राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

बंगाल से आगे विपक्ष का क्या रास्ता?

पश्चिम बंगाल पूर्वी भारत में भारतीय जनता पार्टी के लिए बंद गली का आखिरी दरवाजा था। भाजपा ने वह दरवाजा खोल लिया है। जहां भी भाजपा के लिए नया दरवाजा खुल रहा है वहां विपक्ष के लिए पूरी गली बंद हो जा रही है। यह सही है कि पिछले कुछ समय से सत्ता विरोध की बजाय सत्ता के समर्थन की चुनावी राजनीति देखने को मिल रही है। लेकिन एकाध अपवादों के अलावा भाजपा विरोधी पार्टियां इस राजनीति को ठीक तरीके से नहीं साध पाई हैं। दूसरी ओर भाजपा ने सत्ता में आने के बाद एंटी इन्कम्बैंसी को रोकने का अपना तरीका विकसित कर लिया है।

सत्ता में रह कर जैसे बाकी पार्टियां ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटती हैं वैसे भाजपा भी बांटती है लेकिन साथ साथ उसको एडवांटेज यह है कि उसके लिए हिंदुत्व की एक अंतर्धारा हमेशा चलती रहती है। विकास और कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ हिंदुत्व का जोड़ उसकी जीत को सुनिश्चित करता है। यह भी भाजपा का एडवांटेज है कि हिंदुत्व की राजनीति में उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है। कोई दूसरी पार्टी उस स्पेस में राजनीति नहीं करती है।

दूसरी ओर भाजपा विरोधी राजनीति के स्पेस में अनेक पार्टियां आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं। इसका लाभ भाजपा को मिलता है। पश्चिम बंगाल में भी यह देखने को मिला। कांग्रेस और वाम मोर्चा को जितने वोट मिले उतने ही वोट के अंतर से ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस हारी। हालांकि राजनीति में हमेशा अंकगणित कारगर नहीं होता है। उसके साथ केमिस्ट्री का होना भी जरूरी होता है। फिर भी अंकगणित का महत्व सबसे ज्यादा है और यह पिछले लोकसभा चुनाव में दिखा भी था, जब विपक्ष पार्टियां एकजुट होकर चुनाव लड़ीं तो भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल करने से रोक दिया।

भाजपा को 2024 में 63 सीटों का नुकसान हुआ था। इस समय यानी 18वीं लोकसभा में विपक्ष जितना मजबूत है उतना पहले कभी नहीं रहा है। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की जो एकता दिखाई दे रही है वह प्रादेशिक स्तर पर कायम नहीं रह पाती है। इसका कारण यह है कि तमाम प्रादेशिक पार्टियां भाजपा विरोधी राजनीति की केंद्रीय ताकत के तौर पर कांग्रेस को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

असल में भाजपा विरोध की राजनीति करने वाले अनेक पार्टियां कांग्रेस के वोट बैंक पर फली फूली हैं। हालांकि सभी पार्टियों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि समाजवादी राजनीति करने वाली पार्टियों का वजूद तब भी था, जब कांग्रेस एक मजबूत ताकत थी। उस समय भी देश की मझोली जातियों ने कांग्रेस का विरोध किया था और कांग्रेस व तत्कालीन जनसंघ से अलग दूसरी राजनीति को समर्थन दिया था। कांग्रेस के वोट बैंक पर फली फूली ज्यादातर पार्टियां वो हैं, जो कांग्रेस से अलग होकर बने नेताओं ने बनाई है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र में शरद और सुनेत्रा पवार की एनसीपी, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस, पुडुचेरी में रंगास्वामी की एनआर कांग्रेस आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इन पार्टियों की राजनीतिक विचारधारा एक जैसी नहीं है। लेकिन इनके पास वोट वही है, जो कभी कांग्रेस के पास होता था। एक तीसरी धारा उन पार्टियों की है, जो क्षेत्रीय और जातीय अस्मिता के आधार पर बनी हैं। इनका भी अस्तित्व काफी समय से है।

सो, अगर पश्चिम बंगाल से आगे की राजनीति का कोई रास्ता विपक्षी पार्टियों को खोजना है तो इन तीनों तरह की पार्टियों को एक साथ बैठ कर विचार करना होगा। समाजवादी राजनीति करने वाली पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल। क्षेत्रीय या जातीय अस्मिता के आधार पर बनी पार्टियां जैसे डीएमके, जेएमएम, बीआरएस आदि और कांग्रेस के निकल कर बनी पार्टियां जैसे तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, वाईएसआर कांग्रेस आदि। इनके अलावा एक और समूह ऐसी पार्टियों का बनाया जा सकता है, जो गवर्नेंस को विचारधारा बना कर पैदा हुई हैं जैसे आम आदमी पार्टी या विजय की पार्टी टीवीके। इन चारों कसौटियों वाली ज्यादातर पार्टियां भाजपा विरोध की राजनीति करती हैं। परंतु इनके बीच तालमेल नहीं होने की वजह से चुनावी राजनीति में वोटों का बंटवारा होता है, जिसका लाभ सीधे तौर पर भाजपा को होता है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने भारतीय राजनीति में भाजपा के कामयाब होने और भाजपा विरोधी पार्टियों की सफलता के रास्ते में आने वाली हर किस्म की फॉल्टलाइन को जाहिर कर दिया है। इस चुनाव से यह प्रमाणित हुआ है कि भारत में भाषा और संस्कृति की पहचान से ऊपर हिंदुत्व की पहचान है। वह ज्यादा स्थायी और अवश्यम्भावी है। बंगाल के चुनाव नतीजे ने इस संभावना को जन्म दिया है कि जिस तरह से बांग्ला भाषा और बंगाली अस्मिता अंततः हिंदुत्व की पहचान का हिस्सा बनी उसी तरह किसी समय द्रविड अस्मिता और तमिल, तेलुगू, मलयालम आदि भाषायी अस्मिता भी हिंदुत्व की पहचान का हिस्सा बन सकती है। कन्नड़ पहले से हिंदुत्व की पहचान का हिस्सा है। बंगाल के नतीजे ने समान विचारधारा वाली पार्टियों के वोट बंटवारे से भाजपा को फायदा होने की धारणा को भी मजबूती दी है। इसी तरह मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के जवाब में विपरीत ध्रुवीकरण से भाजपा को होने वाले फायदे को भी रेखांकित किया है।

इन तमाम फॉल्टलाइन्स को दूर करने के लिए भाजपा विरोधी पार्टियों के पास कोई एक रास्ता या कोई एक उपाय नहीं है। इसके लिए बहुआयामी रणनीति बनानी होगी, जिसकी शुरुआत सभी विपक्षी पार्टियों की एकता से हो सकती है। पहले तो पार्टियों की एकता बनेगी तभी उसके आगे का रास्ता बनेगा। राजनीति में कामयाबी के लिए कुछ तत्व बहुत जरूरी होते हैं। उनमें एक नेतृत्व का तत्व होता है और दूसरा नैरेटिव का। संगठन भी एक तत्व है लेकिन वह कांग्रेस सहित सभी पार्टियों के पास कमोबेश है। कई बार नैरेटिव मजबूत हो तो संगठन की आवश्यकता गौण हो जाती है। विपक्ष की समस्या यह है कि सभी पार्टियां किसी मजबूरी में साथ आ भी जाएं तो साझा नेतृत्व के सवाल पर आपस में टकरा जाती हैं।

अभी 1977 या 1989 जैसे हालात भी नहीं दिख रहे हैं कि स्वाभाविक रूप से कोई जयप्रकाश नारायण या वीपी सिंह निकल जाए और लोग उसे स्वीकार कर लें। इसलिए आपसी विचार विमर्श और सहमति से ही साझा नेतृत्व तैयार करना होगा। साझा नेतृत्व ऐसा होना चाहिए, जो वैचारिक रूप से भाजपा के सिद्धांतों का विपर्यय हो लेकिन ऐसा नहीं हो, जिसके इर्द गिर्द भाजपा जातीय या धार्मिक ध्रुवीकरण का नैरेटिव खड़ा कर सके। यह बहुत बारीक बात है, लेकिन यह सबसे आवश्यक तत्व है। इसके बाद दूसरी सबसे अहम जरुरत भाजपा के नैरेटिव के बरक्स अपना नैरेटिव खड़ा करने की है। इसके लिए विपक्ष की सभी पार्टियों को निजी तौर पर और फिर साझा विपक्ष के रूप में भी अपने वैचारिक आधार की पुनर्खोज करनी होगी। अपने को रिइन्वेंट करना होगा। सिर्फ कोई साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय करने से नहीं होगा, बल्कि भाजपा के मुकाबले एक मजबूत वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करना होगा। ऐसा विचार, जो भारत की मूल भावना से मेल खाता हो और देश के 140 करोड़ लोगों भरोसा पैदा करता हो। अगर समय रहते विपक्षी पार्टियों ने इस आवश्यकता को नहीं समझा और इसके लिए पहल नहीं की तो उनके लिए दरवाजों के साथ साथ खिड़कियां भी बंद होती जाएंगी।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

Leave a comment