राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

पीएम ने माफी दी है, पार्टी ने नहीं!

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल ‘जेन जी’ यानी 14 से 29 साल की उम्र के छात्रों व युवाओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा दिल दिखाते हुए माफ कर दिया था। हालांकि कायदे से प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और अन्य मंत्रियों, अधिकारियों आदि को माफी मांगनी चाहिए थी। आखिर नीट यूजी का पेपर लीक होने से 23 लाख के करीब छात्रों और उनके परिजनों को बेहिसाब परेशानियों का सामना करना पड़ा था। उन्हें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक तीनों तरह की परेशानी हुई थी। उस पर किसी ने माफी नहीं मांगी थी और न खेद जताया था। जब छात्र और युवा इसका विरोध करने के लिए जंतर मंतर पर जमा हुए तो पुलिस ने उन पर लाठियां चलाईं, आंसू गैस के गोले छोड़े, पैलेट गन से फायरिंग की, छात्रों को ऑनलाइन अपनी बात कहने और समर्थन जुटाने से रोकने के लिए इंटरनेट बंद किए गए, समर्थकों को जंतर मंतर पहुंचने से रोकने के लिए मेट्रो स्टेशन बंद किए गए, फूड डिलीवरी एप्स को बंद कराने का प्रयास हुआ और इस पर भी किसी ने खेद

नहीं जताया।

सो, कायदे से तो सरकार की ओर से एक माफी बनती थी। लेकिन प्रधानमंत्री ने बड़ा दिल दिखाते हुए बच्चों को माफ करने का फैसला किया। उन्होंने एक वीडियो बना कर इसका ऐलान किया। यह कहते हुए उन्होंने माफी दी कि वे नहीं चाहते हैं कि बच्चों को कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़ें। बच्चों ने इसे भी स्वीकार कर लिया। उन्होंने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए प्रधानमंत्री के पांचों वीडियो को देखा और उसे लाइक भी किया। हालांकि उसे लेकर भी सोशल मीडिया में निगेटिव धारणा बनाई गई लेकिन मोटे तौर वीडियो जितना देखा गया और उन्हें जितने लाइक्स मिलें उनसे लग रहा है कि छात्रों व युवाओं ने प्रधानमंत्री की अपील और उनकी पहल को कुछ हद तक सकारात्मक रूप से लिया। यह भी कह सकते हैं कि पारंपरिक रूप से भाजपा का समर्थक वर्ग, जो तात्कालिक कारणों से नाराज था उसने इसे सकारात्मक रूप से लिया।

इसके बावजूद छात्रों और युवाओं की परेशानियां बनी हुई हैं और ऐसा लग रहा है कि यह माफी सिर्फ प्रधानमंत्री की ओर से निजी तौर पर दी गई है। भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा के नेताओं ने ‘जेन जी’ को माफ नहीं किया है। जो नेता संसद में पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान ‘जेन जी’ के शब्दकोष से शब्द लेकर बोल रहे थे वे भी सिर्फ जुबानी जमा खर्च कर रहे थे। किसी ने भी बच्चों को दिल से माफ नहीं किया है। पिछले तीन दिन में देश भर में जो घटनाक्रम हुए हैं और छात्रों व युवाओं को जिस तरह की प्रतिक्रिया झेलनी पड़ रही है उसे देख कर लग रहा है कि भाजपा के नेता ‘जेन जी’ से बदला लेने और उन्हें सबक सिखाने के मूड में हैं।

भाजपा, उसके नेता और आरएसएस की जैसी प्रतिक्रिया है उसे देख कर तो ऐसा नहीं माना जा सकता है कि इन सब लोगों की इतनी हिम्मत हो गई है कि वे प्रधानमंत्री की लाइन से अलग हट कर राजनीति कर रहे हैं और बयान दे रहे हैं। तभी सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने जो माफी दी है वह निजी तौर पर दी है और उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं को अपनी निजी राय व्यक्त करने की छूट दी है? या क्या भाजपा और उसके संगठनों में अब इतना लोकतंत्र आ गया है कि उसके नेता प्रधानमंत्री की राय से अलग राय व्यक्त कर सकते हैं और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होगी? भाजपा की राजनीति को समझने वाले लोगों को इन सवालों का जवाब पता है।

बहरहाल, यह कितनी हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को माफ कर दिया लेकिन भाजपा की सांसद कंगना रनौत उनके लिए अपमानजनक विशेषणों का प्रयोग कर रही हैं। पहले तो उन्होंने पूरी पीढ़ी को ‘गटर जेनरेशन’ कह दिया था। बाद में भी उनकी प्रतिक्रिया लगभग ऐसी ही रही। भाजपा के बदजुबान नेता, रमेश बिधूड़ी जिन्होंने सांसद रहते लोकसभा के अंदर एक मुस्लिम सांसद के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्द बोले थे उन्होंने जंतर मंतर के प्रदर्शनकारियों को लेकर कहा कि वहां पंक्चर लगाने वाले ज्यादा थे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सह सरकार्यवाह अतुल लिमये ने इससे एक कदम आगे बढ़ कर प्रदर्शनकारी छात्रों व युवाओं को देशद्रोही करार दिया है। उन्होंने कहा है कि देश विरोधी और हिंदू विरोधी तत्वों का आंदोलन था। उन्होंने यह भी कहा कि सीजेपी के इस आंदोलन की केस स्टडी होनी चाहिए ताकि पता चले कि ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा लगाने वाले इस मंच पर कैसे पहुंचे।

निजी तौर पर नेताओं के बयानों को छोड़ दें तो महाराष्ट्र में भाजपा ने अपनी सहयोगी पार्टी शिव सेना के नेता एकनाथ शिंदे से इस बात के लिए माफी मांगने को कहा है कि उनकी पार्टी के नेता कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके के परिजनों से मिलने गए थे। असल में जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया और सरकार ने प्रदर्शनकारियों की सारी मांगें मान लीं, आदोलन खत्म हो गया, उसके बाद एकनाथ शिंदे की शिव सेना के विधायक और राज्य सरकार के मंत्री संजय शिरसाट ने अभिजीत दिपके के माता, पिता से मुलाकात की थी। उन्होंने उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई थी। भाजपा इस बात से नाराज है कि अभिजीत दिपके ने केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था फिर संजय शिरसाट क्यों उनके माता, पिता से मिलने गए थे। जाहिर है महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा ने दिपके और प्रदर्शनकारियों को माफ नहीं किया है। वह इतनी नाराज है कि सहयोगी पार्टियों के नेताओं का उनसे मिलना भी उसे मंजूर नहीं है।

इसी तरह छात्रों के आंदोलन को उग्र, हिंसक और अभद्र ठहराने के लिए पुलिसकर्मियों के परिजनों की प्रेस कॉन्फ्रेंस कराई गई। प्रदर्शन के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वीडियो फुटेज दिखाई गई, जिसमें छात्र पुलिसकर्मियों के ऊपर हमला कर रहे थे। घायल पुलिसकर्मियों के बच्चों से बयान दिलवाया गया। बाद में एक पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि निजी तौर पर उनको भी अधिकार है कि वे मुकदमा दर्ज करा सकें। यानी पुलिस के जो घायल लोग हैं वे निजी तौर पर छात्रों के ऊपर मुकदमा कर सकते हैं। सोचें, यह कितनी खतरनाक स्थिति है। पुलिस को विक्टिम की तरह पेश किया जा रहा है और कहा जा रहा है उसके लोग निजी तौर पर मुकदमा कर सकते हैं। क्या ऐसी सुविधा छात्रों को भी मिलेगी कि जिन पुलिसकर्मियों ने उनके ऊपर अत्याचार किया, बेवजह लाठियां मारीं, महिलाओं के निजी अंगों को निशाना बनाया उनके ऊपर मुकदमा कर सकें? पुलिस बनाम नागरिक का विवाद बनाना लंबे समय में देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करेगा।

असल में यह सब कुछ एक रणनीति के तहत हो रहा है। ये विरोधाभासी बयान एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा हैं। सरकार को यह कतई स्वीकार नहीं करना है कि उससे कोई गलती हुई है। ध्यान रहे धर्मेंद्र प्रधान ने भी अपने इस्तीफे में कहीं नहीं कहा है कि उनसे कोई गलती हुई है या वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं, जिसका उनको खेद है। यही संकेत प्रधानमंत्री के वीडियोज से भी निकलते हैं। सरकार शर्मिंदा नहीं है और न जिम्मेदारी ले रही है। जैसे धर्मेंद्र प्रधान ने बड़ा दिल दिखाते हुए इस्तीफा दिया वैसे ही प्रधानमंत्री ने बड़ा दिल दिखाते हुए छात्रों को माफी दी। दूसरी बात यह है कि सरकार को अपने ऐसे सम्रथकों को भी खुश रखना है, जो इस आंदोलन के पक्ष में नहीं थे। इसलिए दोनों तरफ की बातें कही जा रही हैं। प्रधानमंत्री बच्चों को माफ कर रहे हैं, संसद में ‘जेन जी’ की भाषा बोली जा रही है और संसद से बाहर भाजपा के नेता उसी ‘जेन जी’ की ऐसी तैसी किए हुए हैं। पुलिस ने भी अभी उनको पूरी राहत नहीं दी है।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment