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सरकार सीधे टैक्स मंत्रालय ही बना ले!

अब समय आ गया है कि वित्त, वाणिज्य, उद्योग आदि से अलग सरकार एक टैक्स का मंत्रालय बनाए। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई के जरिए होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की सरकार की घोषणा के बाद यह आवश्यकता ज्यादा अनिवार्य रूप से प्रकट हुई है। सरकार इसे शुल्क कह रही है लेकिन असल में यह टैक्स ही है, जिसका भुगतान किसी न किसी रूप में आम नागरिक को करना है। सोचें, कितना दूरदर्शी था वह व्यक्ति, जिसने कहा था कि दुनिया में दो ही चीजें सत्य हैः एक मृत्यु और दूसरा टैक्स। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस वाक्य को अमर कर दिया है। टैक्स ही अंतिम सत्य है। अब कोई चीज ऐसी नहीं बची है, जिस पर टैक्स नहीं है।

सरकार कहती है कि उसने एक देश, एक टैक्स का नियम यानी जीएसटी लागू कर दिया है लेकिन वास्तविकता यह है कि देश के हर नागरिक को अब भी दर्जनों टैक्स देने होते हैं। चाहे वह आयकर के रूप में हो, जीएसटी के रूप में हो, वैट के रूप में, सेस या सरचार्ज के रूप में हो या टोल के रूप में हो या किसी सेवा शुल्क के रूप में हो।

सोचें, सरकार ने यूपीआई को एक तकनीकी मार्बल के रूप में कितना प्रचारित किया था! इसे भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया गया और इसे शुल्क मुक्त रखने का ऐलान भी किया गया। लेकिन सरकार ने अब इस पर भी शुल्क लगा दिया है। इसके लिए आंकड़ों को जिस तरह से तोड़ा मरोड़ा गया है वह अभूतपूर्व है। कहा गया कि यूपीआई से होने वाला 96 फीसदी लेनदेन दो हजार रुपए से कम का होता है, जिस पर सरकार कोई शुल्क नहीं लगा रही है। सिर्फ चार फीसदी लेनदेन पर शुल्क लगेगा, वह भी सिर्फ 0.40 फीसदी होगा और उसकी भी अथिकतम सीमा तीन सौ रुपए होगी।

हालांकि वास्तविकता यह है कि चार फीसदी लेनदेन का मूल्य 66 फीसदी है। जो 96 फीसदी लेनदेन होता है उसका मूल्य केवल 34 फीसदी है। कुल 314 लाख करोड़ रुपए के ट्रांजेक्शन में 207 लाख करोड़ का लेनदेन चार फीसदी ट्रांजेक्शन से हुआ है। इस रकम के ऊपर शुल्क या टैक्स लगाया जाएगा।

सवाल है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर 0.40 फीसदी की दर से और तीन सौ रुपए की अधिकतम सीमा लगा कर भी शुल्क क्यों लगाना है? इसकी जरुरत बताते हुए सवाल उठाया जा रहा है कि कोई भी सेवा कितने समय तक मुफ्त में दी जा सकती है? कहा जा रहा है कि इसके रखरखाव पर और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करने पर खर्च होता है। इसलिए ज्यादा समय तक मुफ्त में सेवा नहीं दी जा सकती है। सवाल है कि क्या यूपीआई की सेवा मुफ्त है? ऐसा नहीं है। यूपीआई का संचालन करने वाली संस्था नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यीनी एनपीसीआई मुनाफा कमाने वाली संस्था है।

उसे यूपीआई के संचालन में घाटा नहीं होता है। उसे कई तरह की डिजिटल भुगतान सेवाओं के लिए बैंकों, एप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से पैसा मिलता है। लेकिन चूंकि एनपीसीआई एक गैर लाभकारी संस्था यानी नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर बनी है इसलिए उसकी कमाई को मुनाफा नहीं, बल्कि सरप्लस कहा जाता है। सिर्फ यूपीआई को लें तो एनपीसीआई का खर्च तीन हजार करोड़ रुपए से कुछ कम है और उसकी कमाई इससे ज्यादा है। पिछले साल तो उसने अपनी कमाई पर केंद्र सरकार को एक हजार करोड़ रुपए का टैक्स दिया है। अगर पूरी डिजिटल बैंकिंग को शामिल करें तो खर्च 20 हजार करोड़ रुपए के करीब होता है। लेकिन बैंकों को होने वाली कमाई के मुकाबले यह रकम कुछ भी नहीं है।

देश के सभी बैंकों की एक वित्तीय वर्ष की साझा कमाई लगभग 4.11 लाख करोड़ रुपए है। रिजर्व बैंक की कमाई का आंकड़ा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिजर्व बैंक ने इस साल अपनी कमाई से केंद्र सरकार को जो लाभांश दिया है वह 2.87 लाख करोड़ रुपए का है। इस प्रत्यक्ष कमाई के अलावा इकोनॉमी के ऑर्गेनाइज्ड होने से ज्यादा लेनदेन आधिकारिक रूप से हो रहा है, जिस पर सरकार को टैक्स मिल रहा है। नकद लेनदेन में बहुत पैसा काले धन की अर्थव्यवस्था में चला जाता था। तभी सवाल है कि जब लाखों करोड़ रुपए की कमाई बैंकों को है और टैक्स की कमाई सरकार को है तो फिर डिजिटल बैंकिंग पर होने वाले खर्च के लिए अलग से नागरिकों से पैसा वसूलने की क्या तुक है?

सरकार कह रही है कि चार फीसदी ट्रांजेक्शन पर जो 0.40 फीसदी शुल्क है वह भी जनता को नहीं देना है, बल्कि व्यापारी देगा। सोचें, कभी ऐसा हुआ है कि सरकार किसी उत्पाद या सेवा पर शुल्क लगाए तो उसका भुगतान व्यापारी करे? व्यापारी हर शुल्क ग्राहक से ही वसूलता है। चाहे वह सरचार्ज लगा कर वसूले या वस्तु व सेवा की कीमत बढ़ा कर वसूले। अंततः भुगतान जनता को ही करना होता है। सो, यह जनता के ऊपर एक नया टैक्स है। असल में सरकार को हर उत्पाद और हर सेवा पर टैक्स वसूलना है। उसे लग रहा है कि हर देश में औसतन 24 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हो रहे हैं और भारत की पूरी जीडीपी से थोड़ा ही कम ट्रांजेक्शन यूपीआई के जरिए हो रहा है तो इसका मतलब है कि लोगों के पास पैसे हैं इसलिए लोगों से टैक्स वसूला जाए। ध्यान रहे भारत की जीडीपी 360 लाख करोड़ रुपए के करीब है और यूपीआई का सालाना ट्रांजेक्शन 314 लाख करोड़ है।

यूपीआई के ट्रांजेक्शन पर शुल्क लगाना व्यापक रूप से भारत सरकार के जन विरोधी रुख को दिखाता है और साथ ही यह भी दिखाता है कि उसके पास राजस्व बढ़ाने का टैक्स लगाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। सरकार कोई और उपाय नहीं कर पा रही है। बाहर से निवेश नहीं आ रहा है। सारे प्रयास के बावजूद विनिर्माण सेक्टर मजबूत नहीं हो रहा है। निर्यात का इकोसिस्टम बहुत कमजोर है और दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है। अकेले चीन और रूस को मिला कर करीब 15 लाख करोड़ रुपए का व्यापार घाटा है। तभी घूम फिर कर सरकार टैक्स लगा देती है। एक व्यक्ति को कई कई बार टैक्स देना पड़ता है। आय़कर चुकाने के बाद की आमदनी से कुछ भी खरीदने पर कई तरह के टैक्स देने होते हैं। किसी भी उत्पाद या सेवा को लें तो दिखाई देगा कि एक सेवा या एक उत्पाद पर कितने टैक्स देने होते हैं।

मिसाल के तौर पर कोई व्यक्ति गाड़ी खरीदता है तो उसे जीएसटी, रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन शुल्क, पेट्रोल या डीजल का शुल्क, रोड इंफ्रास्ट्रक्टर सेस और फिर टोल टैक्स देना होगा। ऐसे ही किसी व्यक्ति के बिजली का बिल देखें तो पता चलेगा कि जितना एनर्जी चार्ज है लगभग उतना ही टैक्स है। वह टैक्स कई तरह का होगा। एनर्जी चार्ज पर तो जीएसटी देना ही है उसके अलावा मीटर का फिक्स्ड चार्ज और पावर परचेज एग्रीमेंट का चार्ज और इन दोनों पर जीएसटी अलग है। किसी भी उत्पाद या सेवा के बिल में इस तरह टैक्स की मौजूदगी को देखा जा सकता है। तभी सरकार को गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए कि जब सब कुछ टैक्स ही है तो एक टैक्स मंत्रालय बना दिया जाए और वहां ऐसा मंत्री नियुक्त किया जाए, जो खुर्दबीन लेकर यह खोजे कि कहां कहां अभी तक टैक्स नहीं लगा है और वहां टैक्स लगाए।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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