मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का जो कानून बना है उस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। इस पर आने वाले फैसला दिलचस्प होगा। लेकिन उससे पहले सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सरकार के सामने एक बड़ा अहम मुद्दा उठाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर तीन सदस्यों की कमेटी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का फैसला करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ साथ एक कैबिनेट मंत्री होगा तो फिर हमेशा सरकार के पास दो का बहुमत होगा। फिर इसकी निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित हो पाएगी?
यही सवाल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष की दूसरी पार्टियों के नेताओं ने भी उठाए हैं। इन सबका कहना है कि अगर तीन सदस्यों की कमेटी में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के अलावा एक तटस्थ व्यक्ति हो तो फिर संतुलन बना रहेगा।
परंतु क्या सचमुच ऐसा है? देश की प्रीमियम जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति के पैनल में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के साथ देश के चीफ जस्टिस भी सदस्य होते हैं तो क्या इससे तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो जाती है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि पिछले ही दिनों सीबीआई के निदेशक के नाम पर विचार के लिए नियुक्ति पैनल की बैठक हुई थी, जिसकी कार्यवाही को लेकर राहुल गांधी ने सख्त ऐतराज जाहिर किया और अपना लिखित विरोध दर्ज कराया। लेकिन चीफ जस्टिस की ओर से ऐसा कुछ नहीं किया गया। प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस इस बात पर सहमत हुए कि मौजूदा निदेशक प्रवीण सूद को एक साल का और सेवा विस्तार दिया जाए। राहुल गांधी की असहमति
काम नहीं आई।
हालांकि उन्होंने जो मुद्दा उठाया था वह तार्किक रूप से सही था। उन्होंने कहा कि 60 से ज्यादा अधिकारियों के नाम दिए गए थे लेकिन उनकी पृष्ठभूमि और उनके बारे में कुछ भी विस्तार से नहीं बताया गया था। लेकिन इस आधार पर चीफ जस्टिस ने सवाल नहीं उठाया। अंत में उन अधिकारियों की बजाय मौजूदा निदेशक को सेवा विस्तार दिया गया। सीबीआई निदेशक को यह दूसरा सेवा विस्तार मिला है। सोचें, सेवा विस्तार की संस्कृति पर अदालतें कितनी बार नाराजगी जता चुकी हैं!
तभी सवाल है कि अगर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के पैनल में भी चीफ जस्टिस होंगे या कोई तटस्थ व्यक्ति जैसे कोई न्यायविद्, कानूनविद् या पूर्व चुनाव आयुक्त हो तब भी क्या स्थिति बदल जाएगी? तब क्या तीसरा सदस्य नेता प्रतिपक्ष के साथ मिल कर प्रधानमंत्री की पसंद को खारिज कर सकेगा? इसकी संभावना शून्य है। गौरतलब है कि जब चुनाव आयुक्त के तौर पर अरुण गोयल की नियुक्ति का विवाद हुआ था तब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तीन सदस्यों का एक पैनल बनाया था, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस को रखा गया था।
इसी फैसले में अदालत ने कहा था कि यह अस्थायी व्यवस्था है और तब तक काम करेगी. जब तक सरकार नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बनाती है। इसके बाद ही सरकार ने कानून बनाया और तीन सदस्यों के पैनल में चीफ जस्टिस की जगह एक कैबिनेट मंत्री को रख दिया गया। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
अव्वल तो इस कानून में कोई गड़बड़ी नहीं है। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भी ऐसे ही एक पैनल के जरिए होती है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री सदस्य होते हैं। वहां भी सरकार जिसे चाहती है उसे नियुक्त किया जाता है। सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के पैनल में जरूर चीफ जस्टिस हैं। लेकिन वहां भी कभी चीफ जस्टिस की ओर से सरकार की किसी पसंद पर कभी भी सवाल उठाने का इतिहास नहीं है। आमतौर पर तीसरा सदस्य सरकार के साथ सहमत होता है।
वैसे भी चुनाव आयुक्तों का मामला हो या सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हो या सीबीआई के निदेशक का चयन हो इसकी प्रक्रिया पूरी तरह से सरकार के हाथ में होती है। पहले तो सीधे सरकारें ही नियुक्ति करती थीं। अब पैनल के जरिए नियुक्ति होती है तब भी उससे पहले सरकार की मशीनरी इन पदों के लिए उपयुक्त लोगों की सूची तैयार करती है। वह सूची तैयार करने में नियुक्ति पैनल का कोई हाथ नहीं होता है। तभी अगर सरकार अपनी पसंद के लोगों की सूची बनाएगी तो पैनल के सदस्यों को उसी में से किसी को चुनना होगा। आदर्श स्थिति यह है कि ऐसे संवैधानिक या वैधानिक पदों पर तटस्थ या निरपेक्ष लोग आएं। लेकिन उसमें पैनल के तीसरे सदस्य से कोई मदद नहीं मिलेगी। अगर सरकार चाहेगी कि तटस्थ और निरपेक्ष लोग ही ऐसे पदों पर नियुक्त हों तभी ऐसा हो सकता है। अन्यथा नहीं होगा।
लेकिन इससे ज्यादा जरूरी बात यह है कि जिन लोगों को पैनल के द्वारा नियुक्त किया जाए उनका मोरल कम्पस किस डायरेक्शन में काम करता है। उनके अंदर लोकतंत्र, संविधान और अपने पद से जुड़े नियम, कानूनों के प्रति कितनी प्रतिबद्धता है यह ज्यादा अहम है। उनके अंदर न्यूनतम ईमानदारी का भाव है या नहीं यह अहम है। ध्यान रहे अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति भी पार्टी लाइन पर होती है। राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करता है। लेकिन जज नियुक्त होने के बाद वे पार्टी या नियुक्त करने वाले राष्ट्रपति के प्रति निजी स्वामीभक्ति में काम नहीं करते हैं। वे अमेरिका के लिए काम करते हैं। पिछले दिनों दुनिया ने देखा कि कैसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से नियुक्त किए गए तीन जजों ने ही रिपब्लिकन राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ आदेश दिया।
सो, असली सवाल यह है कि भारत में क्या नियुक्ति के बाद पद पर बैठने वाले व्यक्ति के अंदर ऐसी भावना आ सकती है? नहीं आ सकती है। क्योंकि उसको पता होता कि उसकी अनुकम्पा के आधार पर नियुक्ति हुई है और वह तभी तक पद पर बना रहेगा, जब तक अनुकम्पा बनी रहेगी। नियुक्तियों में से योग्यता के तत्व का लोप हो गया है। स्वामीभक्ति इकलौती योग्यता है। इसलिए वह हमेशा सत्ता का कृपाकांक्षी बना रहता है। उसकी न्यूनतम प्रतिबद्धता भी देश, संविधान या अपने पद से जुड़ी जिम्मेदारियों के प्रति नहीं होती है।
जब तक व्यक्ति के मन में न्यूनतम नैतिकता और ईमानदारी का भाव नहीं आएगा, तब तक कैसा भी पैनल बन जाए और उसमें किस को भी सदस्य बना लें, कोई फर्क नहीं पड़ना है। व्यक्ति के अंदर देश, संविधान और नागरिकों के प्रति निष्ठा और कर्तव्य की भावना होनी चाहिए। जैसे मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन शेख की खाला यानी मौसी ने अलगू चौधरी से कहा था कि. ‘बेटा क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे’, ऐसी भावना लोगों के मन में नहीं आएगी तब तक कुछ नहीं हो सकेगा। यहां किसी को ईमान की बात नहीं करनी है, सबको बिगाड़ का डर रहता है।


