जिसको देखिए वह कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी पर संदेह कर रहा है। उससे जुड़े लोगों की पृष्ठभूमि खोजी जा रही है। किसी के बारे में कहा जा रहा है कि वह एक समय में नरेंद्र मोदी का प्रशंसक था किसी के बारे में जानकारी दी जा रही है और वह आम आदमी पार्टी का सोशल मीडिया हैंडल करता था। किसी को राहुल गांधी का विरोध करने वाला बताया जा रहा है तो किसी को ब्राह्मण विरोधी ठहराया जा रहा है। सोचें, युवाओं का एक समूह इस समय का सबसे ज्वलंत मुद्दा उठा कर सरकार के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है। लेकिन जरूरी मुद्दे उठाने में असफल रहे लोग उनकी पृष्ठभूमि निकाल कर उनको निशाना बना रहे हैं।
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और तीनों प्रवक्ताओं सौरव दास, विजेता दहिया और आशुतोष रंका की पृष्ठभूमि खोज कर उनके ऊपर हमला किया जा रहा है। कांग्रेस का इकोसिस्टम इन लोगों को युवाओं व छात्रों का एजेंडा हाईजैक करने के लिए भाजपा की ओर से प्लांट किया गया बता रहे है तो भाजपा के नेता सीजेपी की तुलना अन्ना हजारे व अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से कर रहे हैं और इसे अर्बन नक्सल समूह कह रहे हैं।
सवाल है कि इस समूह और इसके आंदोलन को वर्तमान हालात से पैदा हुए असंतोष और युवाओं की बेचैनी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया क्यों नहीं माना जा सकता है? यह मानने में क्या समस्या है कि आज किशोर और युवा परीक्षा में हो रही गड़बड़ियों और नौकरी व रोजगार की घटती संभावनाओं की वजह से परेशान हैं और इसलिए उन्हें एक प्लेटफॉर्म मिला तो वे वहां से अपनी परेशानी का इजहार कर रहे हैं? अभिजीत दीपके या सीजेपी से जुड़े दूसरे लोगों ने किशोरों और युवाओं को अपनी नाराजगी और असंतोष जाहिर करने का एक मंच दिया है, जहां से वर्तमान समय की सबसे ज्वलंत समस्या को उठा रहे हैं। सीजेपी के लोग पेपर लीक का विरोध कर रहे हैं, सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं की शुचिता बहाल करने की मांग कर रहे हैं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे हैं। इन मांगों से भला विपक्ष की पार्टी या नेता को क्या समस्या हो सकती है? युवाओं का यह समूह भाजपा की विभाजनकारी राजनीति को भी निशाना बना रहा है। इसलिए आप इसे सांप्रदायिक भी नहीं कह सकते हैं।
तभी सवाल है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि सीजेपी के आंदोलन को विपक्ष, खास कर कांग्रेस पार्टी अपनी विफलता के तौर पर देख रही हो और इस वजह से इनको निशाना बनाया जा रहा हो? यह संभव है क्योंकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस इतने बड़े मुद्दे पर इस तरह का कोई आंदोलन नहीं खड़ा कर सकी इसलिए सीजेपी को मौका मिला। अगर कांग्रेस युवाओं के असंतोष को आवाज दे रही होती और उस असंतोष को प्रकट करने का मंच दे रही होती तो शायद सीजेपी जैसे किसी समूह की जरुरत नहीं पड़ती। ध्यान रहे सीजेपी अभी तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बना एक अकाउंट भर है। उसके पास न कोई संगठन है, न कोई बड़ा चेहरा है और न किसी राजनीतिक अभियान को चलाने का प्रशिक्षण या अनुभव है।
फिर भी उस मंच से करोड़ों युवा जुड़े और उसके आह्वान पर हजारों लोग 40 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतरे। कहने को कह सकते हैं कि राहुल गांधी ने लगातार सोशल मीडिया में पोस्ट लिखी और प्रभावित छात्रों से मुलाकात की लेकिन यह समझने की जरुरत है कि समस्या जितनी बड़ी है उसके मुकाबले कांग्रेस का प्रयास बहुत छोटा और सुविधाजनक है। ड्राइंग रूम में बैठ कर 18 साल के छात्र से बात करना और उसकी वीडियो साझा करके सरकार पर हमला करना बहुत आसान है।
बहरहाल, जंतर मंतर पर प्रदर्शन के लिए इकट्ठा हुए लोगों की संख्या असल में कितनी थी, किसके साथ ज्यादा भीड़ आई, किसका भाषण कैसा हुआ, कितनी देर प्रदर्शन चला, कौन जल्दी चला गया, किसको गर्मी लग रही थी और किसको एसी में बैठना था इन बातों का कोई मतलब नहीं है। जंतर मंतर पर यह तस्वीर दिखी कि हजारों लोग इकट्ठा हुए, जिनमें परीक्षा की गड़बड़ियों और पेपर लीक से परेशान छात्र थे तो नौकरी नहीं मिलने से परेशान युवा भी थे और रोजगार की घटती संभावना से बेचैन अधेड़ लोग भी थे। मुख्यधारा की मीडिया ने भले इसका बहिष्कार किया लेकिन राजधानी और आसपास के क्षेत्रों के तमाम छोटे बड़े यूट्यूबर वहां मौजूद थे। उन्होंने इसे अपने अपने हिसाब से कवर किया और देश के हर हिस्से में करोड़ों लोगों ने इसे देखा। किसी राजनीतिक या सामाजिक घटनाक्रम में लोगों में ऐसी उत्सुकता अरसे बाद देखने को मिली। किसान आंदोलन के बाद पहली बार ऐसे संगठित प्रतिरोध का स्वर पहली बार सुनाई दिया।
अभी इसको इसी रूप में देखने की जरुरत है, जब तक कि कोई दूसरी बात प्रमाणित नहीं हो जाती है। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इसे इसी रूप में देखा तो सीपीआई माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और सीपीआई की एनी राजा ने भी इसे ऐसे ही देखा। उनको लग रहा है कि युवाओं का एक समूह एक जरूरी मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहा है तो उसका साथ देना चाहिए। राजनीतिक और वैचारिक असहमति अपनी जगह है। विपक्ष की ईमानदारी भी इसमें है कि परीक्षाओं में हो रही गड़बड़ी के खिलाफ जो आंदोलन हो रहे हैं, सरकार को जवाबदेह बनाने का जो प्रयास हो रहा है, जिम्मेदार लोगों को पद से हटाने की जो मांग हो रही है, उसके समर्थन में खड़ा हो।
लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता और उसके इकोसिस्टम के लोग इस पर संदेह पैदा कर रहे हैं और इसकी साख खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसी कोशिशों से सरकार को फायदा होगा। युवाओं में अनिश्चितता और संशय बढ़ेगा। उनके भीतर असहायता पनपेगी कि उनका साथ देने वाला कोई नहीं है। यह संशय और अविश्वास अंततः उन्हें सत्तापक्ष की बातों पर भरोसा करने के लिए प्रेरित करेगा। अगर राजनीतिक नजरिए से भी देखें तो कांग्रेस को समझना चाहिए कि जिस तरह से उसकी सरकार के खिलाफ इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन चला और लोगों के बीच बने माहौल का लाभ अपने मजबूत संगठन के दम पर भाजपा ने उठाया वैसे ही अभी कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से बनाए जा रहे माहौल का लाभ कांग्रेस उठा सकती है। कांग्रेस को अपने आप को इसके लिए तैयार करना चाहिए। ध्यान रहे भाजपा और उसके सहयोगियों ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन को परदे के पीछे से समर्थन दिया था, जबकि अभी एनडीए सरकार को सबसे अधिक मुश्किल में डालने वाले आंदोलन का कांग्रेस विरोध कर रही है!
असल में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन जिस अंजाम को प्राप्त हुआ उसने लोगों को आशंकित बना दिया है। लोग हर चीज पर शंका करने लगे हैं। दूसरी ओर केंद्र में सत्तारूढ़ लोगों ने पिछले 12 साल में ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिसमें हर तरह की असहमति को शत्रुता मानने का चलन बढ़ा है। प्रतिरोध की हर आवाज को साजिश बताया जाने लगा है। हर आंदोलन को किसी बाहरी टूलकिट का उद्यम माना जाने लगा है। किसानों और युवाओं से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक के आंदोलन के पीछे साजिश देखी जाती है। ऐसे ही कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम के लोग भी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन को साजिश का नतीजा मान रहे हैं।
उनको लग रहा है कि यह समूह विपक्ष का स्पेस ले रहा है। यह भी कहा जा इस समूह ने सारी जिम्मेदारी ले देकर धर्मेंद्र प्रधान पर ला दी, जिससे सरकार को राहत मिल जाएगी। लेकिन इन बातों का कोई मतलब नहीं है। राहुल गांधी भी सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का ही इस्तीफा मांग रहे हैं। दूसरे, कांग्रेस को स्पेस छिन जाने की चिंता नहीं करनी चाहिए। वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और सत्ता विरोधी माहौल का सबसे बड़ा लाभ भी उसी को मिलेगा। भाजपा और उसके समर्थकों की चिंता भी अपनी जगह जायज है लेकिन हिट मार कर या चप्पल मार कर कॉकरोच खत्म कर देने वाली तुलना अपने युवाओं के लिए करना बहुत खराब है।


