आदित्य शर्मा, उम्र 23 साल। शिवानंद चौरसिया, उम्र 37 साल। पटनाला सुरेश, उम्र 44 साल। ये तीन नाम हैं उन भारतीय नाविकों के, जो पालाऊ के झंडे वाले जहाज एमटी सेत्तबेलो पर सवार थे, जिस पर अमेरिकी नौसेना ने मिसाइल से हमला किया और जहाज को डूबने के लिए छोड़ दिया। जहाज के नाविक बचाने की अपील करते रहे लेकिन अमेरिका ने किसी को निकालने की कोशिश नहीं की। ओमान के तटरक्षकों ने वहां पहुंच कर कई नाविकों को बचाया लेकिन आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया और पटनाला सुरेश इतने भाग्यशाली नहीं थे। अमेरिका की ओर से जान बूझकर किए गए हमले में उनकी मौत हो गई। तीन बेशकीमती जिंदगियां समाप्त हो गईं। लेकिन उसके बाद जो हुआ उससे एक स्वतंत्र, संप्रभु और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में भारत की साख भी डूब गई।
इतनी बड़ी घटना पर भारत की प्रतिक्रिया इतनी साधारण थी, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। भारत ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के कार्यकारी राजदूत को बुला कर आपत्ति जताई। आठ जून के पहले हमले के बाद भारत ने 10 जून को आपत्ति जताई। लेकिन उसके अगले दिन 11 जून को अमेरिकी नौसेना ने गिनी बिसाऊ के झंडे वाले एक और टैंकर पर हमला कर दिया, जिसके चालक दल में 20 भारतीय थे। फिर भारत ने दोबारा वैसी ही आपत्ति दर्ज कराई, जैसी 10 जून को कराई थी। इसके बाद खबर आई कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से बात की और सख्त आपत्ति जताई। हालांकि बाद में जारी अमेरिकी बयान में भारत की ओर से आपत्ति जताने की बात नहीं कही गई। उलटे यह कहा गया कि जो भी जहाज अरब सागर में अमेरिकी नाकाबंदी का पालन नहीं करेगा उस पर हमला होगा।
इस तरह अमेरिका ने अपने हमले को जायज ठहराया। उसने कहा कि जहाज उसके आदेश का पालन नहीं कर रहे थे इसलिए उसने हमला किया। सबसे पहला सवाल तो यही है कि अमेरिका किस हैसियत से आदेश दे रहा था? क्या अरब सागर की नाकाबंदी संयुक्त राष्ट्र संघ के किसी प्रस्ताव के तहत की गई है? अगर संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव नहीं है तो कोई भी देश, कितना भी शक्तिशाली हो उसे किसी अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में नाकाबंदी का क्या अधिकार है? ईरान ने होर्मुज की खाड़ी में नाकाबंदी की है तो सारी दुनिया उसकी आलोचना कर रही है। लेकिन अमेरिका ने पूरे अरब सागर में नाकाबंदी कर दी और कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है! वास्तविक स्थिति यह है कि अमेरिका ने अवैध रूप से नाकाबंदी की है, जहाजों पर उसका हमला अवैध है, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है और अपराध है, जिसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
यह सिर्फ आपत्ति दर्ज कराने का मामला नहीं है, बल्कि जवाबदेही तय कराने का मामला है। इतनी बड़ी घटना पर भारत को अमेरिका से कम से कम तीन काम कराने चाहिए। पहला, अमेरिका बिना शर्त माफी मांगे। दबाव तो इस बात का होना चाहिए कि सीधे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप माफी मांगें। दूसरा, पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हों और जिम्मेदार सैनिकों पर सख्त कार्रवाई हो। उससे पहले उनको निलंबित किया जाए। और तीसरा, मारे गए मरीन मर्चेंट्स के लिए अमेरिका बहुत बड़ा मुआवजा दे।
ध्यान रहे जो मजबूत और स्वाभिमानी राष्ट्र होते हैं वो अपने देश के हित, राष्ट्र के सम्मान और नागरिकों की जिंदगी के लिए खड़े होते हैं। जरूरी नहीं है कि वे आर्थिक और सैन्य रूप से बहुत ताकतवर हों, बल्कि उसके नेता के अंदर स्वाभिमान की भावना और राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए। साहस होना चाहिए और कूटनीति व रणनीति की समझ होनी चाहिए।
ध्यान रहे 1999 में चीन कोई बड़ी ताकत नहीं था और उस समय के अमेरिका के सामने उसकी कोई हैसियत भी नहीं थी। उसकी अर्थव्यवस्था सिर्फ एक ट्रिलियन डॉलर की थी। लेकिन उसने एक घटना पर अमेरिका को घुटनों पर ला दिया था। युगोस्लाविया के बेलग्रेड में चीन के दूतावास पर एक अमेरिकी मिसाइल गिर गई थी, जिसमें तीन चीनी पत्रकार मारे गए थे। इस घटना पर चीन ने जो किया वह एक मिसाल है। चीन ने तत्काल अमेरिका से कूटनीतिक संबंध रोक दिए। चीन के दबाव में अमेरिका को इस घटना पर कई बार माफी मांगनी पड़ी।
अमेरिका ने अलग माफी मांगी और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अलग निजी तौर पर माफी मांग कर मामले को ठंडा किया। इतना ही नहीं चीन ने अमेरिका से 32.5 मिलियन डॉलर यानी सवा तीन करोड़ डॉलर का मुआवजा लिया। इसमें साढ़े चार मिलियन डॉलर के करीब मुआवजा तीन मारे गए पत्रकारों के लिए था। अगर आज तीन भारतीय नाविकों के परिजनों को इतना मुआवजा मिले तो प्रति परिवार करीब 15 करोड़ रुपए मिलेंगे।
चीन ने अमेरिका के साथ जो 1999 में किया वह भारत उससे पहले दो बार कर चुका था। भारत ने 1971 में अमेरिका के तमाम दबावों को दरकिनार करके बांग्लादेश को आजाद कराया था। सब जानते हैं कि उस समय भारत की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता कितनी कमजोर थी और अमेरिका कितना बड़ा था। फिर भी भारत ने उसकी धमकी पर ध्यान नहीं दिया। अमेरिका ने हिंद महासागर में परमाणु हथियार से लैस सातवां बेड़ा उतार दिया। फिर भी भारत ने परवाह नहीं की। उसने लड़ाई जारी रखी और 13 दिन के शानदार अभियान के बाद बांग्लादेश को आजाद कराया। इसी तरह 1998 में अमेरिका की पाबंदियों की चेतावनी को दरकिनार करके पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। तब भी भारत की आर्थिक व सैन्य शक्ति अमेरिका के मुकाबले कुछ नहीं थी।
इसके उलट आज भारत को महाशक्ति बताया जा रहा है। सरकार के बड़े नेता विश्वगुरू होने का दावा कर रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री कहते हैं कि अब विश्व मंच पर भारत की आवाज ज्यादा सम्मान से सुनी जाती है। एक बहुत बड़े नेता ने तो यहां तक कहा कि दुनिया में अब कोई भी बड़ा फैसला मोदीजी से पूछे बगैर नहीं होता है। दावा किया जाता है कि मोदी ने दुनिया के नेताओं को अपना दोस्त बनाया है। इस नैरेटिव से प्रभावित होकर एक नौजवान ने रील बनाई, जो बहुत वायरल हुई, जिसमें वह अमेरिका से कहता है कि ‘तू क्या है’। इन बातों में सचाई कम है लेकिन यह हकीकत है कि आज भारत 1971 और 1998 के मुकाबले बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति है। इसके बावजूद अमेरिका ने हमारे तीन नागरिकों को मार दिया और हमने आपत्ति जताने की औपचारिकता पूरी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। यह आचरण विश्व गुरू और महाशक्ति तो छोड़िए किसी भी सामान्य संप्रभु राष्ट्र के आचरण के लिए भी उचित नहीं है।


