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विपक्षी गठबंधन में नेतृत्व का विवाद क्यों?

कई बार ऐसा संदेह होता है कि क्या देश की तमाम प्रादेशिक पार्टियां भाजपा के लिए काम करती हैं? यह भी संदेह हमेशा रहता है कि कांग्रेस के अनेक नेता परदे के पीछे से भाजपा के लिए काम करते हैं। यह संदेह तो अब यकीन में बदलता जा रहा है। क्योंकि एक निश्चित अंतराल पर और खास कर चुनावों से ठीक पहले सुनियोजित तरीके से कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ते हैं और भाजपा में शामिल होते हैं। उससे पहले वे भाजपा के चुनावी एजेंडे को सपोर्ट करने वाले बयान देने शुरू कर देते हैं। ताजा मिसाल असम के पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन बोरा का कांग्रेस छोड़ना है। उन्होंने कांग्रेस छोड़ने से पहले कहा कि असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी एपीसीसी अब एपीसीसी-आर हो गई है। आर का मतलब रकीबुल हसन है। बोरा ने आरोप लगाया कि धुबरी के सांसद रकीबुल हसन ही अब प्रदेश कांग्रेस चला रहे हैं।

जाहिर है भूपेन बोरा ने जो कहा उसके पीछे एक राजनीतिक एजेंडा है। उन्होंने भाजपा में शामिल होने से पहले उसके सांप्रदायिक ध्रुवीकऱण वाले एजेंडे को समर्थन दिया। उन्होंने कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों की पुष्टि की। अब 22 फरवरी को वे भाजपा में शामिल हो जाएंगे, जहां उनको बकौल हिमंत बिस्वा सरमा ‘अपने कद के अनुरूप पद और जिम्मेदारी मिलेगी’। इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कहा कि भूपेन बोरा कांग्रेस में रह कर भाजपा के संपर्क में थे और मुख्यमंत्री सरमा को कांग्रेस की रणनीतिक जानकारी दिया करते थे। गोगोई ने कहा कि पत्रकारों ने कई ऐसी बातें बताईं, जो सिर्फ कांग्रेस की कोर टीम के लोगों को पता थीं लेकिन वह बात भाजपा नेतृत्व तक पहुंच गई थी। इससे यह अंदाजा होता है कि बोरा पहले से भाजपा के संपर्क में थे।

जिस तरह से कांग्रेस के अंदर रह कर कुछ नेता भाजपा के लिए काम करते हैं वैसे ही लगता है कि कांग्रेस के साथ सहयोगी बने रहने वाली कई पार्टियां भाजपा के लिए काम करती हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं होता है कि जब भी किसी राज्य का चुनाव हो या लोकसभा का चुनाव हो तो सहयोगी पार्टियां विपक्षी गठबंधन को पटरी से उतार दें। विपक्ष गठबंधन के नेतृत्व को लेकर शुरू हुए मौजूदा विवाद पर आएं उससे पहले इस तथ्य को समझना जरूरी है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को ममता बनर्जी ने पंक्चर किया था।

उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि विपक्षी गठबंधन के संयोजक के तौर पर नीतीश कुमार कबूल नहीं हैं। क्या यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा नहीं दिख रहा है? आखिर जब ममता राजी नहीं हुईं और राहुल गांधी ने कहा कि ममता से पूछे बगैर नीतीश को संयोजक नहीं बनाया जाएगा तभी तो नीतीश ने पाला बदला और तैयार खड़ी भाजपा ने उनको लपक लिया। अगर नीतीश विपक्षी गठबंधन में रहे होते तो 2024 के चुनाव की तस्वीर दूसरी होती।

बहरहाल, अभी फिर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमे से चार राज्य कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए जीत सकने वाले हैं। कांग्रेस असम और केरल में अच्छा लड़ रही है, जबकि तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके अलायंस में उसके लिए अच्छा अवसर है। लेकिन उससे ठीक पहले राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर विवाद खड़ा कर दिया गया। सोचें, इस समय संसद के बजट सत्र में राहुल गांधी ने अपनी राजनीति से खूब असर पैदा किया है। लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कोलकाता जाकर कह दिया कि भाजपा से सिर्फ ममता बनर्जी ही लड़ सकती हैं।

इसके बाद कांग्रेस के ही नेता रहे मणिशंकर अय्यर ने कह दिया कि एमके स्टालिन विपक्ष को एकजुट रखने के लिए सबसे अच्छे नेता हैं। मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने भी ममता बनर्जी पर दांव लगाने की बात कही तो इन सबके बहाने उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में संपादकीय लिख कर कहा कि नेतृत्व पर विचार करना चाहिए। उद्धव ठाकरे की पार्टी ने खुल कर नहीं कहा कि राहुल की जगह नया नेता लाया जाए लेकिन उसका रुख भी नेतृत्व पर सवाल उठाने वाला है। ‘सामना’ के संपादकीय में कहा गया कि विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों से कंफ्यूजन होता है। साथ ही यह भी लिखा गया कि एमके स्टालिन या ममता बनर्जी या कोई और नेता हो, इस बारे में स्पष्टता होनी चाहिए।

सवाल है कि ऐन चुनाव से पहले इस तरह की बातों का क्या मतलब है? क्या गठबंधन की राजनीति में यह सिद्धांत स्थापित नहीं हो गया है कि सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही गठबंधन का नेता होगा? पिछली सदी के आखिरी दशक में समाजवादी पार्टियों का प्रयोग विफल होने और एनडीए में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के साथ ही यह सिद्धांत स्थापित हो गया था कि सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही गठबंधन का नेतृत्व करेगा।

इस लिहाज से राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी स्वाभाविक रूप से नेतृत्व करने की स्थिति में हैं। राहुल लगातार केंद्र की भाजपा सरकार के ऊपर हमलावर रहते हैं। हालांकि कांग्रेस को मजबूत करके राजनीतिक लड़ाई मजबूती से लड़ने में वे चूक जाते हैं लेकिन वैचारिक लड़ाई वे किसी भी दूसरे नेता के मुकाबसे ज्यादा मजबूती से लड़ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा दोनों नीतिगत और विचाराधारात्मक दोनों मुद्दों पर राहुल चुनौती देते हैं। फिर भी उनका नेतृत्व स्वीकार करने की बजाय प्रादेशिक पार्टियों की ओर से उसे चुनौती दी जाती है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों को कांग्रेस के डोमिनेंस या उसकी पुनर्वापसी की चिंता रहती है। इसलिए वे कांग्रेस को लेकर आशंकित रहती हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार या तमिलनाडु जैसे राज्यों में कांग्रेस की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह अपने दम पर भी राजनीति की केंद्रीय ताकत बन सके। इसलिए पार्टियों का भय निराधार है। फिर भी वे कांग्रेस और राहुल गांधी को चैलेंज करती हैं तो इसके पीछे कोई अतिरिक्त मंशा की आशंका पैदा होती है। कायदे से अभी नेतृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए।

लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल से ज्यादा का समय बाकी है। उस समय ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेता को लेकर नए सिरे से विचार हो सकता है। जब अभी संसद में सभी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार को घेरती हैं, जब इस बार के सत्र में सभी विपक्षी पार्टियों ने राहुल गांधी के लिए अपने भाषण के समय का त्याग किया तब क्यों संसद के बाहर राहुल के नेतृत्व का मुद्दा उठाया जा रहा है? विपक्षी पार्टियों इस समय नेतृत्व का मुद्दा उठा कर राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की संभावना को कमजोर कर रही हैं। अभी किसी राज्य में गठबंधन की समस्या नहीं आने वाली है। इसलिए चाहे सपा हो या उद्धव ठाकरे की शिव सेना अभी उनको इंतजार करना चाहिए।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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