अंग्रेजी के अखबार ‘रिबेल’ और हिंदी वाले ‘बागी’ लिख रहे हैं। असल में ये लोग ‘बागी’ नहीं हैं, बल्कि दलबदलू हैं, जिनके लिए ‘गद्दार’ या ‘आयाराम गयाराम’ के विशेषण का इस्तेमाल होता था। अब इनको ‘बागी’ कहा जाने लगा है, जो तथ्य और कथ्य दोनों रूपों में गलत है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि सारे दलबदल गद्दार या आयाराम गयाराम श्रेणी में आते हैं। अगर कोई दलबदल विचारधारा के टकराव के कारण हो या बड़े राजनीतिक कारण से हो तो उसकी अलग श्रेणी बनती है। वैचारिक मतभेद के कारण कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन हुआ या कांग्रेस और समाजवादी पार्टियों में विभाजन हुआ या भाजपा भी कई बार बंटी लेकिन अब जो विभाजन हो रहा है या दलबदल हो रही है वह उन सबसे अलग है। अब लगभग सारी दलबदल सत्ता की चाह या किसी भय के कारण हो रही है।

चाहे तृणमूल कांग्रेस के सांसदों व विधायकों का टूटना हो या शिव सेना के सांसदों व विधायकों का अलग होना हो, उसमें वैचारिकता कहीं नहीं है और न बगावत का भाव है। बगावत का भाव होता तो ममता बनर्जी के चुनाव हारने के बाद उनसे अलग होने वाले नेता चुनाव नतीजों से पहले ममता के सामने सवाल उठाते। वे पार्टी में रह कर पार्टी की नीतियों या गड़बड़ियों का विरोध करते। इस देश में ऐसे नेता भी हुए हैं। चंद्रशेखर, मोहन धारिया, रामधन ऐसे नेता थे, जो कांग्रेस में थे और इंदिरा गांधी की कांग्रेस के कामकाज पर सवाल उठाते थे। तभी चंद्रशेखर ‘युवा तुर्क’ कहलाए। आज हर युवा नेता को ‘युवा तुर्क’ कहा जाता है, जबकि असल में यह तुर्की में व्यवस्था का विरोध करने वाले मुस्तफा कमाल पाशा के समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया गया था और इसलिए जब भी विशेषण के तौर पर इसका इस्तेमाल होगा तो व्यवस्था का विरोध करने वालों के लिए ही होगा।

बहरहाल, वास्तविकता यह है कि जब तक ममता बनर्जी सरकार में थीं उनकी पार्टी के किसी नेता कि हिम्मत नहीं हुई उनके सामने बोलने की। तभी उनके हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद जो लोग उनको छोड़ रहे हैं उन्हें ‘बागी’ नहीं कह सकते हैं। वे तो सत्ता के लालच में या खुद को बचाने के लिए दलबदल कर रहे हैं। एकनाथ शिंदे ने जरूर उद्धव ठाकरे को तब चुनौती दी थी, जब वे मुख्यमंत्री थे। लेकिन वह भी कोई वैचारिक विरोध नहीं था और न अकेले शिंदे का उद्यम था। वह विभाजन डिजाइन किया था भारतीय जनता पार्टी ने। यानी एक बाहरी ताकत काम कर रही थी, जिसने शिव सेना का विभाजन कराया। पार्टी के अंदर रह कर विरोध करने, सवाल उठाने और उसके बाद अलग होकर अपनी राजनीति करने वाले ‘बागी’ या ‘युवा तुर्क’ कहे जाएंगे।

इसकी भी मिसाल भारतीय राजनीति में है कि नेता ने जब अपना मूल राजनीतिक दल छोड़ा तो उस दल के चुनाव चिन्ह पर वह जिस सदन का सदस्य चुना गया था वहां से भी इस्तीफा दिया। नीतीश कुमार से विवाद होने पर तत्कालीन राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दिया था। सही अर्थों में उनको ‘बागी’ कहा जाएगा। उन्होंने उसके बाद बांका सीट से निर्दलीय लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते।

इसी तरह 1980 में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा का इंदिरा गांधी और संजय गांधी से विवाद हुआ और बहुगुणा ने कांग्रेस छोड़ी तो गढ़वाल की लोकसभा सीट भी छोड़ दी। बाद में वहां उपचुनाव हुआ और कांग्रेस के सारी ताकत लगाने के बावजूद बहुगुणा जीत कर आए। तभी बहुगुणा ‘बागी’ कहलाएंगे। अगर सचमुच तृणमूल कांग्रेस या शिव सेना छोड़ने वाले सांसद और विधायक चाहते हैं कि उनको ‘बागी’ कहा जाए तो वे लोकसभा और विधानसभा से इस्तीफा दें और उपचुनाव में जीत कर आएं।

सोचें, बगावत का सिद्धांत कितना सुविधा वाला हो गया है कि ममता बनर्जी के राज्यसभा सांसद इस्तीफा दे रहे हैं या भाजपा उनसे इस्तीफा करा रही है क्योंकि उसे पता है कि विधानसभा में भाजपा का इतना बड़ा बहुमत है कि दोबारा जीता कर राज्यसभा भेज देंगे। लेकिन उसी पार्टी के लोकसभा सांसदों और विधायकों का इस्तीफा नहीं कराया जा रहा है। उनका अलग गुट बनाया जा रहा है और उनको ‘बागी’ नेताओं का गुट कहा जा रहा है। असल में यह दलबदलू नेताओं का गुट है, जो अपनी पार्टी के नेता की लोकप्रियता के दम पर जीते थे।

पता नहीं प्रधानमंत्री इनको परजीवी क्यों नहीं कह रहे हैं? बहरहाल, अब यही समय है। अब दलबदलू ‘बागी’ कहे जाएंगे। हालांकि इससे उनकी वास्तविक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। वैसे ही जैसे ‘विकलांग’ को ‘दिव्यांग’ कहने से उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और न ‘हाउसवाइफ’ के लिए ‘होममेकर’ शब्द इस्तेमाल करने से कुछ बदला है। बेरोजगारों को ‘आकांक्षी युवा’ कहा जाने लगा है। लेकिन इससे क्या बदल जाएगा, रहेगा तो वह बेरोजगार ही! यह भाषा से भ्रमजाल रचने का प्रयास है, जिस पर जॉर्ज ऑरवेल और नोम चोमस्की दोनों ने बहुत विस्तार से लिखा है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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