एक शेर है कि ‘सैफ अंदाज ए बयां से बदल जाती है बात, वरना इस दुनिया में कोई बात नई बात नहीं होती’। गालिब ने भी कहा है कि उनका अंदाज ए बयां बाकी सुखनवरों से अलग है। कहने का मतलब है कि बात भले नई नहीं हो लेकिन अगर उसे अलग अंदाज में कहा जाए तो सुनने वाले को अच्छा लगता है और संदेश दूर तक जाता है। परंतु राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष के समापन समारोह में मंगलवार, 20 अक्टूबर को जो कहा उसमें न तो कुछ नया था और न कहने का अंदाज अलग था। उनके भाषण में मुख्य रूप से दो बातों पर जोर दिया गया। पहली, भारत में हो रहे प्रदर्शन देश विरोधी ताकतों की साजिश हैं और दूसरी, दुनिया के कुछ देश भारत की बढ़ती ताकत से जलते हैं और इसे पसंद नहीं करते इसलिए साजिश के तहत भारत में माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। ये दोनों बातें भाजपा के प्रवक्ता हर जगह कह रहे हैं।
भाजपा के नेता कह रहे हैं और संघ प्रमुख ने भी दोहराया कि दुनिया के कुछ देश भारत की तरक्की से जलते हैं और इसे पसंद नहीं कर रहे हैं। यह बहुत पुराना नैरेटिव है। कांग्रेस का शासन रहा हो या समाजवादियों का या भाजपा का, हर सरकार विदेशी साजिश के आरोप लगाती रही है। आमतौर पर अपनी कमियों को ढकने और जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए सरकारें इस नैरेटिव का इस्तेमाल करती हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि दुनिया के देश एक दूसरे के खिलाफ साजिश नहीं करते हैं। अमेरिका और रूस का शीतयुद्ध सारी दुनिया जानती है। इस समय भी अमेरिका और चीन एक दूसरे से दोस्ती भी दिखा रहे हैं और दांवपेंच भी चल रहे हैं। पश्चिम एशिया के देशों के बीच कूटनीतिक और सैन्य दोनों टकराव चल रहा है। उत्तर व दक्षिण कोरिया के बीच हर तरह की साजिशें चल रही हैं। चीन और जापान टकराने की हद तक तनाव में हैं। पूर्वी एशिया के कई अन्य देश भी चीन की साजिशों से परेशान हैं। अगर यह बताने बैठा जाए कि कौन सा देश किसी देश के खिलाफ और देशों का कौन सा समूह किसके खिलाफ साजिश कर रहा है तो कई पन्ने भर जाएंगे। लेकिन भारत में इस बात को ऐसे कहा जा रहा है, जैसे यह कोई अद्वितीय या अभूतपूर्व बात है, जैसे पहले कभी किसी देश के साथ ऐसा नहीं हुआ है।
अगर भारत की ही बात करें तो पाकिस्तान राष्ट्र नीति के तौर पर आतंकवाद को प्रश्रय देता है और भारत के खिलाफ छद्म युद्ध चलाता है। सारी दुनिया इस बात को जानती है। लेकिन संघ प्रमुख उसका जिक्र नहीं कर रहे थे। वे बहुत अमूर्त अंदाज में कह रहे थे। फिर भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे अमेरिका की बात कर रहे थे, जहां हाल के दिनों में वे लंबे प्रवास पर गए थे और वहां के भारतवंशियों को यह नसीहत देकर आए थे वे जिस देश में रहते हैं उसका सम्मान करें और उसके सच्चे नागरिक बन कर काम करें। दूसरी ऐसी ताकत चीन हो सकता है, जिसे भारत की तरक्की पसंद नहीं हो। अब इस नैरेटिव में दो बातों का जवाब तलाशना होगा। पहली बात तो यह कि भारत ने ऐसी क्या तरक्की की है, जिससे अमेरिका और चीन परेशान हो गए हैं और दूसरी अगर दो महाशक्तियां या कोई अन्य देश भी भारत के खिलाफ साजिश कर रहा है तो भारत क्या कर रहा है? वास्तविकता यह है कि भारत ने कोई खास तरक्की नहीं की है। भारत आज भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है। सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में शामिल है तो सबसे खराब स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था वाले देशों में भी शामिल है। मानव विकास सूचकांक के हर पैमाने पर भारत बहुत नीचे है। 80 करोड़ लोगों को तो सरकार खुद पांच किलो अनाज दे रही है।
सोचें, एक तरफ यह दावा किया जा रहा था कि भारत अब विश्वगुरू हो गया है, दुनिया में भारत का सम्मान पहले से ज्यादा हो गया है, दुनिया अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बात ज्यादा ध्यान से सुनती है और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो यहां तक दावा किया कि किसी भी बड़े मुद्दे पर दुनिया के देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राय के बगैर फैसला नहीं करते हैं। फिर इस रोने, कलपने का क्या मतलब है कि कुछ देश साजिश कर रहे हैं? जहां तक दूसरी बात का सवाल है तो अमेरिका, चीन या दूसरा कोई देश साजिश कर रहा है तब भी भारत कुछ नहीं कर रहा है। चीन के साथ भारत का व्यापार बढ़ रहा है और व्यापार घाटा भी बढ़ रहा है। दुनिया के सामरिक जानकार मान रहे हैं कि भारत अपनी आर्थिक जरुरतों के लिए खतरनाक रूप से चीन पर निर्भर होता जा रहा है। ऐसे ही अमेरिका एक निर्देश पर तेल खरीदने और बंद करने के फैसले करा रहा है। असल में विश्वगुरू होने के नैरेटिव की पोल धीरे धीरे खुल रही है। उसके बाद ही यह नैरेटिव लाया गया है कि दुनिया के देश भारत की तरक्की से जलते हैं और साजिश कर रहे हैं।
अब संघ प्रमुख की पहली बात पर ध्यान दें तो उसमें भी कुछ नया नहीं है। भारत में प्रदर्शन करने वालों और सरकार से असहमति रखने वालों को विदेशी एजेंट बताना भी सत्ता पक्ष का पुराना शगल है। जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया तो उनको अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एजेंट कहा गया था। तब संघ और जनसंघ सब जेपी के साथ थे और इस आरोप का विरोध किया था। लेकिन अब अपनी सत्ता के 12 साल हो गए तो हर प्रतिरोध, हर असहमति विदेशी साजिश लगने लगी है। चाहे किसानों का आंदोलन हो या पहलवानों का आंदोलन हो या नौजवानों का आंदोलन है। हर आंदोलन के पीछे विदेशी साजिश होने के आरोप लगाए गए। सोचें, यह कितनी हैरानी की बात है कि कॉकरोच जनता पार्टी के जून और जुलाई के प्रदर्शन के बाद देश में ‘जेन जी’ की चर्चा शुरू हुई तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में युवाओं के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने कहा कि यह पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से ज्यादा देशभक्त है और उसके दो महीने बाद युवाओं के आंदोलन को विदेशी ताकतों की साजिश बता रहे हैं! कह सकते हैं कि असहमति और प्रतिरोध को संभालने का कोई और तरीका नहीं सूझ रहा है तो उसे विदेशी साजिश बता कर डिसक्रेडिट करने का प्रयास किया जा रहा है।
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